<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479</id><updated>2011-08-15T18:50:55.149+05:30</updated><title type='text'>सुन लो जरा</title><subtitle type='html'>----खेल और खिलाड़ियों की बातें</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>66</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-703905856418840311</id><published>2011-08-15T18:49:00.000+05:30</published><updated>2011-08-15T18:50:55.163+05:30</updated><title type='text'>इस हार का दोष ढलती उम्र को मत दीजिए</title><content type='html'>भारतीय टीम ने इंग्लैंड दौरे पर अब तक वाकई शर्मनाक प्रदर्शन किया है। तीन टेस्ट और तीनों में एकतरफा हार। दो अभ्यास मैचों में भी टीम बैकफुट पर रही। आखिर क्या है इस हार का कारण। आईपीएल, थकान, अभ्यास की कमी या ढलती उम्र। मेरी नजर में कम से कम ढलती उम्र तो कोई कारण नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि इस दौरे पर सिर्फ वे खिलाड़ी फ्लॉप रहे हैं जिनकी उम्र 37 साल से ज्यादा है। 30 से कम के रैना, युवराज, मुकुंद, गंभीर, श्रीसंत, इशांत भी बेअसर रहे। सिर्फ एक खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर पाया और उसकी उम्र टीम में सबसे ज्यादा है। जी हां राहुल द्रविड़। उम्र अगर कारण होती तो द्रविड़ सबसे बड़े फ्लॉप साबित होते। वैसे भी आठ महीने पहले ही इन्हीं उम्रदराज खिलाड़ियों ने दक्षिण अफ्रीका में शानदार प्रदर्शन किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो हार का कारण क्या है? सबसे बड़ा कारण है वर्ल्ड कप की जीत। जी हां। याद कीजिए इंग्लैंड की 2005 एशेज जीत को। और यह भी याद कीजिए कि उसके बाद क्या हुआ था। इंग्लैंड 1986 के बाद एशेज नहीं जीत पाया था और जब 19 साल बाद कामयाबी हाथ लगी तो लगा सब कुछ पा लिया। कुछ पाने को और बचा ही नहीं। अगले कुछ महीने इंग्लैंड की टीम खूब हारी। ऐसा ही हुआ है भारत के साथ। 28 साल बाद विश्व कप जीता है। लगा कि जीतने के लिए कुछ बचा ही नहीं। बतौर टीम भारत ने सर्वोच्च लक्ष्य हासिल कर लिया। बहुत लंबा इंतजार समाप्त हो गया। इसके बाद कुछ अच्छा करने की प्रेरणा खत्म हो गई। गनीमत है कि वेस्टइंडीज की टीम काफी कमजोर है। अगर उसमें थोड़ा भी दम होता तो हकीकत वहीं नजर आ जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ल्ड कप जीत के बाद इंग्लैंड में हार का दूसरा सबसे बड़ा कारण है इंग्लैंड को कम आंकना। तभी तो इस सीरीज से पहले कई खिलाड़ी ब्रेक पर थे। सचिन विम्बलडन देख रहे थे तो धौनी भी छुट्टी पर थे। सहवाग और गंभीर चोटिल थे कुछ खास नहीं कर सकते थे। किसी की तैयारी मुकम्मल नहीं थी। आधी-अधूरी तैयारी के बल पर इस इंग्लैंड टीम से मुकाबला तो नहीं ही किया जा सकता था। साथ ही सीरीज शुरू होने से पहले अभ्यास मैच भी सिर्फ एक मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक आईपीएल का सवाल है तो उसे उतना ही जरूरी मानिए जितना अखबार में विज्ञापन। पत्रकार इसे अब कटु सत्य मानकर काम करते हैं। वहीं क्रिकेटर आईपीएल को शहद जैसा सच मानकर खेलते हैं। आईपीएल को गाली देने से कुछ नहीं मिलने वाला। यह जारी रहने वाला है। चाहे कितनी भी सीरीज हारें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-703905856418840311?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/703905856418840311/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=703905856418840311' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/703905856418840311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/703905856418840311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='इस हार का दोष ढलती उम्र को मत दीजिए'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1055145184531791066</id><published>2010-06-25T12:36:00.000+05:30</published><updated>2010-06-25T12:37:11.176+05:30</updated><title type='text'>चार साल में एक महीने के लिए छाने वाला जुनून</title><content type='html'>न्यू माइंडशेयर के सर्वे के मुताबिक में दुनिया भर के अधिकांश लोगों (सर्वे में भाग लेने वाले) ने ब्राजील को 19वें फीफा विश्व कप खिताब का सबसे प्रबल दावेदार बताया। यह सर्वे भारत में भी हुआ था और यहां भी 19 प्रतिशत लोगों की राय थी कि ब्राजील ही चैम्पियन बनेगा। इस नतीजे से तो लगता है कि हम भारतीय भी फुटबाल के बारे में वैसी ही सोच और जानकारी रखते हैं जैसे किसी अन्य देश के लोग। हालांकि भारतीयों की नजर में दूसरे सबसे प्रबल दावेदार का नाम जानने के बाद पता चलता है कि इस देश में फुटबाल की औकात क्या है। सर्वे में भाग लेने वाले 14 प्रतिशत हिन्द निवासियों के मुताबिक आस्ट्रेलिया विश्व कप जीतने का सबसे प्रबल दावेदार था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की तारीख में आस्ट्रेलिया विश्व कप से बाहर हो चुका है और विश्व कप शुरू होने से पहले भी कोई भी आस्ट्रेलियाई 10 केन बीयर गटक लेने के बाद भी अपनी टीम को खिताब का दावेदार नहीं बताता। तो आस्ट्रेलिया भारतीयों की नजर में दावेदार कैसे हो गया? सीधा सा जवाब है क्रिकेट की वजह से। हम भारतीय क्रिकेट के दीवाने हैं और आस्ट्रेलिया क्रिकेट में बेहद मजबूत टीम है। पिछले तीन वनडे क्रिकेट विश्व कप और दो चैम्पियंस ट्रॉफी में हमने आस्ट्रेलिया को ही चैम्पियन बनते देखा तो सोचा आस्ट्रेलिया फुटबाल विश्व कप भी जीत जाएगा। मतलब साफ है फुटबाल के बारे में आम भारतीयों की जानकारी या तो न के बराबर है या काफी सीमित है। यहां फुटबाल की सुध सिर्फ फुटबाल विश्व कप के समय ली जाती है और बाकी चार साल इसे ताक पर रख दिया जाता है। इसलिए जानकारी का दायरा वर्ल्ड कप से वर्ल्ड कप चलता है। बीच में क्या हुआ कुछ पता नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें उनकी गलती भी नहीं है। आखिर उन्हें पता चले भी कैसे। जानकारी के लिए वे जिन माध्यमों (समाचार पत्र और न्यूज चैलन) पर निर्भर हैं वे भी वर्ल्ड कप टू वर्ल्ड कप नजरिया रखते हैं। (एक बात स्पष्ट करता चलूं कि मैं यहां बात हिन्दी भाषी खेल प्रेमियों और हिन्दी अखबार या चैनल देखने वाले फुटबाल प्रेमियों की कर रहा हूं। अंग्रेजी में हालात तो फिर भी दुरुस्त हैं। पश्चिम बंगाल, केरल, गोवा और उत्तर-पूर्व में फुटबाल नंबर एक खेल है और यहां के भाषायी अखबार फुटबाल की खबरें नियमित तौर पर छापते हैं चार वर्ष के अंतराल पर नहीं।) अब ये हिन्दी अखबार (इनमें से एक में मैं भी कार्यरत हूं) विश्व कप को रोज एक पन्ना समर्पित कर रहे हैं और ये हिन्दी चैनल दिन भर में कई बार फुटबाल अपडेट भी दिखा रहे हैं। लेकिन सच बात यह है कि पाठक और दर्शक इनके साथ लय नहीं बिठा पा रहे। मैसी, रोनाल्डो, काका या रूनी से अति लोकप्रिय नाम तो उन्हें पता है लेकिन इनके अलावा अन्य नामों को पढ़ने या सुनने में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा रहा है। 11 जुलाई तक (फाइनल के दिन तक) या इससे एक-दो दिन और आगे तक ये चार साली फुटबाल जुनून जारी रहेगा और उसके बाद फिर इसे ब्राजील में होने वाले 2013 विश्व कप तक कब्र में दफन कर दिया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले साल एशियन कप फुटबाल टूर्नामेंट का आयोजन होना है और भारत ने लम्बे अर्से बाद इस टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई किया है। लेकिन मुझे शक है कि इस टूर्नामेंट में मौजूदा विश्व कप की तुलना में 10 प्रतिशत कवरेज भी मिले। इंग्लिश प्रीमियर लीग, स्पेनिश ला लीगा, इतालवी सीरी-ए, जर्मन बुंदसलीगा, यूएफा चैम्पियंस लीग, यूएफा कप के साथ-साथ भारत की आई लीग, संतोष ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंट पहले की तरह आगे भी हर साल होंगे लेकिन हिन्दी समाचार माध्यमों में इनकी कवरेज नहीं होगी, होगी भी तो खाली जगह को पूरा करने के लिए। इसके बावजूद 2014 में ऐसे ही या इससे भी बड़े पैमाने पर हिन्दी अखबार और न्यूज चैनल 20वें फीफा विश्व कप की कवरेज लेकर आएंगे और यह उम्मीद करेंगे सुधी पाठक या दर्शक बीते सालों में अपने दम पर फुटबाल को लेकर अपडेट हो चुके होंगे और हमारी कवरेज का मजा लेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1055145184531791066?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1055145184531791066/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1055145184531791066' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1055145184531791066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1055145184531791066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='चार साल में एक महीने के लिए छाने वाला जुनून'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-7374243761415383694</id><published>2010-01-22T21:15:00.000+05:30</published><updated>2010-01-22T21:16:57.245+05:30</updated><title type='text'>कुछ हद तक जायज है पाक का विरोध</title><content type='html'>आईपीएल-3 की नीलामी में किसी पाकिस्तानी खिलाड़ी के नाम पर बोली न लगने के खिलाफ पाकिस्तान की ओर से उठ रहे विरोध के स्वर कुछ हद तक जायज लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर भारत और पाकिस्तान के संबंधों की जटिलताओं को दूर रख कर इस मामले पर गौर किया जाए तो मेरे विचार से पाकिस्तानी खिलाडिय़ों के साथ जैसा वर्ताव हुआ वह सही नहीं था। आईपीएल नियमों के मुताबिक कोई भी खिलाड़ी नीलामी सूची में तभी रखा जाएगा जबकि उसके पक्ष में कम से कम एक फ्रेंचाइजी मांग करे। हालांकि यह कहा जा सकता है कि 66 उपलब्ध खिलाडिय़ों में से सिर्फ 14 नीलाम हुए और पाकिस्तान के अलावा कुछ ऐसे भी देश थे जिनके खिलाडिय़ों पर बोली नहीं लगी। लेकिन सच्चाई यही है कि उन देशों के खिलाडिय़ों और पाकिस्तान के खिलाडिय़ों में बड़ा अंतर था। आस्ट्रेलिया की मौजूदा टीम के खिलाडिय़ों पर इसलिए बोली नहीं लगी क्योंकि वे आपीएल थ्री के शुरुआती तीन सप्ताह तक उपलब्ध नहीं रहते। हॉलैण्ड और बांग्लादेश के खिलाड़ी उतने स्तरीय थे नहीं। पाकिस्तानी खिलाडिय़ों के साथ इन दोनों में से कोई समस्या नहीं थी। उनके खिलाड़ी पूरे आईपीएल टूर्नामेंट के दौरान उपलब्ध रहते। जहां तक उनके स्तर का सवाल है तो वे टी 20 के विश्व चैम्पियन टीम का हिस्सा हैं। यही बात उनके स्तर के बारे में बताने के लिए काफी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तीसरा तर्क यह है कि फ्रेंचाइजियों ने पाक खिलाडिय़ों पर बोली इसलिए नहीं लगाई क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें अहम मौके पर वीजा की समस्या भी आ सकती थी। अगर फ्रेंचाइजियों की यह समस्या थी तो उन्हें आईपीएल के कर्ताधर्ताओं को यह बात पहले बतानी चाहिए कि वे अब पाक खिलाडिय़ों पर बोली लगाने को इच्छुक नहीं हैं। सभी टीमों की गतिविधियों से अच्छी तरह वाकिफ रहने वाले आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी के लिए क्या यह बात मुमकिन प्रतीत होती है कि उन्हें फ्रेंचाइजियों के इस रुख का आभास न रहा हो? मुझे तो नहीं लगता। अच्छा होता यदि आईपीएल पहले ही पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को यह बता देता कि कोई फ्रेंचाइजी वहां के क्रिकेटरों में दिलचस्पी नहीं ले रहा है और पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को नीलामी की सूची से ही बाहर कर दिया जाता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-7374243761415383694?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/7374243761415383694/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=7374243761415383694' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7374243761415383694'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7374243761415383694'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html' title='कुछ हद तक जायज है पाक का विरोध'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-4999681313330386206</id><published>2010-01-13T23:38:00.002+05:30</published><updated>2010-01-13T23:45:03.746+05:30</updated><title type='text'>हाउजैट.....हाउ वाज दैट..... आआआआ</title><content type='html'>आपने श्रीलंका के कप्तान कुमार संगकारा को अपील करते समय ध्यान से देखा या सुना है? आम तौर पर अपील करते समय गेंदबाज, विकेटकीपर या विकेट के नजदीक के फील्डर 'हाउजैट' या 'हाउ वाज दैट' की आवाज निकालते हैं और अम्पायर इसके जवाब में कहते हैं दैट्स आउट या दैट्स नॉट आउट। लेकिन श्रीलंकाई कप्तान इन दोनों में कुछ भी नहीं कहते वे बस चिल्लाते हैं 'आआआआआआआआ'। विकेट के पीछे खड़े संगकारा बल्लेबाज के पैड पर गेंद लगते ही ऐसे उछलने लगते हैं जैसे मानो मई की गरमी में तीन घंटे तक तप चुकी सीमेंटेड फर्श पर नंगे पांव खड़े हो गए हों। जबर्दस्त उत्साह। खैर अम्पायर इसके जवाब में 'ईईईईईईईईई' नहीं करते। वे उन्हें भी दैट्स आउट या दैट्स नॉट आउट ही कहते हैं। कोई-कोई अम्पायर हां या न में मुंडी हिलाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर जो बात मैं कहना चाह रहा था वह यह है कि संगकारा के अपील के स्टाइल से मुझे अपने स्कूली दिनों की क्रिकेट याद गई। हमें यह मालूम था कि अपील के वक्त चिल्लाना होता है। हाउजैट या हाउ वाज दैट हमें नहीं पता था। जब गेंद बल्लेबाज के पैर में लगती थी या बल्लेबाज के चूकने पर विकेटकीपर कोई गेंद पकड़ता था तो हम भी चिल्लाते थे 'आआआआआआ'। हमारी क्रिकेट में अम्पायर बल्लेबाजी करने वाली टीम का ही होता था और 100 में से 95 बार उसका जवाब होता था 'अरे आउट नहीं काहे चिल्ला रहा है।' राधोपुर के लखी चंद साहू स्कूल का मैदान हो या मधुबनी के वाटसन हाई स्कूल का मैदान या पटना साइंस कॉलेज का मैदान हर जगह यही हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक गेंद विकेट न उखाड़ दे, या फील्डर सीधा-सीधा कैच न पकड़े या बल्लेबाज रन लेते वक्त विकेट पर थ्रो लगते समय क्रीज से तीन चार फुट दूर न हो आउट होने का सवाल ही नहीं। हम अपनी क्रिकेट में विवादास्पद एलबीडब्ल्यू के नियम को भी शामिल करते थे लेकिन अगर अम्पायर का यदि बल्लेबाज से झगड़ा न हुआ हो एलबीडब्ल्यू मिलना तो असंभव से कम नहीं था। गजब के अम्पायर थे सब। मैं भी करता था अम्पायरिंग बाकियों की तरह। फील्डिंग करने वाली टीम अम्पायर को पाकिस्तानी अम्पायर की संज्ञा देते थे। उन दिनों हम सुनते थे कि पाकिस्तानी अम्पायर बहुत बेईमान होते हैं। हालांकि अशद रउफ और अलीम दार को देख कर अब ऐसा नहीं लगता। भारतीय अम्पायरों में बंसल की बहुल चर्चा होती थी। बंसल साहब का भी अजीब रिकार्ड रहा। उन्होंने भारत के जितने टेस्ट मैचों में अम्पायरिंग की उनमें भारत कभी हारा नहीं। बड़ा खास रिकार्ड है। कुछ वैसा ही जैसे जावेद मियांदाद अपने टेस्ट करियर में पाकिस्तान में कभी एलबीडब्ल्यू आउट नहीं हुए। मैं भी अपनी दूसरी क्लास की क्रिकेट से लेकर बीएससी तक की क्रिकेट में कभी एलबीडब्ल्यू आउट नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वो अपील, वो अम्पायर, वो मैदान बहुत याद आते हैं। शाम को खेलने के समय ऑफिस में होता हूं। रात 2-3 बजे सोता हूं तो सुबह की क्रिकेट भी नहीं खेल सकता। चलो कोई बात नहीं मेरी जगह संगकारा तो है वह तो कहता ही रहेगा 'आआआआआआआआ'।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-4999681313330386206?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/4999681313330386206/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=4999681313330386206' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4999681313330386206'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4999681313330386206'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='हाउजैट.....हाउ वाज दैट..... आआआआ'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-840051629851174813</id><published>2009-10-23T15:44:00.002+05:30</published><updated>2009-10-23T15:48:13.412+05:30</updated><title type='text'>700 करोड़ रुपये कम तो नहीं होते</title><content type='html'>20 अक्टूबर को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने अप्रैल 2010 से मार्च 2014 तक के लिए भारत में होने वाले अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मैचों (विश्व कप 2011, आईपीएल और चैम्पियंस लीग शामिल नहीं) के टेलिविजन प्रसारण अधिकार निम्बस के चैनल नियो क्रिकेट को 2000 करोड़ रुपये में बेचे। पिछली बार इसी निम्बस ने इसी बीसीसीआई के साथ यही करार 2700 करोड़ रुपये से ज्यादा में किए थे। तो आखिर क्या बात है कि क्रिकेट मार्केटिंग में दुनिया को नए तरीके सिखाने वाली बीसीसीआई की मार्केटिंग कमेटी ने इस बार इतना बड़ा घाटा सहा। इसी कमेटी ने चैम्पियंस लीग टी 20 टूर्नामेंट के अगले 10 साल के प्रसारण अधिकार 4500 करोड़ से भी अधिक में बेचे। भले ही यह 10 साल का करार है लेकिन चैम्पियंस लीग साल में 15-20 दिन ही होंगे।&lt;br /&gt;इसका सीधा मतलब तो यही निकलता है कि भारतीय क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं ने यह मान लिया है कि टेस्ट और वनडे क्रिकेट पहले ही तरह बिकाऊ नहीं है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है। इसी बीसीसीआई का कहना है कि वह भारत-आस्ट्रेलिया वनडे सीरीज के हर मैच से जितनी कमाई करेगा उतना पैसा उसे आईसीसी पूरे 2011 विश्व कप के लिए नहीं देगी। वनडे तो अब भी बिकाऊ हैं। खास कर वो वनडे जिसमें भारत हिस्सा ले रहा हो। टैम के आंकड़ें गवाह है कि दक्षिण अफ्रीका में हुए चैम्पियंस ट्रॉफी के उन मैचों को जिनमें भारत खेला चैम्पियंस लीग के मैचों से अधिक टीवी दर्शक मिले। मेरे पास तो बोर्ड की मार्केटिंग कमेटी के किसी सदस्य का नम्बर नहीं है लेकिन जिनके पास है क्या वो उनसे पूछ के बताएंगे कि हमारे बोर्ड ने इतना बड़ा घाटा क्यों सहा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-840051629851174813?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/840051629851174813/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=840051629851174813' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/840051629851174813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/840051629851174813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/10/700.html' title='700 करोड़ रुपये कम तो नहीं होते'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1983512655245359996</id><published>2009-08-29T20:57:00.000+05:30</published><updated>2009-08-29T20:58:38.069+05:30</updated><title type='text'>टेस्ट चैम्पियनशिप का आयोजन इतना आसान नहीं</title><content type='html'>वेस्टइण्डीज क्रिकेट बोर्ड (डब्ल्यूआईसीबी) के अध्यक्ष जुलियन हंट ने खुलासा किया कि बीसीसीआई ने आईसीसी द्वारा प्रस्तावित टेस्ट चैम्पियनशिप की योजना को ठुकरा दिया था। हंट का कहना है आईसीसी ने मौजूदा समय में काम में आ रहे भविष्य दौरा कार्यक्रम के स्थान पर चार साल तक चलने वाली टेस्ट चैम्पियनशिप शुरू करने की योजना बनाई थी लेकिन यह बीसीसीआई के इनकार के कारण खटाई में पड़ गया। बीसीसीआई ने जिस किसी भी कारण से इस चैम्पियनशिप के लिए मना किया हो सच्चाई यही है कि अभी इस तरह की कोई चैम्पियनशिप शुरू नहीं की जा सकती और शुरू हुई भी तो सफल नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके पीछे कई कारण है। पहला तो यह कि 10 टेस्ट टीमों के बीच कोई ऐसी चैम्पियनशिप के लिए चार वर्ष में सभी टीमों को इस एक-दूसरे के खिलाफ अपने देश में और सामने वाली टीम के देश में बराबर बराबर मैच खेलने होंगे। ऐसी स्थिति में भारत को बांग्लादेश के खिलाफ भी उतने ही टेस्ट मैच खेलने होंगे जितना वह आस्ट्रेलिया के खिलाफ खेले। इस स्थिति में आस्ट्रेलिया और इंग्लैण्ड के बीच हर दो साल में होने वाली एशेज सीरीज में भी पांच मैच खेले जाने की गुंजाइश नहीं बचेगी। क्योंकि टेस्ट चैम्पियनशिप में सभी टीमों को एक दूसरे के खिलाफ बराबर मैच खेलने होंगे और ऐसे में हर टीम किसी दूसरी टीम के साथ चार साल के अंदर पांच मैच घर में और पांच मैच सामने वाली टीम के घर में नहीं खेल सकती। ऐसा हुआ तो एक टीम को चाल साल में कुल 90 मैच खेलने होंगे। यानी एक साल में 22-23 मैच। यह नामुमकिन है। अगर दो-तीन टेस्ट मैचों की सीरीज रखी गई तब तो यह और भी बुरा होगा। इस हालात में ऐशेज और आस्ट्रेलिया-बांग्लादेश सीरीज में क्या अंतर रह जाएगा। सबसे बड़ी बात बांग्लादेश जैसी कमजोर टीम अगर चार साल में इतने टेस्ट मैच खेलेगी तो इसे देखेगा कौन? इस प्रारूप से टेस्ट लोकप्रिय होने के बजाय और भी अलोकप्रिय हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे बचने के लिए टीयर सिस्टम की वकालत की जा रही है। टीयर एक में चोटी की छह टीमें और टीयर दो में चार अन्य। हर चार साल में टीयर एक की फिसड्डी टीम दूसरे टीयर में और दूसरे टीयर की अव्वल टीम टीयर एक में आएगी।&lt;br /&gt;देखने-सुनने में यह अच्छा लगता है लेकिन क्या प्रायोगिक स्तर पर यह मुमकिन है? मान लीजिए कि किसी चैम्पियनशिप में भारत टीयर एक में आखिरी स्थान पर रहता है तो क्या वह इसके बाद अगले चार साल तक फिसड्डी टीमों के खिलाफ खेलता रहे। यही स्थिति किसी भी अच्छी टीम के साथ हो सकती है क्योंकि छह में से कोई न कोई तो आखिरी स्थान पर रहेगा। मान लीजिए कि कभी आस्ट्रेलिया या इंग्लैण्ड दो टीयर में बंट जाएं। तो क्या अगले चार साल एशेज सीरीज ही न हो? अगर टीयर सिस्टम से रेलीगेशन का सिस्टम हटा भी दें तब भी यह कामयाब नहीं होगा। निचले टीयर वाली टीमें हमेशा यह दावा करेगी कि अब उसका स्तर सुधर गया है और वह शीर्ष टीमों को टक्कर दे सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेस्ट चैम्पियनशिप वनडे या ट्वंटी 20 विश्व कप की तरह किसी एक देश में एक बार में नहीं निबटाया जा सकता। इसके लिए काफी लम्बे समय की आवश्यकता होगी और लोग लगातार इतना टेस्ट क्रिकेट देख-झेल नहीं सकते।&lt;br /&gt;इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि टेस्ट क्रिकेट की खूबसूरती द्विपक्षीय शृंखलाओं और परंपरागत प्रतिद्वंद्विता में ही बसी है। इसमें छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता। एशेज सीरीज, भारत-पाकिस्तान सीरीज, फ्रैंक वारेल सीरीज, बॉर्डर गावस्कर सीरीज से ही टेस्ट क्रिकेट का भला होगा। इन सीरीजों को लोकप्रिय बनाने की, इनके बेहतर प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। जो टीमें कमजोर हो रही हैं उसे फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की जाए। दर्शकों को मैदान तक लाने के लिए योजनाएं बनाई जाएं। जिस तरह एशेज शृंखला 100 साल से भी ज्यादा समय से नियमित अंतराल पर खेली जा रही है उसी तरह अन्य शृंखलाएं भी नियमित अंतराल पर हो ताकि उसके आयोजन से पहले अपने आप माहौल बने। भारत और पाकिस्तान या भारत और श्रीलंका आपस में कभी-कभी लगातार खेलते रहते हैं तो कभी लम्बे समय तक इनके बीच मैच ही नहीं होता। इस स्थिति को सुधारने की जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1983512655245359996?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1983512655245359996/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1983512655245359996' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1983512655245359996'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1983512655245359996'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post_29.html' title='टेस्ट चैम्पियनशिप का आयोजन इतना आसान नहीं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3191929468240964744</id><published>2009-08-28T10:54:00.001+05:30</published><updated>2009-08-28T10:57:45.565+05:30</updated><title type='text'>आधे फिट नडाल रोक पाएंगे फेडरर को?</title><content type='html'>आजकल टेनिस का कोई भी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट हो पुरुष एकल में रोजर फेडरर ही सबसे प्रबल दावेदार होते हैं। सोमवार से शुरू हो रहा अमरीकी ओपन तो इस स्विस स्टार के लिए और भी खास है। करियर के चरम पर पहुंचने के बाद यही एक ऐसा टूर्नामेंट है जिसमें फेडरर अब तक अपराजेय हैं। वर्ष 2004 से वह फ्लसिंग मीडोज के बादशाह हैं। यहां उन्होंने उस समय भी जीत दर्ज की जब उनके सबसे नजदीकी प्रतिद्वंद्वी स्पेनिश खिलाड़ी राफेल नडाल उन्हें दुनिया के अन्य हर कोने में पीट रहे थे। नडाल इस बार भी अपनी चुनौती के साथ मौजूद रहेंगे लेकिन वह हाल ही में चोट से उबरे हैं और उन्हें भी इस टूर्नामेंट से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिटेन के एंडी मरे, सर्बिया के नोवाक जोकोविच, अर्जेन्टीना के जुआन मार्टन डेल पोट्रो और अमरीका के एंडी रोडिक कुछ ऐसे नाम हैं जो फेडरर के अभियान को थामने का माद्दा रखते हैं लेकिन फेडरर इन दिनों जैसी फॉर्म में हैं उससे तो यही लगता है कि विश्व नंबर एक के लिए 16वां ग्रैंड स्लैम खिताब अब महज दो सप्ताह से कुछ ज्यादा दिन ही दूर है। हां अगर आधे-अधूरे फिट नडाल कहीं स्विस स्टार के सामने आने में सफल रहे तो नजारा बदल सकता है। लेकिन इसके लिए नडाल को फाइनल तक का सफर तय करना पड़ेगा जो मैच प्रैक्टिस के अभाव में इस समय उनके लिए मुश्किल लग रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ड्रॉ पर नजर दौड़ाएं को फेडरर का सेमीफाइनल तक का सफल बहुत ही आसान दिख रहा है। हालांकि अंतिम 16 के मुकाबले में उन्हें आस्ट्रेलिया के लेटन हेविट और क्वार्टर फाइनल में रूस के निकोल देवीदेंको से खेलना पड़ेगा लेकिन फेडरर अपने बुरे दिनों में भी इन खिलाड़ियों को हराने का माद्दा रखते हैं। अंतिम चार में फेडरर के सामने जोकोविच होंगे। जोकोविच वर्ष 2008 के आस्ट्रेलियन ओपन के सेमीफाइनल सहित फेडरर को कुल चार बार हरा चुके हैं। हालांकि उन्हें आठ मुकाबलों में हार का सामना भी करना पड़ा है। लेकिन खास बात यह है कि इन दोनों के बीच हुए पिछले आठ मुकाबलों में दोनों को चार-चार जीत मिली है।&lt;br /&gt;वहीं फाइनल में एंडी मरे या नडाल जो भी पहुंचे आंकड़ों के लिहाज से अब तक फेडरर पर भारी साबित हुए हैं। नडाल ने फेडरर के खिलाफ 20 में से 13 मैचों में जीत दर्ज की है तो मरे ने नौ मुकाबलों में छह बार फेडरर को मात दी है। लेकिन यह अमरीकी ओपन है और यहां फेडरर किसी भी आंकड़े को झुठला सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3191929468240964744?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3191929468240964744/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3191929468240964744' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3191929468240964744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3191929468240964744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post_28.html' title='आधे फिट नडाल रोक पाएंगे फेडरर को?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1102410778692200422</id><published>2009-08-26T01:30:00.002+05:30</published><updated>2009-08-26T01:34:03.964+05:30</updated><title type='text'>बोल्ट जैसे एथलीट किसी 'सिस्टम' की देन नहीं हैं</title><content type='html'>वैसे तो ज्यादातर खेलों में उन देशों का परिणाम अच्छा रहता है जहां खेलों के लिए आधारभूत ढ़ाचा बेहतर हो। क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस, हॉकी, बेसबॉल, बैडमिंटन, तैराकी, शतरंज, गोल्फ तमाम ऐसे खेल हैं जो इस कैटगरी में फिट बैठते है। लेकिन एक खेल ऐसा है जो 90 फीसदी खिलाड़ी के स्तर पर निर्भर करता है और 10 प्रतिशत सिस्टम पर। चाहे उस देश का सिस्टम कितना भी मजबूत क्यों न हो अगर खिलाड़ी अच्छे नहीं होंगे तो खास अच्छा परिणाम नहीं मिलेगा। वह खेल है एथलेटिक्स (ट्रैक एंड फील्ड दोनों)। सभी खेलों में यह एक मात्र ऐसा खेल है जिसमें जब-तब नए चैम्पियन सामने नहीं आते। इस खेल में मानव के शारीरिक सामर्थ की जितनी आवश्यकता है किसी अन्य खेल में नहीं। तभी तो माइकल जॉनसन, सर्गेई बुबका या ताजा सनसनी यूसेन बोल्ट रोज-रोज पैदा नहीं होते। तभी तो एथलेटिक्स के कई ऐसे विश्व रिकार्ड हैं जो सालों से नहीं टूटे। और वो तभी टूटेंगे जब उसे बनाने वाले पुराने एथलीट से बेहतर कोई नया एथलीट पैदा हो। ये एथलीट किसी सिस्टम से तैयार नहीं किए जा सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नजर उन रिकार्डों पर जो 10 साल से ज्यादा से टूटने की वाट जोह रहे हैं। इनमें से कुछ तो 20 या उससे भी ज्यादा समय से कायम हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- 400 मीटर दौड़ का मौजूदा विश्व रिकार्ड 1999 में माइकल जॉनसन ने बनाया था। &lt;br /&gt;- 800 मीटर दौ़ड़ का मौजूदा विश्व रिकार्ड डेनमार्क के विल्सन किपकेटर ने 1997 में बनाया था।&lt;br /&gt;-1000 मीटर दौड़ का विश्व रिकार्ड केन्या के नोह गेनी ने 1999 में बनाया था।&lt;br /&gt;-मोरक्को के हिचाम अल गुरोज ने 10 साल पहले 1500 मीटर एक मील और 2000 मीटर का विश्व रिकार्ड बनाया था।&lt;br /&gt;-3000 मीटर का विश्व रिकार्ड केन्या के डेनियल कोमेन ने 1996 में बनाया था&lt;br /&gt;-25 किलोमीटर पैदल चाल का विश्व रिकार्ड जापान के तोसीहिको सेको ने 1981 में बनाया था&lt;br /&gt;-400 मीटर बाधा दौड़ का विश्व रिकार्ड अमरीका के केविन यंग ने 1992 में बनाया था&lt;br /&gt;-ऊंची कूद का विश्व रिकार्ड क्यूबा के जेवियर सोटोमायोर ने 1993 में बनाया था&lt;br /&gt;-पोल वाल्ट का विश्व रिकार्ड यूक्रेन के सर्गेई बुबका ने 1994 में बनाया था&lt;br /&gt;-लम्बी कूद का विश्व रिकार्ड अमरीका के माइक पावेल ने 1991 में बनाया था&lt;br /&gt;-ट्रिपल जंप का विश्व रिकार्ड ब्रिटेन के जोनाथन एडवर्ड्स ने 1995 में बनाया था&lt;br /&gt;-गोला फेंक का विश्व रिकार्ड अमरीका के रेंडी बर्नेस ने 1990 में बनाया था&lt;br /&gt;-चक्का फेंक का विश्व रिकार्ड जर्मनी (तत्कालीन पूर्वी जर्मनी) के जर्गेन शल्ट ने 1986 में बनाया था।&lt;br /&gt;-हैमर थ्रो का विश्व रिकार्ड स्लोवेनिया के यूरीव सेदिक ने 1986 में बनाया था&lt;br /&gt;-जेवलिन थ्रो का विश्व रिकार्ड चेक गणराज्य के जान जेलेन्जी ने 1996 में बनाया था&lt;br /&gt;-4 गुणा 400 मीटर रिले का विश्व रिकार्ड अमरीकी टीम ने 1993 में बनाया था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी रिकार्ड पुरुष वर्ग के हैं। महिला वर्ग में भी यही हाल है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1102410778692200422?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1102410778692200422/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1102410778692200422' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1102410778692200422'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1102410778692200422'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post_26.html' title='बोल्ट जैसे एथलीट किसी &apos;सिस्टम&apos; की देन नहीं हैं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-8675929421405114205</id><published>2009-08-15T13:15:00.000+05:30</published><updated>2009-08-15T13:16:34.993+05:30</updated><title type='text'>हर तरफ हार ही हार</title><content type='html'>15 अगस्त की पूर्व संध्या पर सायना नेहवाल से बड़ी उम्मीदें थी। सोच रहा था कि भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी दूसरी वरीयता प्राप्त चीनी खिलाड़ी लिन वांग से क्वार्टर फाइनल मैच जीत जाएगी तो पांच-छह कॉलम में सजा-धजा कर इस मैच की लीड खबर बनाऊंगा ताकि स्वतंत्रता दिवस पर जब पाठक खेल का पन्ना देखे तो उनका हर्षोउल्लास दोगुना हो जाए।  लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इससे पहले मिश्रित युगल में वी दीजू और ज्वाला गुट्टा की जोड़ी भी हार कर टूनार्मेंट से बाहर हो चुकी थी। इस तरह हैदराबाद में चल रही विश्व बैडमिंटन चैम्पियनशिप में भारत की चुनौती समाप्त हो गई और इसके साथ ही इस टूर्नामेंट से स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर किसी सकारात्मक खबर मिलने की उम्मीद भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद सोचा किसी और खेल में कोई अच्छी खबर हाथ लग जाए ताकि आजादी का जश्न मनाने वाले अपने पाठकों की खुशी में इजाफा कर सकूं। लेकिन बाकी खेलों में भी निराशाजनक परिणाम ही हाथ लगे। शतरंज में तानिया सचदेव बांग्लादेशी खिलाड़ी से हार गईं तो टेनिस में प्रकाश अमृतराज एकल से बाहर हो गए। हालांकि प्रकाश .युगल में जीते। वह भी पाकिस्तान के ऐसाम उल हक कुरैशी के साथ। लेकिन आजादी के पावन मौके पर भारत-पाक संयुक्त कामयाबी की खबर का कनसेप्ट कुछ लगों को कुछ जमा नहीं। वैसे भी प्रकाश की जोड़ी सेमीफाइनल में ही पहुंची कोई खिताब थोड़े ही जीत लिया था (वैसे सायना भी जीतती तो सेमीफाइनल में ही पहुंचती)। गोल्फ के मैदान से भी अच्छी खबर नहीं आई। भारतीय गोल्फर जीव मिल्खा सिंह निराशाजनक प्रदर्शन के साथ संयुक्त 67वें स्थान पर ही रहे। टेबल टेनिस में भी भारतीय टीम की हार की खबर थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन बड़ा दुखी हुआ कि आजादी दिवस पर भारतीयों की हार की खबरों से परिपूर्ण पन्ना देखकर हमारे पाठकों पर क्या बीतेगी। शिक्षा भी ऐसी ही मिली है कि ऐसे दिनों पर सकारात्मक खबरों को तरजीह दो। लेकिन कोई सकारात्मक खबर हो तब न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काम खत्म करने के बाद बुझे मन के साथ घर लौटा और इस बात पर बार-बार कोफ्त होता रहा कि एक भी सुखद खबर नहीं लगा पाया। घर पर अपने 15 वर्षीय साले (ब्रदर इन लॉ) को यह बात बताई। नींद से परेशान साले ने बात को आगे न बढ़ाने के मूड में एक बात कही कि इन खेलों में हम जीतते ही कब थे जो आज जीत जाते। यह कह कर वह तो सो गया लेकिन उसकी बात बहुत हद तक सच्ची भी है। इन खेलों क्या कुल मिलाकर सभी खेलों में हम जीतते ही कब थे जो आज जीत जाते। इक्का-दुक्का जीत कुछ इक्का दुक्का खेलों में मिलती रही है लेकिन अपने यहां तो खेल के मैदान में सफलता इस कदर कम है कि कांस्य विजेता (तीसरा स्थान पाने वाले) भी हीरो से कम नहीं। और जब तक ये कांस्य विजेता नहीं थे तब तक चौथा स्थान हासिल करने वाले भी हीरो थे। कृप्या मुझे यह याद न दिलाएं कि एक स्वर्ण भी मिला था। लेकिन हम खेल में तब कामयाब होंगे जब हमारे पास इतने स्वर्ण विजेता हों कि कईयों के नाम याद न आए। वाकई खेलों की दुनिया में अभिनव है भारत। बिना मजबूत तर्क और वजह के आश्चर्यजनक रूप से नाकामयाब।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-8675929421405114205?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/8675929421405114205/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=8675929421405114205' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8675929421405114205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8675929421405114205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='हर तरफ हार ही हार'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6708265121722004243</id><published>2009-07-18T04:12:00.002+05:30</published><updated>2009-07-18T04:17:41.425+05:30</updated><title type='text'>सचिन अगर आस्ट्रेलियाई होते तो टेस्ट में अब तक 55 शतक जमा चुके होते</title><content type='html'>पोंटिंग ने इंग्लैण्ड के खिलाफ वर्तमान एशेज सीरीज के पहले टेस्ट मैच में शतक जमाकर अपने शतकों की संख्या 38 तक पहुंचा दी है। क्रिकेटिया हलकों में इस बात पर बहस भी छिड़ गई है कि कहीं पोंटिंग सचिन तेंदुलकर से भी महान बल्लेबाज तो नहीं। मैं ऐसा नहीं मानता। क्योंकि सिर्फ आंकड़े किसी बल्लेबाज के महानता की असली तस्वीर बयां नहीं करते। लेकिन अगर आंकड़ेबाजी पर ही चलें तो मैं यहां कुछ ऐसे आंकड़े दे रहा हूं जो वास्तविक तो मुमकिन नहीं हो सकते है लेकिन इन पर विचार कर सचिन और पोंटिंग के बीच के अंतर को समझा जा सकता है। सिर्फ इतना सोचें कि अगर सचिन एक आस्ट्रेलियाई क्रिकेट होते और पोंटिंग भारतीय तो दोनों का रिकार्ड कैसा रहता। तब सचिन पोंटिंग से इतने आगे होते कि उनके रिकार्ड को चुनौती मिलना असंभव होता। इस विश्लेषण में मैंने दोनों खिलाड़ियों की काबिलियत का आंकलन नहीं किया है। बस देश बदलने की स्थिति में मिले मौकों के आधार पर कौन कहां खड़ा होता यह जानने की कोशिश की है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थित एक-सचिन अगर आस्ट्रेलियाई होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन के पहले टेस्ट मैच के बाद से &lt;br /&gt;आज तक भारत के कुल टेस्ट मैच&lt;strong&gt;-   173&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दिनों में सचिन के कुल टेस्ट मैच&lt;strong&gt;-  159&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन की प्रतिशत अनुपस्थिति&lt;strong&gt;-   8.09&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दरम्यान आस्ट्रेलिया के कुल टेस्ट&lt;strong&gt;-  226&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर सचिन आस्ट्रेलियाई होते तो &lt;br /&gt;8.09 प्रतिशत अनुपस्थिति दर के हिसाब&lt;br /&gt;से उनके कुल टेस्ट मैचों की संख्या होती&lt;strong&gt;-  207&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन ने भारत के लिए 159 टेस्ट मैचों में &lt;br /&gt;261 पारी खेली है यानी प्रति टेस्ट उनके&lt;br /&gt;पारियों की संख्या हुई&lt;strong&gt;-    1.64&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस हिसाब से सचिन अगर आस्ट्रेलियाई&lt;br /&gt;होते तो उनके पारियों की संख्या होती&lt;strong&gt;-  339&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के लिए खेली 261 पारियों में सचिन&lt;br /&gt;27 बार नाबाद रहे हैं। यानी प्रति पारी उनके&lt;br /&gt;नाबाद रहने की दर है&lt;strong&gt;-    0.10&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लिहाज से 339 पारियों में वह नाबाद रहते &lt;strong&gt;-       34&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन ने भारत के लिए 261 पारियों में 27 बार &lt;br /&gt;नाबाद रहते हुए 54.59 की औसत से 12773 रन&lt;br /&gt;बनाए हैं। इस लिहाज अगर वह आस्ट्रेलियाई रहते&lt;br /&gt;तो 339 पारियों में 34 बार नाबाद रहते हुए&lt;br /&gt;54.59 की औसत से रन बनाते &lt;strong&gt;-  16649&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन ने 261 पारियों में 42 शतक बनाए हैं।&lt;br /&gt;यानी हर 6.21 पारी में एक शतक इस&lt;br /&gt;लिहाज से अगर वह आस्ट्रेलियाई होते तो &lt;br /&gt;339 पारियों में उनके शतकों की संख्या होती&lt;strong&gt;-         55&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह उनके अद्धर्शतकों की संख्या होती&lt;strong&gt;-  69&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखते हैं कि पोंटिंग अगर भारतीय होते तो क्या होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोंटिंग के पहले टेस्ट मैच से अब तक&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के कुल टेस्ट मैच&lt;strong&gt;-   155&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दिनों में पोंटिंग के कुल मैच&lt;strong&gt;-   132&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोंटिंग की प्रतिशत अनुपस्थिति&lt;strong&gt;-   14.84&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दिनों में भारत ने टेस्ट खेले&lt;strong&gt;-   135&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर पोंटिंग भारतीय होते तो अपनी&lt;br /&gt;अनुपस्थिति दर के हिसाब से टेस्ट खेले होते&lt;strong&gt;-  115&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के लिए प्रति टेस्ट पोंटिंग के &lt;br /&gt;पारियों की संख्या हुई&lt;strong&gt;-    1.66&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो अगर वह भारतीय होते तो 115 टेस्ट में&lt;br /&gt;उनके पारियों की संख्या हुई होती &lt;strong&gt;-  190&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के लिए वह 222 पारियों में 26&lt;br /&gt;बार नाबाद रहे हैं। इस लिहाज से अगर वह&lt;br /&gt;भारतीय होते तो उनकी नाबाद पारियों की&lt;br /&gt;संख्या होती  &lt;strong&gt;-   21&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलिया के लिए पोंटिंग ने 56.68 की&lt;br /&gt;औसत से रन बनाए हैं। अगर वह भारतीय होते&lt;br /&gt;तो उपरोक्त निष्कर्षों के आधार पर इसी औसत&lt;br /&gt;से उनके रन होते  &lt;strong&gt;-  9578&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोटिंग ने आस्ट्रेलिया के लिए 222 पारियों में&lt;br /&gt;38 शतक लगाए है। अगर वह भारतीय होते तो&lt;br /&gt;इसी दर से 190 पारियों में उनके शतकों की&lt;br /&gt;संख्या होती &lt;strong&gt;-    32&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह उनके अद्धर्शतकों की संख्या होती &lt;strong&gt;- 39&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो देखा आपने कि इस स्थित में सचिन कितने आगे पहुंच गए होते। तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि भारतीय पोंटिंग आस्ट्रेलियाई सचिन का रिकार्ड भी तोड़ पाएगा। लेकिन हमारे भारतीय सचिन ने कम मौकों के बावजूद ऐसे मुकाम तय किए हैं जहां पहुंचने में ज्यादा मौके पाने वाले आस्ट्रेलियाई पोंटिंग को अभी भी बहुत मेहनत करनी होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-6708265121722004243?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6708265121722004243/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=6708265121722004243' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6708265121722004243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6708265121722004243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/07/55.html' title='सचिन अगर आस्ट्रेलियाई होते तो टेस्ट में अब तक 55 शतक जमा चुके होते'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3462691068629639138</id><published>2009-06-16T21:07:00.003+05:30</published><updated>2009-06-16T21:29:49.106+05:30</updated><title type='text'>तो गोलू के बाथरूम जाने से हार गया भारत</title><content type='html'>भारतीय टीम ट्वंटी 20 विश्व कप से बाहर हुई तो इसके सबसे बड़े कारणों में धोनी की घटिया बल्लेबाजी, फील्डरों के खराब प्रदर्शन के साथ-साथ गोलू का भारतीय पारी के दौरान बाथरूम जाना भी रहा। क्या कहा आपने, ये गोलू कौन है ----, गोलू को नहीं जानते ----। गोलू 12 साल का वह बालक है जो भारतीय पारी के दौरान अगर बाथरूम गया तो विकेट गिरने की संभावना कफी बढ़ जाती है। गोलू खुद तो ऐसा नहीं मानता लेकिन उसके भैया और तमाम दोस्त यही बात कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप और हम भी शायद उस गोलू की तरह या उसके भैया और दोस्तों के जैसे हैं जो भारत के मैचों के दौरान तमाम किस्म के टोटके करते हैं। कभी-कभी तो इसक खुमार मैच खत्म होने के दो-तीन दिन बाद तक भी रहता है। भारत मैच हारा और अगले दिन परचून की दुकान जाते वक्त पड़ोसी मिल जाता है और कहता क्यों भाई साहब हरवा ही दिया आपने इंडिया को। इस पर जवाब होता है अरे भाई साबह मैंने नहीं गोलू (भोलू, संदीप, रमेश, सुरेश भी हो सकते हैं जिम्मेदार) ने हरवा दिया। युवराज बैटिंग कर रहा था और वह बाथरूम जाने की जिद करने लगा। आप तो जानते ही हैं वह बाथरूम जाता है तो क्या होता है। वह लौटा नहीं कि युवी स्टंप आउठ होकर पैवेलियन लौट चुका था। वह क्रीज पर थोड़ी देर और टिक जाता तो मैच का नक्शा बदल जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य की बात है कि इस तरह के टोटकों में यकीन रखने वाले कोई अनपढ़ या गंवार नहीं होते। वह पत्रकार, बैंकर, आईएएस अफसर से लेकर मल्टीनेशनल कम्पनियों का कोई कर्मचारी भी हो सकता है। जिस पर रौब जमा उससे तो टोटके करवा लिए और नहीं जमा तो मन में सैकड़ों गालियां दे डाली। साला जाता भी नहीं---- पूरा मैच देखेगा और इंडिया की वाट लगा के ही दम लेगा। हालांकि मजा तब आता है जब ऐसे लोग खुद किसी दूसरे के टोटके का पात्र बन जाते हैं। तब इन्हें बड़ा अजीब लगता है। सोचते हैं कि मैं तो मैच जिताऊ प्लेयर हूं कोई बाहरी (आस्ट्रेलियाई ग्रेग चैपल की तरह) मुझे क्या नसीहत देगा। ऐसा लगता है कि धोनी, युवराज, इरफान जहीर की मेहनत तो बस यूं ही है मैच तो यही जिताते हैं तीन घंटे एक ही कुर्सी पर बैठ कर, पेशाब दबा कर, पानी न पीकर या बहुत पानी पी कर। ताज्जुब है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं ये टोटके सिर्फ आम जन ही करते हैं। ये क्रिकेटर भी कम नहीं भाई साहब। कोई बाएं पैर में पहले पैड बांधता है तो कोई लाल रुमाल लेकर क्रीज पर जाता है, कोई ग्लव्स में स्क्वैश की गेंद रखता है तो कोई मैच के दौरान टी-शर्ट बदलता है। कितनी जायज है ये टोटकेबाजी या किसी के ऊपर शुभ-अशुभ का ठप्पा लगा देना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट मैच तो हल्की-फुल्की बात है लेकिन ये आदत जिन्दगी के गम्भीर क्षणों में भी पीछा नहीं छोड़ती। वो ऑफिस में आया इसलिए मेरी नौकरी गई। सवेरे उसका चेहरा देख लिया तो दिन खराब हो गया। फलां साला है ही मनहूस--- आदि-आदि। ये कोई हंसी-मजाक नहीं। क्या ऐसी सोच को क्रिकेट में जायज और गम्भीर मसलों पर नाजायज है। गलत तो गलत ही है चाहे किसी भी अवसर पर क्यों न हो। आपका क्या कहना है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3462691068629639138?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3462691068629639138/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3462691068629639138' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3462691068629639138'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3462691068629639138'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_16.html' title='तो गोलू के बाथरूम जाने से हार गया भारत'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3846373850558613363</id><published>2009-06-15T21:45:00.001+05:30</published><updated>2009-06-15T21:47:56.040+05:30</updated><title type='text'>उफ्फ ये क्रिकेट की अनिश्चितताएं</title><content type='html'>क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है---- इसका इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि मौजूदा ट्वंटी विश्व कप में अब तक एक भी मैच नहीं हारने वाली श्रीलंका की टीम अगर मंगलवार को न्यूजीलैण्ड से एक रन से भी हारती है तो वह टूर्नामेंट से बाहर हो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीलंका ने ग्रुप ऑफ डेथ माने जाने वाले ग्रुप सी में अपने दोनों मैच जीते (आस्ट्रेलिया और वेस्टइण्डीज के खिलाफ)। इसके बाद सुपर एट में ग्रुप एफ में उसने पाकिस्तान और आयरलैण्ड को भी हराया। लेकिन अब स्थितियां ऐसी बन गई कि न्यूजीलैण्ड के खिलाफ होने वाला उसका मैच अचानक ही करो या मरो वाला हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रुप एफ में पाकिस्तान ने सोमवार को आयरलैण्ड पर बड़ी जीत दर्ज की। इससे पहले वह श्रीलंका से हार गया था जबकि न्यूजीलैण्ड से जीता था। आयरलैण्ड से मैच के बाद पाक टीम का नेट रन रेट 1.185 हो गया जो कि श्रीलंका (0.700) और न्यूजीलैण्ड (0.093) दोनों से बेहतर है। फिलहाल पाकिस्तान और श्रीलंका के सुपर एट में दो-दो जीत से चार अंक हैं जबकि न्यूजीलैण्ड के पास एक जीत (आयरलैण्ड के खिलाफ) से दो अंक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी न्यूजीलैण्ड का नेट रन रेट श्रीलंका से बेहतर है। अगर वह श्रीलंका के खिलाफ मैच जीत जाता है तो ग्रुप एफ से पाकिस्तान, श्रीलंका और आयरलैण्ड तीनों के चार-चार अंक हो जाएंगे। ऐसे में नेट रन रेट से पहली दो टीमों का फैसला होगा और पाकिस्तान और न्यूजीलैण्ड सेमीफाइनल में पहुंच जाएं। बेचारा श्रीलंका जो अब तक चार में चार में से चारों मैच में जीत दर्ज की टूर्नामेंट से बाहर हो जाएगा। मैं नहीं चाहता ऐसा हो क्योंकि प्रदर्शन के लिहाज से श्रीलंकाई टीम ज्यादा डीजर्विंग है लेकिन ट्वंटी 20 में कुछ भी अनुमान लगाना असंभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले ट्वंटी 20 विश्व कप में दक्षिण अफ्रीका के साथ भी ऐसा ही हुआ था जिसने अपने पहले चार मैच जीते लेकिन भारत के खिलाफ एक मैच हारने के बाद वह टूर्नामेंट से बाहर हो गया। वह रन रेट के आधार पर भारत और न्यूजीलैण्ड से पिछड़ गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3846373850558613363?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3846373850558613363/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3846373850558613363' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3846373850558613363'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3846373850558613363'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_402.html' title='उफ्फ ये क्रिकेट की अनिश्चितताएं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-8271016647165638216</id><published>2009-06-15T03:21:00.000+05:30</published><updated>2009-06-15T03:22:42.440+05:30</updated><title type='text'>गनीमत है ये क्रिकेट नहीं चलाते</title><content type='html'>हमारी क्रिकेट टीम ट्वंटी 20 विश्व कप के सेमीफाइनल की होड़ से बाहर हो गई। क्या इससे रातों-रात टीम इण्डिया गई गुजरी हो गई? क्या धोनी चतुर कप्तान से फिसड्डी कप्तान हो गए? क्या गौतम गम्भीर, रोहित शर्मा, जहीर खान, हरभजन सिंह जैसे क्रिकेटर अब क्रिकेटर न हो कर कबाड़ हो गए? क्या अब भारतीय टीम को वापस देश लाने के बजाय प्रशांत महासागर में डूबो देना चाहिए (करीब 15 साल पहले विशन सिंह बेदी शारजाह में भारतीय टीम की हार पर ऐसा कहा था) ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त लिखे किसी जवाल का जवाब हां नहीं है। और गनीमत है कि जो इनका जवाब हां में देते हैं वो इस देश की क्रिकेट नहीं चलाते। भारतीय टीम हारी जाहिर है खराब खेली इसलिए हारी लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टीम ही खराब हो गई। क्रिकेट फॉर्म का खेल है और दुर्भाग्य है हमारे कई खिलाड़ी एक साथ आउट ऑफ फॉर्म हो गए। गम्भीर टच में नहीं थे, सहवाग के अचानक लौटने से रोहित को ओपनिंग करनी पड़ गई। रैना पहली बार इंग्लैण्ड गए थे। जहीर-ईशांत अपनी लय में नहीं थे (याद रखे कुछ ही दिन पहले इन्हें दुनिया की सबसे खतरनाक तेज गेंदबाज जोड़ी कहा जा रहा था)। धोनी की कप्तानी पहले जैसे ही रही हां वह बल्लेबाजी में जरूर खराब साबित हुए। उन्होंने इन दिनों शॉट खेलने की क्षमता खो दी है। लेकिन यह वापस आ सकती है। पिछले विश्व कप में उन्होंने जिस बल्लेबाज को क्रीज पर भेजा उसने रन बनाए, जिस गेंदबाज के हाथ में गेंद दी उसने विकेट लिए। इस बार ऐसा नहीं हुआ। होता है ऐसा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम भी ऑफिस में रोज एक जैसा काम नहीं करते। कभी यहां कभी वहा गलती होती रहती है जिसे हम ठीक करते रहते हैं। क्रिकेट में इतनी सी गलती से बल्लेबाज आउट हो जाते हैं और वह हमारी तरह इसे बदल नहीं सकते। &lt;br /&gt;मुमकिन है कल धोनी के घर कुछ बेवकूफ क्रिकेट प्रशंसक पत्थरबाजी कर दे। कहीं जहीर का पुतला फूंका जाए तो कहीं रोहित शर्मा के नाम की हाय-हाय हो। लेकिन यह कितना जायज है। धोनी को बदल कर किसे कप्तान बना देंगे। है कोई विकल्प। गम्भीर से बेहतर ओपनर कौन है हमारे पास। क्या कोई अन्य भारतीय ट्वंटी 20 क्रिकेट में रोहित शर्मा से बेहतर यूटीलिटी प्लेयर है। समय है इस हार को पचाने का। ज्यादा शोर-शराबे से कुछ होगा नहीं। नाहक ही टीम पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। और यह कोई वह विश्व कप नहीं जो चार साल में एक बार होता है। अगला ट्वंटी 20 विश्व कप अगले ही साल होना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद भारत को वेस्टइण्डीज जाना है चार वनडे की सीरीज खेलने। सितंबर में चैम्पियंस ट्रॉफी भी होगी। अक्टूबर में आस्ट्रेलियाई टीम भारत आ रही है सात वनडे खेलने। और भी कई मैच हैं। हमें टीम का मनोबल सिर्फ इस हार की वजह से गिरने नहीं देना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-8271016647165638216?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/8271016647165638216/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=8271016647165638216' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8271016647165638216'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8271016647165638216'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html' title='गनीमत है ये क्रिकेट नहीं चलाते'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2261850122934653130</id><published>2009-06-14T13:56:00.001+05:30</published><updated>2009-06-14T13:56:46.776+05:30</updated><title type='text'>न्यूजीलैण्ड टीम का साइकोलॉजिकल बैरियर</title><content type='html'>अगर आपने 1986 में शारजाह में हुए आस्ट्रेलेशिया कप का फाइनल देखा नहीं होगा तो इसके बारे में सुना जरूर होगा। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस मैच के आखिरी ओवर की आखिरी गेंद पर पाकिस्तान को जीत के लिए चार रन की दरकार थी। भारतीय गेंदबाज चेतन शर्मा ने फुलटॉस गेंद डाली और जावेद मियांदाद ने इसपर छक्का जड़ दिया। इस मैच के बाद भारतीयों का दिल ऐसा टूटा कि आने वाले कुछ सालों तक भारतीय टीम पाकिस्तान के खिलाफ नजदीकी मैच जीत ही नहीं पाती थी। यानी भारतीय टीम पाकिस्तान के खिलाफ एक साइकोलोजिकल बैरियर से ग्रस्त हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही साइकोलोजिकल बैरियर पाकिस्तान टीम को भारत के खिलाफ विश्व कप मैचों में है। किसी भी क्रिकेट विश्व कप में दोनों टीमों की तैयारी या फॉर्म कैसी भी क्यों न हो आपसी मुकाबले में जीत भारत की ही होती है। यह सिलसिला 1992 वनडे विश्व कप से शुरू हुआ और दक्षिण अफ्रीका में हुए पिछले ट्वंटी 20 विश्व कप तक जारी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह के एक मनोवैज्ञानिक अवरोध से न्यूजीलैण्ड की टीम भी ग्रस्त है। आज की तारीख में वह पाकिस्तान से अच्छी और बेहतर फॉर्म वाली ट्वंटी 20 टीम थी लेकिन 13 जून को हुए मैच में उसे पाकिस्तान ने आसानी से मात दे दी। पाकिस्तान के खिलाफ हथियार डाल देने का कीवी टीम का सिलसिला 1992 विश्व कप के सेमीफाइनल के बाद शुरू हुआ। इस विश्व कप में मार्टन क्रो की कप्तानी में न्यूजीलैण्ड की टीम बेहतरीन प्रदर्शन कर रही थी। उसने लगातार सात लीग मैच जीते। आठवें और आखिरी लीग मैच में न्यूजीलैण्ड का सामना पाकिस्तान से था। कहा जाता है कि न्यूजीलैण्ड यह मैच जानबूझ कर हार गया। अगर वह यह मैच जीतता तो सेमीफाइनल में उसका सामना आस्ट्रेलिया से आस्ट्रेलिया में होता और हार की स्थिति में उसे अपने देश में पाकिस्तान से ही भिड़ना था। पाकिस्तान की टीम उस विश्व कप में तब तक अच्छा खेल पाने में असफल रही थी औऱ क्रो भरोसा था कि वह इमरान की टीम को सेमीफाइनल में आसानी से हरा देगी। सेमीफाइनल में न्यूजीलैण्ड ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 262 रन का सम्मानजनक स्कोर बनाया। उस समय 250 से ऊपर का स्कोर मैच जिताऊ माना जाता था। जवाब में पाकिस्तान की टीम 140 रन पर चार विकेट गंवाकर काफी दबाव में थी क्योंकि तब तक ओवर भी काफी निकल गए थे। यहीं से इंजमाम उल हक ने ऐसी पारी खेली जिसे उनके प्रशंसक आज भी याद रखे हुए हैं। उन्होंने 37 गेंदों पर 60 रन ठोक डाले और पाकिस्तान को जीत दिला न्यूजीलैण्ड का सपना चकनाचूर कर दिया। &lt;br /&gt;इस हार के बाद कीवी टीम कभी भी विश्व कप में पाकिस्तान के खिलाफ मैच नहीं जीत पाई है। उसे 1996 और 1999 वन विश्व कप में पाक ने बुरी तरह हराया। 2003 और 2007 विश्व कप में इन दोनों का सामना नहीं हुआ। पिछले ट्वंटी 20 विश्व में और इस ट्वंटी 20 विश्व कप में पाकिस्तान न्यूजीलैण्ड के खिलाफ भारी पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट में किसी टीम या या कुछ खिलाड़ियों के और भी ऐसे साइकोलॉजिकल बैरियर रहे हैं। कुछ ने इससे पार पा लिया तो कुछ अभी भी इससे जूझ रहे हैं। जैसे शेन वार्न अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर में सचिन तेंदुलकर के सामने सफल नहीं हुए। पाकिस्तानी बल्लेबाजों को वेंकटेश प्रसाद से हमेशा दिक्कत हुई। ट्वंटी 20 में भारत न्यूजीलैण्ड से नहीं जीत पाता है। मिस्बाह उल हक पाकस्तानी टीम को जीत के करीब ले जाकर आउट हो जाते हैं खास कर भारत के खिलाफ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो इंग्लैण्ड की टीम भी इन दिनों भारत के खिलाफ कोई बड़ा मैच नहीं जीत सकी है। यह सिलसिला 1999 वन-डे विश्व कप से शुरू हुआ था। देखने वाली बात है कि लॉर्ड्स में आज क्या होगा। याद रखिए भारत आज हारा तो बाहर। फिर सब मिलकर फीफा कनफेडरेशन कप फुटबाल देखेंगे। ब्राजील और इटली के जलवे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2261850122934653130?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2261850122934653130/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2261850122934653130' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2261850122934653130'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2261850122934653130'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_14.html' title='न्यूजीलैण्ड टीम का साइकोलॉजिकल बैरियर'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1763894804445366749</id><published>2009-06-13T19:49:00.000+05:30</published><updated>2009-06-13T20:00:35.194+05:30</updated><title type='text'>क्या इंग्लैण्ड के खिलाफ योजना बदलेंगे धोनी?</title><content type='html'>सुपर एट चरण में भारत की शुरुआत अच्छी नहीं रही और उसे वेस्टइण्डीज के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इस हार से इतना तो तय हो गया कि जिस योजना के साथ भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी टूर्नामेंट में उतरे वह सफल नहीं हो रही है। अब इंग्लैण्ड के खिलाफ रविवार को होने वाले मैच में धोनी को नई योजना या यूं कहें कि प्लान बी के साथ उतरना होगा नहीं तो गत विजेता भारत टूर्नामेंट के बीच में ही सेमीफाइनल की होड़ से बाहर हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी की योजना की सबसे बड़ी खामी रही कि वह अब तक हुए मैचों में पांच विशेषज्ञ गेंदबाजों के साथ उतरे। इससे भारत के बल्लेबाजी क्रम की गहराई कम हुई और बल्लेबाजों के ऊपर विकेट बचाने का अतिरिक्त दबाव भी आया। सबसे ज्यादा दबाव में तो खुद कप्तान ही दिखे जिन्होंने कैरेबियाई टीम के खिलाफ 23 गेंदें झेल कर सिर्फ 11 रन बनाए। उनके अलावा गौतम गंभीर भी वह तेजी नहीं दिखा सके जिसके लिए वह जाने जाते हैं। ट्वंटी 20 मूलत: बल्लेबाजों का खेल है और यहां उन्हें खुलकर खेलने की आजादी मिलनी ही चाहिए। अगल विकेट बचाने का दबाव आया तो जाहिर है रन रेट कम होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भारत को फिर से सात बल्लेबाजों की थ्योरी अपनानी होगी। इसके लिए हरभजन या प्रज्ञान ओझा में से एक को अंतिम एकादश से बाहर कर दिनेश कार्तिक को टीम में शामिल करना होगा। यह मुश्किल फैसला हो सकता है लेकिन टीम के हित में ऐसा करना बेहद जरूरी हो गया है। साथ ही ईशांत शर्मा के स्थान पर प्रवीण कुमार को मौका दिया जाना चाहिए। प्रवीण आईपीएल में बेहद सफल रहे थे और वह जरूरत पडऩे पर कुछ रन भी बना सकते हैं। सुरेश रैना, युवराज सिंह, रोहित शर्मा और यूसुफ पठान मिलकर चार ओवर तो डाल ही सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके आलावा धोनी एक और बड़ी गलती जो कर रहे हैं वह है उनका बल्लेबाजी क्रम में ऊपर आना। पहले बांग्लादेश के खिलाफ हुए ग्रुप मैच में और फिर वेस्टइण्डीज के खिलाफ मैच में धोनी ने जरूरत से ज्यादा गेंदें व्यर्थ की। वनडे मैचों में संकट के समय उनकी ऐसी बल्लेबाजी तो जायज है लेकिन ट्वंटी 20 क्रिकेट में ऐसे प्रदर्शन से टीम को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। धोनी पिछले करीब दो साल निचले मध्यक्रम में बल्लेबाजी के लिए आते हैं और सिंगल, डबल के सहारे अपनी पारी को आगे बढ़ाते हैं। अब वह भले ही ऊपर बल्लेबाजी के लिए आ रहे हों लेकिन सिंगल-डबल वाली उनकी आदत गई नहीं। खुद नीचे आने के साथ-साथ उन्हें बल्लेबाजी क्रम में भी बदलाव करने चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंभीर के साथ ओपनिंग जिम्मेदारी यूसुफ पठान को सौंपी जाए। क्योंकि गंभीर अभी तक पुरानी रंगत में नहीं लौटे हैं ऐसे में यूसुफ के साथ रहने से टीम का रन रेट अच्छा रहेगा। तीसरे नंबर पर रैना और चौथे नंबर पर युवराज बल्लेबाजी करें। पांचवें नंबर पर रोहित शर्मा को मौका मिले। छठे नंबर पर कार्तिक और सातवें नंबर पर धोनी आएं। अगर धोनी यूसुफ को मध्य क्रम में इस्तेमाल करना चाहते हैं तो इरफान पठान से ओपनिंग कराई जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीम में सात बल्लेबाज होने से भारत को किसी बड़े स्कोर का पीछा करने में भी ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी। आश्चर्य की बात तो यह है कि जब भारत पिछले विश्व कप समेत तमाम टूर्नामेंट में इस फॉर्मूले के साथ कामयाब हुआ तो यहां इसमें बदलाव की क्या जरूरत थी। पांच गेंदबाजों की थ्योरी उस टीम के लिए अच्छी है जिसके पास क्वालिटी ऑलराउंडर हों लेकिन भारत के साथ ऐसा नहीं है। यहां तक ऑलराउंडरों से भरपूर दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड ने भी सात बल्लेबाजों के साथ उतरने पर ही भरोसा किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1763894804445366749?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1763894804445366749/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1763894804445366749' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1763894804445366749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1763894804445366749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_13.html' title='क्या इंग्लैण्ड के खिलाफ योजना बदलेंगे धोनी?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-4017704779831572006</id><published>2009-06-11T13:46:00.002+05:30</published><updated>2009-06-11T18:31:21.245+05:30</updated><title type='text'>धोनी और सहवाग में मनमुटाव नई बात नहीं</title><content type='html'>इस ट्वंटी 20 विश्व कप में भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और उप कप्तान वीरेन्द्र सहवाग के बीच मनमुटाव की अटकलों ने भारतीय टीम के शुरुआती प्रदर्शन से भी ज्यादा सुर्खियां बटोरी। अंततः चोटिल सहवाग वापस स्वदेश लौट गए और उनके स्थान पर दिनेश कार्तिक टीम इंडिया से जुड़ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी ने सहवाग के मुद्दे पर संवाददाता सम्मेलनों में जिस तरह जवाब दिया उससे मीडिया का इन दोनों के संबंध में खटास का अनुमान लगाना बिल्कुल जायज था। धोनी को इस पर गुस्सा होने की बजाय स्थिति साफ करनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हां उन्होंने अगले प्रेस कांफ्रेंस में पूरी टीम की यूनिटी परेड कराकर ड्रामेबाजी जरूर की। &lt;br /&gt;अब मुद्दे की बात की जाए। जिन लोगों को धोनी और सहवाग के बीच अनबन की खबर से अचरज हो रहा हो तो उन्हें पता होना चाहिए कि इन दोनों के संबंध कभी बहुत मधुर नहीं रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले ट्वंटी 20 विश्व कप को ही याद कीजिए। जिस फाइनल मुकाबले में भारत ने पाकिस्तान को हराकर खिताब जीता था उस मैच में धोनी ने सौ फीसदी फिट सहवाग को अंतिम एकादश में शामिल नहीं किया था। इसके अलावा भी उन्होंने इस टूनार्मेंट के एक और मैच में भी सहवाग को टीम में नहीं लिया था। इसके बाद भी धोनी ने आगे हुए कई मैचों में सहवाग को टीम में शामिल नहीं किया। इस बीच सहवाग ने भारतीय टेस्ट टीम में भी अपनी जगह गंवा दी। हालांकि तब धोनी टेस्ट टीम के कप्तान नहीं थे। भारतीय टीम के 2007-08 के आस्ट्रेलियाई दौरे पर तत्कालीन कप्तान अनिल कुम्बले सहवाग की टेस्ट टीम में वापसी कराई। पर्थ के ऐतिहासिक टेस्ट में दो छोटी लेकिन अच्छी पारियां खेलने के बाद सहवाग ने एडीलेड टेस्ट में शानदार शतक जड़ा और वह इसके बाद त्रिकोणीय वनडे सीरीज में भी टीम में लौट गए। लेकिन तब तक भी धोनी का सहवाग पर पूरा भरोसा नहीं जमा था और उन्होंने कुछ मैचों में उन्हें अंतिम एकादश में नहीं रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी का सहवाग पर अविश्वास करने की जो प्रमुख कारण हैं उनमें एक सहवाग का फिटनेस पर पूरा ध्यान नहीं देना भी है। साथ ही वह बल्लेबाजी के वक्त कई बार गैर जिम्मेदार भी हो जाते हैं। लेकिन यही सबसे बड़ी वजह नहीं जान पड़ती है। यह ऐसा बहाना लगता है जिसे धोनी सहवाग के खिलाफ इस्तेमाल करने की ताक में रहते हैं। नहीं तो धोनी उस आर.पी.सिंह के पक्ष में कप्तानी से इस्तीफा देने की धमकी कैसे दे दते जिनकी फिटनेस और फील्डिंग टीम में सबसे खराब है (यह वाकया कुछ दिनों पहले ही हुआ था जब चयनकर्ताओं ने आरपी के स्थान पर इरफान पठान को टीम में रखा था और धोनी नाराज हो गए थे)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहवाग-धोनी के अनबन के पीछे सबसे बड़ा कारण सहवाग का उपकप्तान होना है। अगर धोनी काफी लोकप्रिय हैं तो सहवाग उनसे पीछे नहीं। धोनी अगर चतुर कप्तान माने जाते हैं तो यह खूबी सहवाग में भी है (हालांकि पिछले एक-दो अवसरों पर मिले मौकों को नहीं भुना सके)। सहवाग से पहले धोनी के परम मित्र युवराज सिंह टीम के उप कप्तान थे। लेकिन एक समय उन्होंने टीम पर ध्यान देने से ज्यादा अन्य बातों को तरजीह देना शुरू कर दिया था लिहाजा चयनकर्ताओं ने उनकी उपकप्तानी छीन ली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा यह भी जा रहा है कि सहवाग ने अपनी चोट छिपाई लेकिन इस तर्क में दम नजर नहीं आ रहा है। सहवाग आईपीएल टूर्नामेंट से ही चोटिल हैं और यह बात तह उन्होंने छिपाई नहीं थी। वह इस चोट के कारण दिल्ली डेयर डेविल्स के लिए कई मैच नहीं खेल पाए थे। यह भले हो सकता है कि भारतीय टीम के फीजियो ने सहवाग की चोट का गलत आकलन किया हो। उन्हें लगा कि सहवाग जल्द ठीक हो जाएंगे लेकिन वह नहीं हुए। ऐसा तो होता रहता है। जहीर खान के साथ भी ऐसा ही हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामला यह भी है कि सहवाग आजकल सलामी बल्लेबाजी नहीं करना चाहते हैं और यह बात धोनी को पसंद नहीं। सहवाग की इच्छा नंबर तीन पर बल्लेबाजी करने थी लेकिन धोनी ने खुद नंबर तीन पर आना शुरू कर दिया। यह बात अलग है कि आईपीएल में उन्होंने अपनी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के लिए सुरेश रैना को नंबर तीन का जिम्मा सौंपा था जिसमें वह काफी सफल भी रहे थे। यही रैना इस विश्व कप में अब तक ठीक से अभ्यास भी नहीं कर पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोनी निंसदेंह अच्छे कप्तान रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने गलत कदम उठा दिया है। सहवाग मुद्दे को वह काफी व्यक्तिगत स्तर पर ले जा रहे हैं जिससे आगे चलकर उनका और टीम का ही नुकसान होने वाला है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-4017704779831572006?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/4017704779831572006/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=4017704779831572006' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4017704779831572006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4017704779831572006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post_11.html' title='धोनी और सहवाग में मनमुटाव नई बात नहीं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6676523209741618362</id><published>2009-06-07T14:05:00.003+05:30</published><updated>2009-06-07T19:08:29.566+05:30</updated><title type='text'>देश के नाम पर</title><content type='html'>खेल की दुनिया में ‘प्रोफेसनल अप्रोच’ का बड़ा महत्व है। यानी आप चाहे देश के लिए खेलें या किसी क्लब के लिए अपना शत प्रतिशत योगदान दें। विश्व में विभिन्न खेलों के कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो इस ‘प्रोफेसनल अप्रोच’ वाले मंत्र को गहरे आत्मसात किए होते हैं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो देश के लिए कमतर और क्लब के लिए बेहतर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन भारत के कुछ खिलाड़ी ऐसे हैं जिनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तभी सामने आता है जब वे देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हों। टेनिस में लिएंडर पेस और क्रिकेट में सौरव गांगुली कुछ ऐसे ही नाम हैं। मौजूदा समय में युवराज सिंह और वीरेन्द्र सहवाग भी ऐसे ही क्रिकेटर हैं जिनका असली रंग तभी निखरता है जब हो तिरंगे के नीचे खेल रहे हों न कि किंग्स इलेवन पंजाब या दिल्ली डेयर डेविल्स के झंडे तले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही संपन्न इंडियन प्रीमियर लीग के दूसरे संस्करण में यह दोनों बल्लेबाज कुछ खास नहीं कर पाए। लेकिन ट्वंटी 20 विश्व कप में भारत के पहले ही मैच में युवराज फॉर्म में लौट आए। उनके 18 गेंदों पर चार छक्कों की मदद से बनाए 41 रन ने बांग्लादेश के उटलफेर की सारी मंशाओं पर पानी फेर दिया। सहवाग चोटिल होने के कारण इस मैच में नहीं खेल सके लेकिन इतना तय है कि मौका मिलने पर वह भी आईपीएल के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के नाम पर अच्छा खेलने की इन खिलाड़ियों की इस खासियत से चयनकर्ता भी परिचित हैं। तभी तो घरेलू क्रिकेट में इनके औसत प्रदर्शन के बावजूद इन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में जौहर दिखाने का मौका मिलता रहता है। याद कीजिए भारत के पिछले आस्ट्रेलियाई दौरे के लिए सहवाग की वापसी को। उस समय सहवाग भारतीय टीम से बाहर थे और उन्होंने उन दिनों में घरेलू क्रिकेट में भी कोई कमाल नहीं दिखाया था। लेकिन तात्कालीन कप्चान अनिल कुम्बले की मांग पर सहवाग टीम में वापस आए। इसके बाद जो हुआ वह अपने आप में इतिहास है। युवराज के साथ भी ऐसा ही है। पंजाब की रणजी टीम या किंग्स इलेवन पंजाब के लिए उन्होंने अब तक कोई ऐसी पारी नहीं खेली है जिसे दर्शक लम्बे समय तक याद रखें। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्होंने कई कभी न भूलने वाली पारियां खेली हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण नजर आता है वह यह है कि भारत और भारतीयों को  अच्छा करने की प्रेरणा प्रोफेशनल कारणों से नहीं बल्कि इमोशनल कारणों से मिलती है। जाहिर है जो भावनात्मक उबाल देश के नाम पर आ सकता है वह क्लब या राज्य के नाम पर नहीं आ सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-6676523209741618362?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6676523209741618362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=6676523209741618362' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6676523209741618362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6676523209741618362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='देश के नाम पर'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-935812138701552017</id><published>2009-03-27T20:23:00.000+05:30</published><updated>2009-03-27T20:25:28.651+05:30</updated><title type='text'>टीम इंडिया पर उसी के हथियार से हमला</title><content type='html'>पाटा विकेट। तेज गेंदबाज बेअसर। फिर दोनों छोर से स्पिन आक्रमण। ललचाती गेंदों पर आसमानी शॉट खेलने के चक्कर में अपने विकेट गंवाता बल्लेबाज। ये कुछ ऐसे नजारे हैं जो टीम इंडिया के टेस्ट मैचों में अक्सर दिखाई देते हैं। नेपियर के मैक्लीन पार्क में भारत और न्यूजीलैण्ड के बीच चल रहे दूसरे टेस्ट मैच के दूसरे दिन भी यह नजारा दिखा। लेकिन पहले और अब में एक बड़ा अंतर यह रहा कि गेंदबाजी पर विपक्षी टीम थी और विकेट फेंक रहे थे भारतीय बल्लेबाज।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्पिन आक्रमण के खिलाफ भारतीय बल्लेबाजों की मजबूती जग जाहिर है लेकिन न्यूजीलैण्ड के कप्तान डेनियल विटोरी जो खुद भी एक उम्दा लेफ्ट आर्म स्पिनर हैं भारतीयों के खिलाफ उसी के हथियार के इस्तेमाल की रणनीति अपना रहे हैं। भारतीय टीम जब न्यूजीलैण्ड रवाना हुई तब उसे सबसे ज्यादा डर वहां की उछाल और स्विंग की मददगार पिचों से था। स्पिन की चुनौती की उम्मीद तो उसे बिल्कुल भी नहीं रही होगी। लेकिन जब रफ्तार की योजना फेल हो गई तो कीवियों के कप्तान ने भारतीयों को फिरकी के जाल में फांसने की योजना बनाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीम इंडिया के बल्लेबाजों को यह बात टेस्ट मैच शुरू होते ही समझ जानी चाहिए थी क्योंकि न्यूजीलैण्ड इस मैच में दो स्पिनरों (विटोरी और जीतन पटेल) के साथ उतरा था। वहीं भारतीय थिंक टैंक ने सिर्फ एक स्पिनर (हरभजन सिंह) को खिलाने का फैसला किया। अब विटोरी का यह फैसला रंग लाता दिख रहा है। इसे कम से कम शुरुआती सफलता तो मिल ही गई। वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर दोनों ही स्पिन के खिलाफ धाकड़ खिलाड़ी माने जाते हैं लेकिन ये दोनों खुद को विटोरी के बुने जाल में फंसने से नहीं रोक सके। सहवाग विटोरी को लगातार दूसरा छक्का जडऩे के प्रयास में विकेटकीपर ब्रैंडन मैकुलम को कैच थमा बैठे तो गंभीर इन फील्ड के ऊपर से शॉट खेलने के प्रयास में पटेल का शिकार बन गए। नाइट वाचमैन ईशांत शर्मा ने कुछ देर तो हौसला दिखाया लेकिन शाम ढलते-ढलते विटोरी ने उन्हें भी पैवेलियन में हवा खाने भेज दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब स्पिन के खिलाफ भारतीयों की प्रतिष्ठा दाव पर है। सचिन और राहुल द्रविड़ क्रीज पर हैं जबकि अगला नंबर वीवीएस लक्ष्मण का है। ये सभी स्पिन के खिलाफ धुरंधर बल्लेबाज हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि वे भारत को संकट से उबार ले जाएंगे। लेकिन भारत अभी भी कीवी टीम से पहली पारी के आधार पर 500 से ज्यादा रनों से पीछे है और इसका दबाव इन बल्लेबाजों पर भी पड़ सकता है। मैच के तीसरे दिन भारतीय किस तरह इस चुनौती का सामना करते हैं यह देखने वाली बात होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-935812138701552017?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/935812138701552017/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=935812138701552017' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/935812138701552017'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/935812138701552017'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='टीम इंडिया पर उसी के हथियार से हमला'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6940733051892705192</id><published>2008-12-29T14:10:00.000+05:30</published><updated>2008-12-29T14:11:47.888+05:30</updated><title type='text'>भारत और सचिन के पास मौके कम हैं</title><content type='html'>पिछले एक दशक में यह (२००८) क्रिकेट का सबसे उथलपुथल वाला साल रहा. ऑस्ट्रेलियाई वर्चस्व के बीच हरभजन-साइमंड्स विवाद से शुरू हुआ यह साल ख़त्म होते-होते मेलबर्न में ऑस्ट्रेलियाई टीम के पराक्रम के दौर के अवसान का साक्षी बन रहा है. दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ मेलबर्न टेस्ट के चौथे दिन कंगारू हार की कगार पर खड़े हैं और किसी चमत्कार के कारण अगर वो यह मैच जीत भी जाते हैं तो भी इतना तय है कि आने वाले समय में वह नंबर एक कि कुर्सी से हटाये जाने वाले हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद तो थी कि टीम इंडिया शीर्ष पर पहुचेगी लेकिन मौजूदा हालत में यह गद्दी दक्षिण अफ्रीका को मिलने वाली है. यह भले ही हो सकता है कि भारत नंबर २ पर बना रहे और ऑस्ट्रेलिया नए साल में तीसरे या चौथे पायदान पर खिसक जाए. भारत टेस्ट में वर्ष २००९ में नंबर एक नही बनने वाला. इसके पीछे २ कारण हैं. पहला इस साल भारत महज सात टेस्ट मैच खेलेगा. इनमे से दो न्यूजीलैंड के साथ, तीन श्रीलंका के साथ और दो बांग्लादेश के साथ. ये तीन टीम आईसीसी रैंकिंग में इतना पीछे है कि भारत को इन्हे हरा कर भी ज्यादा अंक नही मिलने वाला. अगर दक्षिण अफ्रीका ऑस्ट्रेलिया को हरा कर नंबर एक बनता है तो उस समय उसके और भारत के बीच करीब १४ अंक का फासला होगा. इस फासले को कम करने के लिए हमारे पास अगले साल ज्यादा मौके नही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीँ दक्षिण अफ्रीका भी अगले साल केवल आठ टेस्ट मैच ही खेलेगा लेकिन ये मैच वह ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी अच्छी रैंकिंग वाली टीमों के खिलाफ खेलेगा. अफ्रीकी टीम अगर जीत जाती है तो वह भारत से अपना अन्तर और बढ़ा लेगी. यदि वह हार जाती है तो उसे हराने वाली टीम (ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड) भारत के बराबर या आगे निकल जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसा ही माजरा सचिन तेंदुलकर के सर्वाधिक टेस्ट शतक के रिकॉर्ड के साथ भी दिख रहा है. वह अभी तक ४१ शतक जमा चुके हैं. दूसरे स्थान पर कायम पोंटिंग ने ३७ शतक ठोके हैं. वहीँ ऑस्ट्रेलिया को २००९ में कम से कम १२ टेस्ट खेलने हैं. अगर वो पाकिस्तान के खिलाफ खेलती है उसके टेस्ट मैचों कि संख्या १५ हो जायेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑस्ट्रेलिया को दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ उछालभरी पिचों पर खेलना है. इन प्रतिद्वंदियों और इन पिचों पर पोंटिंग को बल्लेबाजी करना पोंटिंग को खूब रास आता है. इसका उदहारण हमने अभी चल रहे मेलबर्न टेस्ट में भी देखा. आउट ऑफ़ फॉर्म चल रहे पोंटिंग ने अफ्रीकी टीम के ख़िलाफ़ पहली पारी में शतक ठोका तो दूसरी पारी में वह सिर्फ़ एक रन से शतक चूक गए. अफ्रीका के ख़िलाफ़ वह पहले भी एक टेस्ट में दो शतक ज़माने का कारनामा कर चुके है. तो कोई ताज्जुब न हो अगर अगले साल पोंटिंग टेस्ट शतकों के मामले में सचिन से आगे निकल जाए. पोंटिंग टेस्ट रनों के मामले में भी सचिन से करीब १८०० रन पीछे हैं अगले साल यह अन्तर भी कम हो जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर रिकॉर्ड बनते ही टूटने के लिए हैं लेकिन जिस तरह हमारा बोर्ड टेस्ट क्रिकेट पर कम ध्यान देता है वह चिंता का कारण है. सचिन १९८९ से खेल रहे हैं और उन्होंने तब से अब तक १५५ टेस्ट खेले. जबकि पोंटिंग १९९५-१९९९६ से खेलने के बावजूद १२९ टेस्ट खेल चुके हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ अगले साल भारत को एक दिवसीय मैचों कि कमी नही होने वाली. हम बांग्लादेश से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक सबसे भिडेंगे और करीब ४० मैच खेलेंगे. जहाँ तक २०-२० कि बात है तो इसका दूसरा विश्व कप २००९ के मई में इंग्लैंड में होगा ही. आईपीएल के मजे तो मिलेंगे ही.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-6940733051892705192?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6940733051892705192/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=6940733051892705192' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6940733051892705192'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6940733051892705192'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/12/blog-post_29.html' title='भारत और सचिन के पास मौके कम हैं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2762614775518250895</id><published>2008-12-28T17:02:00.003+05:30</published><updated>2008-12-28T17:36:22.018+05:30</updated><title type='text'>आने वाले दिनों में यह नाम बहुत सुनाई देगा, 'जीन पॉल डुमनी'</title><content type='html'>दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम को वर्षों से एक ऐसे बल्लेबाज़ की तलाश थी जो संकट के समय अच्छी पारी खेल सके. जो उस दबाव को झेल सके जिसके आगे दक्षिण अफ्रीकी टीम और दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज़ घुटने टेक देते हैं. एक ऐसा खिलाड़ी जो ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ अच्छा खेल दिखा सके और टीम को न सिर्फ़ जीत के करीब ले जाए बल्कि जीत दिला भी दे. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मौजूदा सीरीज के पहले दो मैचों को देखने से लगता है जीन पॉल डुमनी नाम के बाएं हाथ के बल्लेबाज़ ने क्रिकेट जगत में चोकर माने जाने वाली अफ्रीकी टीम की तलाश को पूरा कर दिया है.  &lt;br /&gt;पर्थ में अफ्रीका की ऐतिहासिक जीत में डुमनी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने अपने टीम की दूसरी पारी में न सिर्फ़ अर्धशतक जमाया बल्कि डिविलियर्स के साथ नाबाद शतकीय शाझेदारी भी निभाई. मेलबर्न टेस्ट में भी उन्होंने दक्षिण अफ्रीका को पहले फोलोऑन के खतरे से बाहर निकाला फिर आखिरी तीन बल्लेबाजों के साथ मिलकर २७५ रन जोर डाले. उन्होंने ख़ुद १६६ रनों के शानदार पारी खेली. अपने दूसरे ही टेस्ट में ऐसा प्रदर्शन कबीले तारीफ है.&lt;br /&gt;वैसे तो दक्षिण अफ्रीका के बहुत से बल्लेबाज अच्छे हैं लेकिन उनमे दबाव के क्षणों में खासकर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ संकट के पलों में टूट जाने प्रवृति होती होती है. इस पैमाने पर डुमनी बिल्कुल जुदा हैं. &lt;br /&gt;डुमनी की बल्लेबाजी शैली भी ऐसी है जो उन्हें सभी टीमों के ख़िलाफ़ और सभी तरह की परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन करने में मदद देगी. उनका फुटवर्क बेहतरीन हैं और वो क्रीज का पूरा इस्तेमाल करते हैं. इससे उन्हें स्पिन और तेज दोनों तरह के गेंदबाजों को खेलने में सहूलियत होती है.&lt;br /&gt;डुमनी की सबसे बड़ी खासियत उनका शानदार टेम्परामेंट है. उनको खेलते देख लगता ही नही है कोई बात उन्हें विचलित कर सकती है. वो ऐसे बल्लेबाज लगते हैं जिन्हें अपनी योग्यता पर पूरा विश्वास है और वो कभी भी भ्रम की स्थिति में में नही दिखते. &lt;br /&gt;उम्र भी डुमनी के साथ है. २४ साल के डुमनी लंबे समय तक दक्षिण अफ्रीका की सेवा कर सकते हैं. साथ ही अब जब की पिछली पीढी के ज्यादातर बल्लेबाज सन्यास ले चुके हैं या लेने वाले हैं ऐसे में भारत के गौतम गंभीर की ही तरह आप डुमनी का नाम लंबे समय तक सुनेंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2762614775518250895?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2762614775518250895/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2762614775518250895' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2762614775518250895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2762614775518250895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/12/blog-post_28.html' title='आने वाले दिनों में यह नाम बहुत सुनाई देगा, &apos;जीन पॉल डुमनी&apos;'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2641880138322599589</id><published>2008-12-25T16:34:00.002+05:30</published><updated>2008-12-26T16:02:09.945+05:30</updated><title type='text'>टीम इंडिया सबसे अच्छी टीम नही, अच्छी टीमों में से एक है</title><content type='html'>ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ घरेलू टेस्ट सीरीज में मिली जीत के बाद इस बात की चर्चा काफ़ी तेज हो गई कि भारत टेस्ट क्रिकेट में दुनिया कि सबसे अच्छी टीम है. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मिली जीत ने इस धारणा को और भी बल दिया. लेकिन क्या असल में ऐसा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्ष २००८ को भारतीय क्रिकेट के सबसे अच्छे सालों में गिना जा रहा है. लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि इस वर्ष हमने पाँच टेस्ट सीरीज़ खेली जिसमे २ में जीते २ में हारे और एक बराबरी पर छूटी. जो २ सीरीज़ हमने जीती वह अपने घर में जीती. ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका में हमें हार ही मिली. दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ घरेरू सीरीज हम जीत नही पाए. यह १-१ से बराबर रही. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हमने टेस्ट क्रिकेट में वैसा ही प्रदर्शन किया जैसा पहले करते आ रहे थे. घर में जीते और बाहर हारे. हाँ अब हम विदेशी जमीनों पर पहले कि तुलना में ज्यादा अच्छा खेल दिखा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत लोगों का तर्क हो सकता है कि जो २ सीरीज हमने गवाई उसमे महेंद्र सिंह धोनी कप्तान नही थे. लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ के अगर इंग्लैंड के खिलाफ मोहाली कुंबले में कप्तान होते और वो मैच अनिर्णीत होता तो सब यही कहते कि अगर धोनी होता तो वह जीत के लिए खेलता. लेकिन धोनी ने भी मैच बचने को प्राथमिकता दी न कि २-० से जीत को. इसमे गलती धोनी कि नही. इसमे दोष उस भारतीय क्रिकेट परम्परा कि है जो आक्रमण से ज्यादा रक्षा में यकीन करता है. मेरे कहने का यही मतलब है कि श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया में अगर कप्तान कोई दूसरा भी होता तो परिणाम यही आते.&lt;br /&gt;आज ऑस्ट्रेलिया कमजोर हो गई है तो इसलिए कि उसे मक्ग्राथ और वार्ने का विकल्प नही मिला. ये दोनों टेस्ट क्रिकेट में उसके सबसे बड़े मैच विनर थे. भारत का सबसे बड़ा मैच विनर कुंबले सन्यास ले चुका है और राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर भी जल्दी ही जा सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग फिर कह सकते हैं कि कुंबले के संन्यास और द्रविड़ के ख़राब फॉर्म के बावजूद हमने मैच जीते. लेकिन सनद रहे कि हमने यह मैच भारत में जीते. भारत कि पिचों पर हरभजन सिंह, अमित मिश्रा भी विकेट लेते हैं और यहाँ धोनी और युवराज भी रन बनाते हैं. लेकिन ये गेंदबाज और ये बल्लेबाज विदेशी पिचों पर टेस्ट क्रिकेट में अब तक कोई कमाल नही दिखा सके हैं.&lt;br /&gt;इस साल भारत में मिली जीतों के अलावा हमें २ और जीत मिली एक पर्थ में और एक श्रीलंका में. इन दोनों जगहों पर मिली सफलता में एक फैक्टर कॉमन रहा वह है वीरेंदर सहवाग. सहवाग ने पर्थ में ज्यादा रन तो नही बनाये लेकिन अच्छी शुरुआत दी. और ३ कीमती विक्केट भी झटके. श्रीलंका में भी उनके दोहरे शतक ने हमारी नैया पार लगाई. निसंदेह सहवाग एइसे खिलारी हैं जो अगर चल गए (अक्सर वो चलते भी हैं) तो वह दुनिया के किसी आक्रमण की दुनिया कि किसी भी पिच पर बखिया उधेर सकते हैं और आपके लिए मैच जीत सकते हैं. लेकिन सिर्फ़ सहवाग के बल पर आप नंबर एक नही हो सकते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है आप भारतीय क्रिकेट टीम के बहुत बारे प्रशंसक हों और आप कहें की हमारे पास गौतम गंभीर, ज़हीर खान, इशांत शर्मा जैसे शानदार खिलाड़ी भी हैं. बिल्कुल ये शानदार और विश्वस्तरीय खिलारी हैं. लेकिन क्या ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और श्रीलंका के पास ऐसे ही शानदार खिलाड़ी नही हैं? बिल्कुल हैं. और यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया कि बादशाहत ख़त्म होने के बाद कोई भी टीम यह दावा नही कर सकती वो नंबर १ है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्रिकेट में सत्ता बहुकेंद्रित हो गई है. और अलग-अलग कंडिशन्स में अलग-अलग टीमें नंबर एक प्रतीत होगी. इसमे हमारी टीम भी बहुत अच्छी है और वह दुनिया कि ३-४ बेहतरीन टीमों में से एक है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2641880138322599589?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2641880138322599589/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2641880138322599589' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2641880138322599589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2641880138322599589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='टीम इंडिया सबसे अच्छी टीम नही, अच्छी टीमों में से एक है'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-671477113972066190</id><published>2008-07-07T16:44:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:18.958+05:30</updated><title type='text'>चींटी, मोहम्मद गौरी और अब राफेल नडाल</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SHH70c2b11I/AAAAAAAAADs/1EjnxNCl7C8/s1600-h/nadal1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SHH70c2b11I/AAAAAAAAADs/1EjnxNCl7C8/s200/nadal1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5220230321615394642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि मोहम्मद गौरी जब पृथ्वीराज चौहान से युद्ध में बुरी तरह पराजित होने के बाद मायूस होकर बैठा था तो उसने देखा कि एक चींटी बार-बार दीवार पर चढ़ने का प्रयास कर रही है। कई बार चींटी ने अपनी चढ़ाई लगभग पूरी कर ली लेकिन वह फतह करने से पहले फिसल कर गिर जाती थी। लेकिन इससे चींटी का हौसला नहीं टूटा और वह आखिरकार दीवार पर चढ़ ही गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चींटी के इस हौसले ने गौरी की हिम्मत बढ़ाई और वह भी आखिरकार पृथ्वीराज को हराने में कामयाब रहा। उस चींटी और मोहम्मद गौरी की ही तरह अथक प्रयास के बाद कामयाबी की एक और दास्तान स्पेन के टेनिस खिलाड़ी राफेल नडाल ने भी लिखी है। वर्ष 2006 और 2007 में भी वह टेनिस के सबसे प्रतिष्ठित ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट विंबलडन की पुरुष एकल स्पर्धा के फाइनल में पहुंचे थे लेकिन दोनों ही बार उन्हें ग्रास कोर्ट के बादशाह रोजर फेडरर ने टिकने नहीं दिया। कोई और खिलाड़ी होता तो शायद हौसला हार चुका होता लेकिन नडाल भी उस चींटी और गौरी की तरह जिद पर अड़ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविवार को उन्होंने विंबलडन इतिहास के सबसे लंबे फाइनल मुकाबले में सरताज फेडरर को बेताज कर ही दिया। इस मैच में भी ऐसे मौके आए जब लगने लगा कि शायद फेडरर फिर बाजी मार जाएं लेकिन नडाल अपने प्रतिद्वंदी की आभा के सामने फीके नहीं पड़े। जिस तरह गौरी ने पृथ्वीराज की कमजोरी पर हमला किया उसी तरह नडाल ने भी फेडरर की कमजोरी यानी बैकहैंड को निशाना बनाया। यह सबको मालूम है कि फेडरर के फॉरहैंड को झेलना आसान नहीं है इसलिए नडाल ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि स्विट्जरलैंड का यह चमत्कारी खिलाड़ी ज्यादा से ज्यादा बैकहैंड खेलने पर मजबूर हो जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैच के दौरान बारिश भी हुई। विंबलडन में पिछले पांच साल का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि अगर फेडरर अच्छा न खेल पा रहे हों और बारिश हो जाए यह उनके लिए फायदे का सौदा साबित होता है। चार साल पहले इसी विंबलडन के फाइनल में फेडरर के सामने अमेरिका के एंडी रोडिक थे। रोडिक ने पहला सेट जीत लिया और दूसरे में भी वह आगे थे कि तभी बारिश शुरू हो गई। बारिश के बाद जब मैच शुरू हुआ तो फेडरर बिल्कुल बदले हुए नजर आए। उन्होंने फिर अमेरिकी खिलाड़ी को दूसरा मौका नहीं दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास को खुद को दोहराने की बड़ी जिद होती है और कल भी बारिश के बाद जब खेल शुरू हुआ तो लगा कि इतिहास एक बार फिर अपनी यह जिद पूरी कर लेगा। बारिश से पहले नडाल दो सेट जीत चुके थे लेकिन बारिश के बाद के खेल में फेडरर ने लगातार दो सेट जीतकर मैच में जबरदस्त वापसी कर ली। खैर अंत में नडाल की खिताब जीतने की जिद इतिहास की जिद पर भारी पड़ी और विंबलडन के छह साल बाद नया चैंपियन मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही फेडरर की यह हार उनके लिए और उनके प्रशंसकों के लिए काफी दुखदायी रही हो लेकिन टेनिस के लिए यह बहुत अच्छा हुआ। पिछले दो साल से फेडरर जिस तरह का प्रदर्शन कर रहे थे उससे कोर्ट पर एक खिलाड़ी की मोनोपोली बनती जा रही थी। हालांकि नडाल फ्रेंच ओपन जरूर जीत रहे थे लेकिन बाकी जगहों पर सिर्फ फेडरर और फेडरर ही थे। खास तौर पर ग्रास कोर्ट पर होने वाले टूर्नामेंटों में तो ऐसा लगता था कि बाकी खिलाड़ी महज औपचारिकता पूरी करने आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जब घास पर फेडरर की बादशाहत छिन चुकी है तो अगले वर्ष क्ले पर नडाल को भी फेडरर से और कड़ी चुनौती मिलेगी। फेडरर फ्रेंच ओपन (जिसे नडाल का गढ़ माना जाता है) जीतकर हिसाब बराबर करने की कोशिश करेंगे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि नडाल की यह जीत टेनिस में प्रतिद्वंदिता को और बढ़ाएगी। वैसे यह प्रतिद्वंदिता सिर्फ फेडरर और नडाल के बीच तक ही सीमित नहीं रहने वाली है। सर्बिया के नोवाक जोकोविच पिछले एक-डेढ़ साल से इन दोनों की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। साथ ही रूस के मरात साफिन भी लय में लौटने लगे हैं। जब साफिन रौ में होते हैं तो उन्हें रोक पाना अच्छे अच्छों के बस के बाहर की बात होती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-671477113972066190?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/671477113972066190/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=671477113972066190' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/671477113972066190'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/671477113972066190'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='चींटी, मोहम्मद गौरी और अब राफेल नडाल'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SHH70c2b11I/AAAAAAAAADs/1EjnxNCl7C8/s72-c/nadal1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1520535613178432042</id><published>2008-06-27T18:39:00.001+05:30</published><updated>2008-06-27T18:44:09.131+05:30</updated><title type='text'>एक देश जहां क्रिकेट खात्मे के कगार पर है</title><content type='html'>1983 विश्व कप शुरू होने से पहले जिन देशों से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी उसमें आश्चर्यजनक रूप से एक नाम जिम्बाब्वे का भी था। जिम्बाब्वे ने वाकई उस विश्व कप में अच्छा खेल दिखाया। हालांकि यह टीम सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सकी लेकिन उसने लीग मैचों में आस्ट्रेलिया को जरूर मात दे दी। इसका सीधा फायदा भारत को मिला और आगे जो हुआ वह भारतीय क्रिकेट के इतिहास में सबसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह 1999 में विश्व कप में इसी जिम्बाब्वे ने भारत को हराकर उसकी उम्मीदों पर तुषारापात किया था। 2003 विश्व कप में जिम्बाब्वे की टीम सुपर स्किस में पहुंची थी। 1993 में टेस्ट दर्जा पाने वाली जिम्बाब्वे ने क्रिकेट के इस पारंपरिक स्वरूप में भी अच्छी सफलता प्राप्त की। भारत के खिलाफ हुए अपने पहले टेस्ट को ड्रा करा जिम्बाब्वे उन चुनिंदा टीमों में शामिल हो गई जिसने अपना मैच गंवाया न हो। बाद में जिम्बाब्वे ने भारत और पाकिस्तान जैसी टेस्ट टीमों को मात भी दी। यह एक ऐसी उपलब्धि है जो बांग्लादेश इतने मैच खेलकर भी हासिल नहीं कर पाया है। इतना ही नहीं यहां का एक बल्लेबाज एंडी फ्लावर जिसके नाम से आप अच्छी तरह परिचित होंगे एक समय आईसीसी टेस्ट बल्लेबाजों की सूची में शीर्ष पर कायम था। इसके पूर्व कप्तान हीथ स्ट्रीक की गिनती दुनिया के चुनिंदा ऑलराउंडरों में होती थो पॉल स्ट्रांग को अब तक क्रिकेट खेल चुके 10 बेहतरीन लेग स्पिनरों में से एक माना जाता था। इसी जिम्बाब्वे ने डेविड हाटन और अली शाह जैसे उम्दा बल्लेबाज भी दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अफसोस कभी क्रिकेट जगत में मजबूत पहचान बनाने का माद्दा रखना रखने वाला जिम्बाब्वे क्रिकेट आज खात्मे की कगार पर है। राष्ट्रपति राबर्ट मुगाबे की नस्लभेदी नीतियों की वजह कई प्रतिभाशाली क्रिकेटर वहां से पलायन कर गए। टीम बेहद कमजोर हुई और आईसीसी ने उसे टेस्ट खेलने से प्रतिबंधित कर दिया। हालांकि जिम्बाब्वे आईसीसी का पूर्णकालिक सदस्य बना रहा और उसे आईसीसी टूर्नामेंटों के जरिए मोटी रकम का मिलना भी जारी रहा। वेस्टइंडीज में हुए पिछले विश्व कप में बेहद घटिया प्रदर्शन के बावजूद जिम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड को करीब 50 करोड़ रुपये का लाभ हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आईसीसी के सदस्य देशों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि जिम्बाब्वे की पूर्णकालिक सदस्यता खत्म की जाए। कई सदस्य देशों का आरोप है कि जिम्बाब्वे आईसीसी से मिलने वाली रकम का सही इस्तेमाल नहीं कर रहा है और उसकी टीम इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने लायक नहीं रही। इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तो काफी समय से जिम्बाब्वे की राजनीतिक स्थिति बदतर होने के कारण उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। कभी जिम्बाब्वे का कट्टर समर्थक माने जाने वाले दक्षिण अफ्रीका ने भी अपने इस पड़ोसी देश के साथ सभी प्रकार के क्रिकेट संबंध खत्म करने की बात कही है। इंग्लैंड ने भी 2009 में प्रस्तावित अपना जिम्बाब्वे दौरा रद कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि जिम्बाब्वे को अभी भी दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई से समर्थन मिलना जारी है। बीसीसीआई का कहना है कि क्रिकेट और राजनीति को आपस में नहीं मिलाना चाहिए। उम्मीद है कि अगले आईसीसी बैठक में भारत फिर जिम्बाब्वे का समर्थन करे। जिम्बाब्वे को समर्थन देने के पीछे बीसीसीआई की वोट बैंक पालिसी भी बहुत हद तक जिम्मेवार है। याद कीजिए 1996 का विश्व कप जो भारत-पाकिस्तान-श्रीलंका में आयोजित हुआ था। इस विश्व की मेजबानी को लेकर इन एशियाई देशों को इंग्लैंड से कड़ी चुनौती मिल रही थी। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और वेस्टइंडीज भी इंग्लैंड का समर्थन कर रहे थे। लेकिन तब जिम्बाब्वे ने दक्षिण अफ्रीका के साथ एशियाई देशों को अपना समर्थन दिया और यह विश्व कप भारत-पाकिस्तान-श्रीलंका में हो सका। इसी तरह 2011 विश्व कप की मेजबानी के लिए भी जिम्बाब्वे ने भारत का समर्थन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सवाल यह उठता है कि वोट बैंक पालिसी के कारण क्या बीसीसीआई को जिम्बाब्वे के बुरे हालातों को नजरअंदाज कर देना चाहिए। रंगभेद तो रंगभेद है चाहे गोरों के खिलाफ हो या कालों के खिलाफ उसका विरोध होना चाहिए। रंगभेद ही नहीं जिम्बाब्वे क्रिकेट में भ्रष्टाचार का भी बोलबाला है। साथ ही वहां की टीम भारत की किसी रणजी टीम को भी हरा पाने का माद्दा नहीं रखती। अगर बीसीसीआई जिम्बाब्वे का समर्थन करती है तो इससे वहां की क्रिकेट बेहतर होने की बजाए और बदतर होगी। अगर किसी को गलती का अहसास न कराया जाए तो वह सुधरेगा कैसे। अब बीसीसीआई का फर्ज है कि वह जिम्बाब्वे क्रिकेट की बेहतरी में कदम उठाए और अगर आईसीसी में जिम्बाब्वे की पूर्णकालिक सदस्यता खत्म करने के लिए वोटिंग होती है तो इस वोटिंग के पक्ष में मतदान करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे क्या होगा? जिम्बाब्वे आईसीसी का पूर्णकालिक सदस्य होने की बजाय फिर से एक एसोसिएट देश रह जाएगा। उसे अपनी गलतियों का अहसास होगा और वह फिर से अपनी जड़े मजबूत करने की कोशिश करेगा। इन सब से आखिर में क्रिकेट का ही भला होगा और दर्शक एकतरफा मुकाबला देखने से बच जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1520535613178432042?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1520535613178432042/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1520535613178432042' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1520535613178432042'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1520535613178432042'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_27.html' title='एक देश जहां क्रिकेट खात्मे के कगार पर है'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6941667209383911738</id><published>2008-06-26T16:32:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:19.144+05:30</updated><title type='text'>कहां गई कोलिंगवुड की खेल भावना</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SGN3qkXMyxI/AAAAAAAAADk/JrEUf4fZcgc/s1600-h/collision.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SGN3qkXMyxI/AAAAAAAAADk/JrEUf4fZcgc/s200/collision.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216144366624361234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुधवार, 25 जून को इंग्लैंड और न्यूजीलैंड के बीच बेहद रोमांचक एक दिवसीय मैच खेला गया। आखिरी ओवर की आखिरी गेंद पर समाप्त हुए मैच में न्यूजीलैंड ने एक विकेट से जीत दर्ज की लेकिन न्यूजीलैंड की पारी के दौरान 44वें ओवर में एक घटना ऐसी घटी जिसने इंग्लैंड के खिलाडि़यों की खेल भावना पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस वक्त न्यूजीलैंड को 39 गेंदों पर 36 रनों की दरकार थी और उसके तीन विकेट शेष थे। स्ट्राइक पर थे काइल मिल्स और नॉन स्ट्राइक पर खड़े थे ग्रांट इलियट। मिल्स ने एक रन लेने के लिए इलियट को आवाज लगई। इलियट आगे बढ़े लेकिन उनकी राह में गेंदबाज साइड बाटम आ गए। दोनों के बीच रग्बी स्टाइल में टक्कर हुई और चोट खाए इलियट बीच पिच पर गिर गए। फील्डर इयान बेल ने गेंद थ्रो की और यह जानने के बावजूद कि इलयिट उनके गेंदबाज साइडबाटम से टकराने की वजह से क्रीज पर गिरे हैं केविन पीटरसन ने उन्हें रन आउट कर दिया। अंपायर मार्क बेंसन ने स्थिति की नजाकत को भांपते हुए इंग्लिश कप्तान पॉल कोलिंगवुड को अपील वापस ले लेने की सलाह दी लेकिन जीत दर्ज करने के नशे में चूर कोलिंगवुड ने अंपयार की यह सलाह नहीं मानी। हालांकि मिल्स ने कोलिंगवुड का सपना पूरा नहीं होने दिया और अपनी टीम को एक विकेट से जीत दिला दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना ने यह तो साबित कर ही दिया है अक्सर खेल भावना पर लंबी-लंबी स्पीच देने वाले इंग्लैंड के खिलाड़ी समय आने पर खुद इससे कन्नी काट जाते हैं। वह अक्सर एशियाई खिलाडि़यों पर इल्जाम लगाते हैं कि वे खेल भावना का ख्याल नहीं रखते। इंग्लैंड वाले अपने खेलने के तरीके और अपने दर्शकों के सभ्य व्यवहार पर हमेशा गर्व करते हैं। लेकिन यहां तो न ही उनके कप्तान ने सभ्यता दिखाई और न ही उनके दर्शकों ने। लाचार हालात में रन आउट होकर इलियट पवेलियन लौट रहे थे और इंग्लिश दर्शक खुशी में झूम रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वही कोलिंगवुड हैं जिन्होंने पिछले वर्ष हुई भारत-इंग्लैंड सीरीज के दौरान भारतीय खिलाडि़यों पर खेल भावना के साथ न खेलने का आरोप लगाया था। सात वनडे मैचों की उस सीरीज के पांचवें मैच में कोलिंगवुड खुद रन आउट हुए थे। भारतीयों ने अपील की लेकिन अंपयार थर्ड अंपायर से मदद लेने के लिए तैयार नहीं दिख रहे थे। तभी जाइंट स्क्रीन पर रिप्ले उभरी जिसमें साफ था कि कोलिंगवुड रन आउट हैं। तब भारतीयों द्वारा एक बार फिर अपील करने के बाद अंपायर ने कोलिंगवुड को आउट दिया। उस घटना ने कोलिंगवुड खासे नाराज थे। उनका कहना था कि भारतीयों ने अंपायर पर दबाव बनाया और फील्ड अंपायर को रिप्ले देखकर आउट नहीं देना चाहिए था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-6941667209383911738?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6941667209383911738/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=6941667209383911738' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6941667209383911738'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6941667209383911738'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_26.html' title='कहां गई कोलिंगवुड की खेल भावना'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SGN3qkXMyxI/AAAAAAAAADk/JrEUf4fZcgc/s72-c/collision.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2693869518575724517</id><published>2008-06-22T16:53:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:19.415+05:30</updated><title type='text'>एक शख्स जो चूहे को शेर बना देता है</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SF42WZUuhDI/AAAAAAAAADc/95rFIzZtUDs/s1600-h/hiddink1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SF42WZUuhDI/AAAAAAAAADc/95rFIzZtUDs/s200/hiddink1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5214665176924455986" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तमाम कयासों को झुठलाते हुए रूस यूरो कप फुटबाल के सेमीफाइनल में पहुंच चुका है। क्वार्टर फाइनल में उसने हालैंड जैसी कद्दावर टीम को मात दी जिसे तमाम फुटबाल विश्लेषक इस खिताब के जीतने का सबसे बड़ा दावेदार मान रहे थे।&lt;br /&gt;बेशक रूसी खिलाड़ी शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन अगर इस टीम की कामयाबी के पीछे की सबसे बड़ी वजह की बात की जाए तो वह है कोच गस हिडिंक। वैसे तो इस टूर्नामेंट में खेल रही सभी टीमों के पास एक से एक कोच हैं लेकिन उनमें से कोई भी गस हिडिंक के मुकाबले का नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालैंड के रहने वाले हिडिंग चाहें तो किसी भी बड़ी टीम के साथ जुड़ सकते हैं लेकिन वह ऐसा नहीं करते। उन्हें चुनौती पसंद है और वह हमेशा किसी कमजोर मानी जाने वाली टीम से जुड़ते हैं और उसके खिलाडि़यों में ऐसा आत्मविश्वास भरते हैं कि वे दुनिया की नामचीन टीमों को भी धूल चटाने का माद्दा रखने वाले बन जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद कीजिए 2002 का विश्व कप जब दक्षिण कोरिया की बेहद कमजोर मानी जाने वाली टीम ने सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था। सेमीफाइनल में कोरिया को जर्मनी से हार का मुंह देखना पड़ा था लेकिन इस जीत के लिए जर्मनी को नाकों चने चबाने पड़ थे। उस वक्त कोरियाई टीम के कोच थे गस हिडिंक। टूर्नामेंट शुरू होने से पहले कोरियाई टीम तब तक खेले सभी विश्व कप मैचों में से एक में भी जीत दर्ज नहीं कर सकी थी। सभी विश्लेषक मान रहे थे कि कोरिया लीग राउंड से ही बाहर हो जाएगी लेकिन हिडिंक की सेना से ऐसा कमाल किया कि फुटबाल जगत हतप्रभ हो गया था। हिडिंक के योगदान से कोरियाई इतने प्रभावित हुए कि उन्हें कोरियाई नागरिकता देने की मांग उठने लगी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हिडिंक ने आस्ट्रेलिया का दामन थामा। उस आस्ट्रेलिया का जिसने पिछले 32 साल से विश्व कप के लिए क्वालीफाई नहीं किया था। हिडिंक ने न सिर्फ आस्ट्रेलिया को जर्मनी में हुए 2006 विश्व कप के लिए क्वालीफाई करवाया बल्कि उसे क्वार्टर फाइनल तक भी पहुंचाया। क्वार्टर फाइनल में आस्ट्रेलिया उस विश्व चैंपियन टीम इटली से पराजित हुई। मैच के दरम्यान आस्ट्रेलिया का ही पलड़ा भारी लग रहा था लेकिन एक बेहद विवादास्पद पेनाल्टी की वजह से इटली फाइनल में पहुंचने में सफल रहा जहां उसने एक और विवादास्पद मैच में फ्रांस को हराकर खिताब पर कब्जा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ इसी तरह का कमाल हिडिंक ने रूस की टीम के साथ भी किया है। हालैंड की टीम ने जिस तरह तीन लीग मैचों में 9 गोल किए थे और सिर्फ एक खाए थे उससे तो यही लग रहा था उसे असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर होगा। लेकिन हिडिंक की अगुवाई में रूस ने यह कमाल कर दिया है। सेमीफाइनल में उसका मुकाबला इटली और स्पेन की बीच होने वाले मैच के विजेता से होगा। रूस यूरो कप जीते या न जीते लेकिन उसे सेमीफाइनल में पहुंचा कर हिडिंक ने चूहे को शेर में बदलने की अपनी ताकत का एक बार फिर बेहतरीन नमूना पेश किया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2693869518575724517?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2693869518575724517/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2693869518575724517' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2693869518575724517'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2693869518575724517'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_22.html' title='एक शख्स जो चूहे को शेर बना देता है'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SF42WZUuhDI/AAAAAAAAADc/95rFIzZtUDs/s72-c/hiddink1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1575634166768566201</id><published>2008-06-20T21:14:00.005+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:20.058+05:30</updated><title type='text'>हिंदी फिल्मों की बॉक्सिंग</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvRwKm6pvI/AAAAAAAAAC8/hLiiHdrGM6w/s1600-h/Aryan.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvRwKm6pvI/AAAAAAAAAC8/hLiiHdrGM6w/s200/Aryan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5213991619022989042" /&gt;&lt;/a&gt;बुधवार देर रात को मनोरंजन चैनल जी नैक्सट पर सोहेल खान अभिनीत और निर्देशित फिल्म आर्यन आ रही थी। वैसे सोहेल खान की फिल्में मुझे ज्यादा नहीं भाती लेकिन यह फिल्म बॉक्सिंग पर बनी थी इसलिए ठहर गया। पूरी फिल्म देखी। फिल्म ठीक-ठाक भी थी लेकिन इसमें बॉक्सिंग को जिस तरह दिखाया गया वह मुझे कुछ खास नहीं लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म का नायक आर्यन (सोहेल खान) एक बॉक्सर है और उसका लक्ष्य है नेशनल बॉक्सिंग खिताब जीतना। ध्यान दें नेशनल बॉक्सिंग खिताब। जहां तक मेरी जानकारी है नेशनल बॉक्सिंग एक अमैच्योर प्रतियोगिता है लेकिन इस फिल्म में इसे प्रोफेशनल बॉक्सिंग की तरह दिखाया गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि नायक का मुख्य प्रतिद्वंदी रंजीत (इंदर कुमार) तीन बार का नेशनल चैंपियन है और वह पूरे भारत में लोकप्रिय है। मीडिया उसके पीछे-पीछे दौड़ती है और उसके प्रशंसक उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते हैं। यह भी दिखाया गया है कि क्लाइमैक्स में आर्यन और रंजीत के बीच होने वाले मुकाबले का टेलीविजन पर सीधा प्रसारण हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ताज्जुब हो रहा है कि भारत में अमैच्योर बॉक्सिंग कब से इतनी लोकप्रिय हो गई और कब से मीडिया एक नेशनल बॉक्सिंग चैंपियन के पीछे भागने लगी। यहां लोग मोहम्मद अली, माइकल टायसन और इवांडर होलीफील्ड जैसे प्रोफेसनल हैवीवेट मुक्केबाजों का नाम भले ही जानते हों लेकिन वे नेशनल चैंपियन का नाम याद नहीं रखते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आपने कभी अमैच्यौर बॉक्सिंग देखी हो (नेशनल या इंटनेशनल) तो आपको इस फिल्म में दिखाए गए सभी सिक्वैंस बड़े ही बेतरतीब लगेंगे। फिल्म में यह भी नहीं बताया गया कि आर्यन किस भार वर्ग (लाइटवेट, बैंटमवेट या हैवीवेट) का बॉक्सर है। फिल्म में फाइनल मुकाबला दस राउंड का दिखाया गया है जबकि नेशनल बॉक्सिंग के मुकाबले दो-दो मिनट के तीन राउंड के होते हैं और हर राउंड के बीच एक मिनट का अंतराल होता है। हालांकि ओलंपिक और कॉमनवेल्थ जैसी प्रतियोगिताओं में यह चार राउंड का होता है। फिल्म में आर्यन की पूरी तैयारी एक गाने में खत्म हो जाती है जबकि फाइनल मुकाबला करीब 25-30 मिनट तक चलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में बॉक्सिंग पर एक और फिल्म बनी है जिसका नाम है अपने। इसमें आर्यन के उलट प्रोफेसनल बॉक्सिंग को दिखाया गया है। लेकिन यह फिल्म भी बॉक्सिंग पर बनी उम्दा फिल्मों की तुलना में कहीं नहीं ठहरती। इसमें बचपन से एक हाथ से अपाहिज रहने वाले बाबी देओल हाथ ठीक होते ही हैवीवेट मुकाबले में उतर जाते हैं तो कई साल से बॉक्सिंग से दूर रहे सन्नी देओल अपने पिता के अपमान का बदला लेने के लिए रिंग में उतरते हैं और व‌र्ल्ड चैंपियन भी बन जाते हैं। फिल्म के निर्देशक अनिल शर्मा ने हैवीवेट बॉक्सिंग को इस तरह ट्रीट किया कि यह दो बच्चों के बीच गली में होने वाली लड़ाई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं भारत में खेल पर सिनेमा बनाने वालों के दिमाग में यह बात क्यों होती है कि नायक को अंत में जीतना ही जीतना है। ऐसा भी नहीं है कि हमारे यहां खेलों में जीत दर्ज करने की जबरदस्त परंपरा रही हो और इसलिए यहां के दर्शक जीत से कम कुछ बर्दास्त नहीं करेंगे। एक आध खेलों को छोड़ दे तो हम इस क्षेत्र में हमेशा ही फिसड्डी ही रहे हैं। इसलिए बेहतर हो कि फिल्म निर्माता अगर खेल पर फिल्म बनाए तो खिलाड़ी (नायक) के बेहतरीन प्रयास को उकेरने की कोशिश करे न कि हर हाल में उसे जीताने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvR6CG-raI/AAAAAAAAADE/mYkvy47XSHE/s1600-h/Bull.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvR6CG-raI/AAAAAAAAADE/mYkvy47XSHE/s200/Bull.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5213991788540243362" /&gt;&lt;/a&gt;वहीं बॉक्सिंग पर बनी कुछ ऑल टाइम ग्रेट फिल्मों की कहानी पर नजर दौड़ाएं तो शायद ही कोई फिल्म अपने नायक या नायिका की रिंग में जीत के साथ समाप्त होती है। 1980 में रोबर्ट डी नीरो अभिनीत रोजिंग बुल इस का शानदार नमूना है। इस फिल्म का नायक जेक लामोटा (नीरो) एक अच्छा बॉक्सर रहता है जो अपने भार वर्ग का चैंपियन है। लेकिन फिल्म की कहानी उसके चैंपियन बनने को लेकर नहीं बल्कि उसके चैंपियन की गद्दी से फिसलकर ओवरवेट हो जाने, एक कामेडियन बनने, किसी कारणवश जेल जाने और जेल से छूटकर फिर बॉक्सर बनने के प्रयास की दास्तान बयान करती है। इस फिल्म की गिनती अमेरिका की सर्वकालिक महान फिल्मों में होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvSA0w3XMI/AAAAAAAAADM/7WxMmm_X10A/s1600-h/rocky.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvSA0w3XMI/AAAAAAAAADM/7WxMmm_X10A/s200/rocky.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5213991905216912578" /&gt;&lt;/a&gt;इसी तरह 1976 में बनी फिल्म राकी (जिसने सिलवेस्टर स्टोलेन को पहचान दिलाई) भी बॉक्सिंग पर बनी शानदार फिल्म है। सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ऑस्कर जीतने वाली इस फिल्म के अंत में नायक को बॉक्सिंग फाइट जीतते हुए नहीं बल्कि हारते हुए दिखाया गया है। फिर भी लोग राकी के दीवाने हुए क्योंकि वह भले ही फाइट हार गया लेकिन उसने विश्व चैंपियन को पूरे 15 राउंड तक मुकाबला करने पर मजबूर किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvSHTZTrXI/AAAAAAAAADU/so-ReXlUoGQ/s1600-h/Baby.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvSHTZTrXI/AAAAAAAAADU/so-ReXlUoGQ/s200/Baby.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5213992016518819186" /&gt;&lt;/a&gt;बॉक्सिंग पर सबसे हाल-फिलहाल बनी उम्दा फिल्म है मिलियन डॉलर बेबी। इस फिल्म का अंत तो खासा दुखद है। यह फिल्म एक ऐसी महिला बॉक्सर के ऊपर बनी है जो 31 साल की उम्र में विश्व चैंपियन बनने का ख्वाब देखती है। लेकिन अंत में वह चैंपियन नहीं बनती बल्कि गले के आसपास लगी चोट से लकवाग्रस्त हो जाती है। उसके कोच को अपनी शिष्या का दर्द नहीं देखा जाता है और वह उसे एड्रीनेलीन का ओवरडोज देकर कष्टमय जीवन से मुक्ति दिला देता है। इस फिल्म को चार ऑस्कर मिले और 30 मिलियन डालर में बनने वाली इस असाधारण फिल्म ने 220 मिलियन डॉलर कमाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा जाता है कि हमारे यहां के फिल्म निर्माता हालीवुड से प्रेरणा लेते हैं तो भाई स्पो‌र्ट्स पर फिल्म बनाते समय यह प्रेरणा कहां चली है। खेल पर फिल्में बनाइए लेकिन ऐसी फिल्में बनाइए जिससे खेल का भला हो, दर्शक खेल के असल स्वरूप से रूबरू हो आप अच्छी कमाई भी करें। आर्यन और अपने दोनों ही फिल्में इन पैमानों पर नाकाम रही और उम्मीद के मुताबिक बुरी तरह पिटी भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1575634166768566201?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1575634166768566201/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1575634166768566201' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1575634166768566201'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1575634166768566201'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_20.html' title='हिंदी फिल्मों की बॉक्सिंग'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFvRwKm6pvI/AAAAAAAAAC8/hLiiHdrGM6w/s72-c/Aryan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2407329020468256699</id><published>2008-06-19T16:10:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:20.143+05:30</updated><title type='text'>राजनीति की तरह फुटबाल में भी एंटी इनकंबेंसी</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFo5NJJOMTI/AAAAAAAAAC0/6J3q96WslbI/s1600-h/football.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFo5NJJOMTI/AAAAAAAAAC0/6J3q96WslbI/s200/football.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5213542416590450994" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आजकल लगता है फुटबाल को भी राजनीति की एंटी इनकंबेंसी वाली बीमारी लग गई है। जिस प्रकार राजनीति में मौजूदा विधायक, मौजूदा सांसद और मौजूदा सरकार के चुनाव जीतने की संभावना काफी कम रहती है उसी तरह फुटबाल में भी डिफेंडिंग चैंपियनों के जीत की उम्मीद भी कम हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय स्विट्जरलैंड में चल रहे यूरो कप का ही उदाहरण ले लीजिए। डिफेंडिंग चैंपियन ग्रीस बिना एक भी गोल किए पहले दौर से बाहर हो गया। उसके खेल को देख कर लगा ही नहीं कि चार साल पहले इसी टीम ने पुर्तगाल की धरती पर तमाम यूरोपीय टीमों को धूल चटाई थी। इसी तरह सैफ फुटबाल में भी डिफेंडिंग चैंपियन भारत फाइनल में मालदीव से हारकर बाहर हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह पिछले विश्व कप में ब्राजील की टीम क्वार्टर फाइनल तक का ही सफर तय कर पाई जबकि उसके पिछले विश्व कप में उस समय का डिफेंडिंग चैंपियन फ्रांस पहले ही दौर में बाहर हो गया था। उसे सेनेगल जैसी नौसिखिया टीम ने मात दी थी और फ्रांसीसी टीम तीन लीग मैचों में एक भी गोल नहीं कर पाई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जिस तरह राजनीति में कुछ विधायक, सांसद या सरकार लगातार दो बार जीत दर्ज करने में सफल हो जाते हैं उसी तरह फुटबाल में भी एक दो टीम ऐसी है जो लगातार दो बार खिताब जीत जाती है। लेकिन ये टीमें या तो घरेलू फुटबाल की टीमें हैं या क्लब स्तर की। मैनचेस्टर यूनाईटेड और रियाल मैड्रिड ने लगातार दूसरे साल क्रमश: इंग्लिश प्रीमियर लीग और स्पेनिश लीग ला लीगा जीता है। इसी तरह भारत में पंजाब ने लगातार दूसरी बार संतोष ट्राफी पर कब्जा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि फुटबाल की एंटी इनकंबेंसी राजनीति की एंटी इनकंबेंसी की तुलना में थोड़ी अलग है। राजनीति में चुनाव जितने निचले स्तर हो का मौजूदा विजय उम्मीदवारों के हारने का खतरा उतना ज्यादा होता है। यानी अगर कोई लहर न चल रही हो सांसदों की तुलना में विधायकों के हार का खतरा ज्यादा और विधायकों की तुलना में नगरपालिका के सदस्यों की हार का खतरा उससे भी ज्यादा होता है। वहीं फुटबाल में स्थिति ठीक विपरीत है। टूर्नामेंट जितना बड़ा हो मौजूदा चैंपियन के हार का खतरा उतना ज्यादा रहता है। विश्व कप चैंपियन के ऊपर सबसे ज्यादा खतरा, फिर यूरो कप चैंपियन, कोपा अमेरिका कप चैंपियन, चैंपियंस लीग चैंपियन और विभिन्न देशों घरेलू लीग के चैंपियन का नंबर आता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2407329020468256699?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2407329020468256699/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2407329020468256699' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2407329020468256699'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2407329020468256699'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_19.html' title='राजनीति की तरह फुटबाल में भी एंटी इनकंबेंसी'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFo5NJJOMTI/AAAAAAAAAC0/6J3q96WslbI/s72-c/football.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2539333909159822871</id><published>2008-06-18T18:52:00.001+05:30</published><updated>2008-06-18T18:52:51.628+05:30</updated><title type='text'>कुंद पड़ रही है कंगारुओं की धार</title><content type='html'>रिकी पोंटिंग की अगुवाई वाली आस्ट्रेलियाई टीम ने भले ही तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में वेस्टइंडीज को 2-0 से मात दी हो लेकिन जिस तरह कैरिबियाई खिलाडि़यों ने पाताल नगरी की टीम का सामना किया उससे तो एक बात साफ हो जाती है कि कंगारुओं के आक्रमण में वह धार नहीं है जो एक वर्ष पहले तक थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे टेस्ट में आस्ट्रेलिया ने वेस्टइंडीज के सामने 476 रन का बेहद विशाल लक्ष्य रखा था और उम्मीद की जा रही थी कि वेस्टइंडीज की टीम इतनी बड़ी चुनौती के आगे आसानी से घुटने टेक देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, चौथे और पांचवें दिन की पिच पर भी कैरिबियाई बल्लेबाजों ने जमकर संघर्ष किया और यह मैच सिर्फ 87 रनों से हारे। ऐसा नहीं है कि वेस्टइंडीज का बल्लेबाजी क्रम टेस्ट क्रिकेट के लिहाज से बहुत शानदार है लेकिन आस्ट्रेलियाई गेंदबाजी में विविधता की कमी ने वेस्टइंडीज को संघर्ष को लंबा खींचने में मदद पहुंचाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पिछले कुछ महीनों में कोई पहला अवसर नहीं जब किसी टीम ने टेस्ट मैच की चौथी पारी में आस्ट्रेलियाई गेंदबाजों के पसीने छुड़ाए हों। पिछले साल के अंत में श्रीलंका ने भी होबार्ट टेस्ट मैच में कुछ ऐसा ही किया था। तब 490 से अधिक रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी श्रीलंकाई टीम सिर्फ 91 रनों से मैच हारी थी। इस हार में भी अंपायर रूडी कोएर्तजन का बड़ा हाथ था। उन्होंने 192 रन के निजी स्कोर पर खेल रहे कुमार संगकारा को बेहद विवादास्पद तरीके से आउट दे दिया था। इस सीरीज के बाद हुई भारत-आस्ट्रेलिया सीरीज में भी भारत ने आस्ट्रेलिया को उसके घर में कड़ी टक्कर दी। अगर सिडनी टेस्ट में पक्षपाती निर्णय नहीं आते तो यह सीरीज या तो ड्रा रहती या इसे भारत जीतता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्ट्रेलियाई गेंदबाजी इधर कमजोर क्यों नजर आ रही है इसे जानने के लिए किसी राकेट साइंस की जरूरत नहीं है। कोई भी टीम शेन वार्न, ग्लैन मैक्ग्रा, स्टुअर्ट मैकगिल जैसे गेंदबाजों के रिटायर हो जाने से कमजोर होगी। लेकिन आस्ट्रेलिया के जिस मजबूत बेंच स्ट्रेंथ की बात की जा रही थी वह इन तीनों गेंदबाजों के जाने के बाद कसौटी पर खड़ा नहीं उतर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा लग रहा है कि आस्ट्रेलियाई गेंदबाजी सिर्फ ब्रेट ली के सहारे चल रही है। स्टुअर्ट क्लार्क रिसपोंसिव पिचों पर ही चल पाते हैं जबकि मिशेल जॉनसन आस्ट्रेलियाई परंपरा के हिसाब से कोई धारदार गेंदबाज नहीं लगते। स्पिन विभाग की दास्तान भी कुछ ऐसी ही है। वार्न के संन्यास लेने के बाद से ही स्टुअर्ट मैकगिल फिट नहीं चल रहे थे और जब वह फिट हुए तो उन्होंने संन्यास की घोषणा कर दी। इस हालत में आस्ट्रेलिया गेंदबाजी का स्पिन आक्रमण बेहद कमजोर हो गया। उसने ब्रैड हॉग को मौका दिया लेकिन वह खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए (हालांकि अब हॉग भी संन्यास ले चुके हैं)। वेस्टइंडीज के खिलाफ अंतिम टेस्ट मैच में आस्ट्रेलिया ने बीयू कासन नाम के चाइनामैन गेंदबाज को मौका दिया लेकिन वह तो ब्रैड हॉग से भी कमजोर नजर आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि ऐसा नहीं है कि गेंदबाजी कमजोर होने से आस्ट्रेलिया की टीम में अब जीतने का माद्दा नहीं है। वो अब भी जीत रहे हैं और शायद आगे भी जीतेंगे लेकिन उनकी जीत का प्रतिशत पहले की तरह शानदार नहीं होगा। टेस्ट मैचों में आस्ट्रेलिया की नंबर एक गद्दी को फिलहाल कोई खतरा नजर नहीं रहा है। इसके पीछे जो सबसे बड़ी वजह है वह यह कि आस्ट्रेलिया और बाकी टीमों के बीच गुणवत्ता की खाई अभी भी बहुत चौड़ी है। आस्ट्रेलिया का बल्लेबाजी क्रम अभी भी बहुत मजबूत है और साथ ही मानसिक रूप से भी उसके खिलाड़ी बाकी टीमों के खिलाडि़यों की तुलना में बीस है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2539333909159822871?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2539333909159822871/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2539333909159822871' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2539333909159822871'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2539333909159822871'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html' title='कुंद पड़ रही है कंगारुओं की धार'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-5924736540139725150</id><published>2008-06-17T18:01:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:20.365+05:30</updated><title type='text'>क्या पीटरसन का शॉट वाकई नियमों के विपरीत था?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFevOhKuiYI/AAAAAAAAACs/6Pk_VgkjdU8/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFevOhKuiYI/AAAAAAAAACs/6Pk_VgkjdU8/s200/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5212827757661030786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों इंग्लैंड के धाकड़ बल्लेबाज केविन पीटरसन क्रिकेटिया हलकों में खासे चर्चा में हैं। लेकिन उनका नाम इसलिए सुर्खियां नहीं बटोर रहा है कि उन्होंने मैदान पर कोई जबरदस्त पारी खेल दी हो या मैदान के बाहर कोई कारनामा कर दिया हो। उनकी चर्चा इसलिए हो रही है कि उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ 15 जून को खेले गए वनडे मैच में दो ऐसे शॉट लगाए जो क्रिकेट पंडितों के हलक से नीचे नहीं उतर रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामले ने कितना तूल पकड़ा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि क्रिकेट नियमों की संरक्षक माने जाने वाली संस्था मेरिलबोन क्रिकेट क्लब (एमसीसी) ने पीटरसन के शॉट पर विचार करने की बात कही है। दरअसरल पीटरसन ने किवी गेंदबाज स्कॉट स्टायरिस की गेंद पर रिवर्स स्वीप पर दो छक्के जमाए (पहला छक्का 39वें ओवर में और दूसरा 44वें ओवर में)। आप कहेंगे रिवर्स स्वीप में क्या नया है। आपका सोचना सही है रिवर्स स्वीप कोई नया शॉट नहीं है और इस पर पहले कोई शोर शराबा भी नहीं हुआ लेकिन पीटरसन का शॉट परंपरागत रिवर्स स्वीप नहीं था। उन्होंने इन दोनों शॉटों को जमाने से पहला अपना ग्रिप बदलकर दाएं हाथ के बल्लेबाज की जगह बाएं हाथ के बल्लेबाज बन गए। जबकि आम तौर पर रिवर्स स्वीप जमाते हुए बल्लेबाज अपना ग्रिप नहीं बदलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट के नियमों के जानकार का कहना है कि जब गेंदबाज को अंपायर को बताए बिना अपना गेंदबाजी हाथ बदलने की इजाजत नहीं होती तो बल्लेबाज ऐसा कैसे कर सकता है। इन जानकारों के मुताबिक पीटरसन ने अपना ग्रिप बदल कर नियमों की अवहेलना की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि पीटरसन इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं। उनके मुताबिक उनका शॉट इंप्रोवाइजेशन का शानदार नमूना था। उन्होंने कहा कि मैंने कुछ गलत नहीं किया है और शोर इसलिए मच रहा है कि मैंने रिवर्स स्वीप पर छक्का जड़ दिया जबकि आमतौर पर कोई अन्य बल्लेबाज रिवर्स स्वीप के सहारे गेंद को इतनी दूर तक नहीं मार पाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे देखा जाए तो पीटरसन ने वाकई कुछ गलत नहीं किया है। क्रिकेट में बल्लेबाज और गेंदबाजों के लिए नियमों का एक जैसा होना जरूरी नहीं है। आप ही सोचिए कोई बल्लेबाज अपनी क्रीज से आगे निकलकर शॉट खेल सकता है जबकि कोई गेंदबाज बॉलिंग करते वक्त ऐसा करने की कोशिश करेगा तो उसकी गेंद वह नो बॉल कहलाएगी। बल्लेबाज विकेट के बाएं और दाएं दोनो ओर शॉट खेल सकता है जबकि गेंदबाज या तो ओवर द विकेट गेंद फेंकेगा या राउंड द विकेट। अगर उसे इसमें परिवर्तन करना है तो अंपायर को बताना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी बल्लेबाज किसी भी दिशा में घूमकर बल्लेबाजी करे लेकिन वह प्रमुखता से किसी एक हाथ का ही इस्तेमाल करता है। सौरव गांगुली हैं तो बाएं हत्था बल्लेबाज लेकिन उनके शॉट्स में अक्सर दाएं हाथ का ज्यादा इस्तेमाल होता है। &lt;br /&gt;जब बल्लेबाज के लिए हाथ फिक्स करने की बात हो रही है तो फील्डरों को इस दायरे में क्यों नहीं लाया जाता। इन नियमों के ठेकेदारों की चले तो एक दिन ऐसा नियम भी बन सकता है कि फील्डर को मैच से पहले बताना होगा कि वह कौन से हाथ के कैच पकड़ेगा या किस हाथ से थ्रो करेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे विचार से जिस तरह ऊपर लिखी बातें अटपटी लगती है उसी तरह पीटरसन के शॉट पर उंगली उठाना भी बेहद अटपटा मामला है। यह किसी बल्लेबाज की योग्यता या क्षमता पर निर्भर है कि वह किस प्रकार शॉट खेलता है। हमें पीटरसन की तारीफ करनी चाहिए कि वह दाएं हाथ के बल्लेबाज होने के बावजूद भी बाएं हाथ से छक्का जमा सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-5924736540139725150?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/5924736540139725150/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=5924736540139725150' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/5924736540139725150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/5924736540139725150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_17.html' title='क्या पीटरसन का शॉट वाकई नियमों के विपरीत था?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFevOhKuiYI/AAAAAAAAACs/6Pk_VgkjdU8/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-502882203858587170</id><published>2008-06-16T18:45:00.005+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:20.516+05:30</updated><title type='text'>लो एक और चाइनामैन आ गया</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFZodQpM7jI/AAAAAAAAACk/_Cvr17LqmP4/s1600-h/hogg.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFZodQpM7jI/AAAAAAAAACk/_Cvr17LqmP4/s200/hogg.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_521246847062120 4018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वेस्टइंडीज के खिलाफ चल रही टेस्ट सीरीज के तीसरे और आखिरी मैच में आस्ट्रेलिया ने एक नए लेफ्ट आर्म स्पिनर बीयू कासन को मौका दिया। कासन हैं तो लेफ्ट आर्म स्पिनर लेकिन वह परंपरागत शैली वाले लेफ्ट आर्म स्पिनर नहीं हैं। वह हाल ही में संन्यास ले चुके एक अन्य आस्ट्रेलियाई स्पिनर ब्रैड हॉग की ही तरह लेफ्ट आर्म चाइनामैन स्पिनर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले इस आलेख को आगे बढ़ाऊं यह स्पष्ट करता चलूं कि ये चाइनामैन स्पिन है क्या बला। चाइनामैन उस लेफ्ट आर्म स्पिनर को कहते हैं जो उंगली की बजाय कलाई के सहारे गेंद को स्पिन कराता है और उसकी मुख्य गेंद आर्थोडोक्स लेफ्ट आर्मर के विपरीत किसी दाएं हाथ के बल्लेबाज के लिए ऑफ स्पिन होती है। यूं समझ लें कि कोई चाईनामैन स्पिनर किस दाएं हाथ के लेग स्पिनर का मिरर इमेज है। कभी शेन वार्न, दानिश कनेरिया या पीयूष चावला की गेंदबाजी को आइने में देख लीजिए यही है चाइनामैन लेग स्पिन। वहीं लेफ्ट आर्म आर्थोडोक्स स्पिन गेंदबाज अपनी उंगली से गेंद को स्पिन कराता है और उसकी मुख्य गेंद वह होती है जो किसी दाएं हाथ के बल्लेबाज के लिए लेग ब्रेक हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रैड हॉग और बीयू कासन से पहले जो लेफ्ट आर्म स्पिनर चर्चा में आया था वह है दक्षिण अफ्रीका का पॉल एडम्स। चाइनामैन गेंदबाज होने के साथ-साथ एडम्स का एक्शन भी थोड़ा अजीबो-गरीब था जिस वजह से दर्शकों के बीच खासे लोकप्रिय रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेस्ट क्रिकेट में जो चाइनामैन गेंदबाज सबसे सफल रहा है वह है वेस्टइंडीज के महान ऑलराउंड सर गारफील्ड सोबर्स (हालांकि वह लेफ्ट आर्म आर्थोडोक्स और लेफ्ट आर्म मीडियम पेस भी फेंकते थे)। सोबर्स ने जब टेस्ट क्रिकेट में नए-नए आए थे थो विरोधी बल्लेबाज उन्हें लेफ्ट आर्म आर्थोडोक्स स्पिनर समझ कर खेलने की गलती करते थे और चकमा खा जाते थे। इसी तरह ब्रैड हॉज भी एक दिवसीय क्रिकेट में खासे सफल रहे। हालांकि सभी बल्लेबाजों को पता होता था कि वह चाइनामैन गेंदबाज हैं लेकिन इस तरह की गेंदबाजी का सामना करने का कम आदि होने के कारण बल्लेबाजों को मुश्किल पेश आती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी लेग स्पिनर की ही तरह चाइनामैन गेंदबाज की भी गुगली (दाएं हाथ के बल्लेबाज के लिए लेग ब्रेक) भी काफी घातक साबित होती है। इसके अलावा चाइनामैन गेंदबाज फिलीपर और स्कीडर जैसी गेंदें भी फेंकने में सक्षम होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-502882203858587170?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/502882203858587170/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=502882203858587170' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/502882203858587170'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/502882203858587170'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_16.html' title='लो एक और चाइनामैन आ गया'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SFZodQpM7jI/AAAAAAAAACk/_Cvr17LqmP4/s72-c/hogg.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3628957856509934693</id><published>2008-06-15T18:48:00.001+05:30</published><updated>2008-06-15T19:25:30.775+05:30</updated><title type='text'>पाकिस्तान से मिली हार बर्दाश्त नहीं होती</title><content type='html'>शनिवार को बांग्लादेश में खेले गए किट प्लाई कप के फाइनल मुकाबले में टीम इंडिया पाकिस्तान से 25 रनों से हार गई। चुकी यह हार फाइनल मुकाबला में मिली इसलिए दुख भी ज्यादा हो रहा था लेकिन उससे भी बड़ा दुख था कि आखिर हमारी टीम पाकिस्तान से क्यों हारी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में भारत-पाकिस्तान के बीच कटुता कम हुई है और पाकिस्तान से हार कर भारतीयों के मन मस्तिष्क पर उतनी ठेस नहीं लगती जितना कि 80 या 90 के दशकों में लगा करती थी। लेकिन लाख समझाने के बावजूद मेरा मन आज भी वैसा ही है और आज भी पाकिस्तान से हारने पर मुझे बहुत बुरा लगता है। मेरे हृदय में आज भी पाकिस्तान के लिए कोई प्रेम भाव नहीं है। मैं संप्रदायवादी नहीं हूं और न ही यह मेरे पाकिस्तान के प्रति नफरत का आधार है। मैं पाकिस्तान से इसलिए नफरत करता हूं कि उसने हमारे ऊपर चार युद्ध थोपे और उसकी वजह से हम गरीबी दूर करने की बजाय युद्ध के साजो-सामान खरीदने पर मजबूर हैं। तो भला ऐसे देश से प्रेम कैसा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग मुझसे पूछते हैं कि उस नफरत को क्रिकेट में क्यों लाते हो यह तो महज खेल है। लोगों के लिए यह खेल हुआ करे लेकिन मेरे लिए यह पाकिस्तान से युद्ध के मैदान के बाद भिड़ंत का दूसरा सबसे बड़ा अखाड़ा है। मुझे पता है कि क्रिकेट में कभी जीत तो कभी हार लगी रहती है लेकिन पाकिस्तान से हार कर दिल और दिमाग में आग लग जाती है और कम से एक-दो दिन तक तो बिल्कुल नहीं बुझती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है मेरी सोच गलत हो लेकिन मामला जब जज्बाती हो जाए तो सोच की फिक्र कहां रहती है। मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय टीम की हार पर भी कहे वेल ट्राइड, वेल प्लेड।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3628957856509934693?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3628957856509934693/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3628957856509934693' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3628957856509934693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3628957856509934693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_15.html' title='पाकिस्तान से मिली हार बर्दाश्त नहीं होती'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-5591898347077830022</id><published>2008-06-13T15:48:00.001+05:30</published><updated>2008-06-13T16:03:30.651+05:30</updated><title type='text'>सिर्फ पांच मैच और इनाम 420 करोड़</title><content type='html'>जी हां पांच मैच और इनाम 420 करोड़ रुपये। इतनी बड़ी इनामी राशि किसी फुटबाल, बास्केटबाल, डब्ल्यूडब्ल्यूई, बेसबाल या बाक्सिंग मैचों के लिए नहीं बल्कि यह ट्वंटी 20 क्रिकेट मैचों के लिए है। और इन मैचों में पैसों के लिहाज से विश्व क्रिकेट पर राज करने वाली बीसीसीआई की टीम भाग नहीं लेगी और न ही आईपीएल की कोई टीम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये मैच खेले जाएंगे वेस्टइंडीज के ऑल स्टार इलेवन और इंग्लैंड के बीच और इन मैचों पर इतना पैसा लुटाने वाला शख्स है टेक्सास का अरबपति विलियम स्टेनफोर्ड। वही स्टेनफोर्ड जो वेस्टइंडीज की घरेलू ट्वंटी 20 लीग को प्रायोजित करता है। उन्होंने पिछले साल ट्वंटी 20 विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम को वेस्टइंडीज ऑल स्टार इलेवन के साथ 80 करोड़ रुपये का एक मैच खेलने के लिए आमंत्रित किया था लेकिन बीसीसीआई ने उनकी इस पेशकश को नकार दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब स्टेनफोर्ड ने इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड [ईसीबी] के साथ करार किया है जिसके तहत वेस्टइंडीज और इंग्लैंड की टीमें अगले पांच सालों में आपस में पांच ट्वंटी 20 मैच खेलेंगी। इन पांच मैचों के लिए 100 मिलियन डालर यानी 420 करोड़ रुपये दाव पर होंगे। यानी एक मैच की कीमत होगी 20 मिलियन डालर [84 करोड़ रुपये]। एक मैच में विजेता टीम के सभी खिलाडि़यों को 1-1 मिलियन डालर मिलेंगे [4 करोड़ 20 लाख रुपये प्रति खिलाड़ी]। अंतिम 11 में स्थान न बना पाने वाले खिलाड़ी एक मिलियन डाल में साझा करेंगे जबकि टीम मैनेजमेंट को भी एक मिलियन डालर मिलेंगे। बाकी सात मिलियन डालर में ईसीबी और वेस्टइंडीज क्रिकेट बार्ड आधा-आधा शेयर करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह विजेता टीम के खिलाडि़यों को सिर्फ एक मैच से जो रकम मिलेगी वह इंडियन प्रीमियर लीग में भाग लेने वाले ज्यादातर खिलाडि़यों को एक सत्र के लिए मिलने वाली राशि से ज्यादा होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टेनफोर्ड पहले ही कह चुके हैं कि ट्वंटी 20 क्रिकेट में इतना दम है कि वह दुनिया में फुटबाल के प्रति मौजूदा दीवानगी को भी पीछे छोड़ दे। कम से कम पैसों बारिश के हिसाब से देखा जाए तो उनका पूर्वानुमान कोई बहुत बड़ा दुस्साहस नहीं लगता। स्टेनफोर्ड एक कामयाब बिजनेसमैन हैं और अगर उन्हें क्रिकेट में इतनी संभावनाएं दिख रही हैं तो इसके पीछे जरूर कोई न कोई कारण होगा। खैर उनकी यह पहल कितनी कामयाब होती है यह तो आने वाला वक्त बताएगा। हालांकि स्टेनफोर्ड की कार्ययोजना में शायद भारत फिट नहीं बैठता नहीं तो आईपीएल टीमों के लिए हुई खुली बोली में शिरकत जरूर करते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-5591898347077830022?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/5591898347077830022/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=5591898347077830022' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/5591898347077830022'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/5591898347077830022'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/420.html' title='सिर्फ पांच मैच और इनाम 420 करोड़'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-4619166801884477804</id><published>2008-06-10T19:37:00.003+05:30</published><updated>2008-06-10T19:44:32.416+05:30</updated><title type='text'>क्रिकेट के आंकड़ों के लिए एक उम्दा वेबसाइट</title><content type='html'>हमें अगर क्रिकेट से जुड़ी कोई खास जानकारी चाहिए होती है तो हम अक्सर क्रिकइन्फो. काम का रुख करते हैं। इसके अलावा भी कई वेबसाइट हैं जहां क्रिकेट से जुड़ी खबरें और विश्लेषण मिल जाते हैं। लेकिन अगर आप क्रिकेट के आंकड़ों में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं तो एक वेबसाइट है जो आपका काम बेहद आसन बना देगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.howstat.com/cricket/home.asp" target="_blank"&gt;इस वेब साइट का यूआरएल है www.howstat.com&lt;/a&gt; इस साइट का नेविगेशन बेहद यूजर फ्रेंडली है जिससे आपको आंकड़ों की तलाश में ज्यादा भटकना नहीं पड़ेगा। यहां आप हर देश के हर मैच का स्कोर कार्ड देख सकते हैं साथ ही किसी भी क्रिकेटर का मैच दर मैच प्रदर्शन जान सकेंगे। इसके अलावा और भी तमाम प्रकार के रिकार्ड दो-चार क्लिक के बाद आपके सामने होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-4619166801884477804?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/4619166801884477804/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=4619166801884477804' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4619166801884477804'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4619166801884477804'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_10.html' title='क्रिकेट के आंकड़ों के लिए एक उम्दा वेबसाइट'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2386800097144930578</id><published>2008-06-09T18:29:00.001+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:20.687+05:30</updated><title type='text'>संयुक्त राष्ट्र से भी बड़ा मंच है ओलंपिक!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SE0pwvFeTJI/AAAAAAAAACY/HC4XS-DqJus/s1600-h/olym1.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SE0pwvFeTJI/AAAAAAAAACY/HC4XS-DqJus/s200/olym1.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209866261187415186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दुनिया का सबसे बड़ा खेल मेला है ओलंपिक। यहां अलग-अलग देशों के खिलाड़ी विभिन्न स्पर्धाओं में एक दूसरे की क्षमता को परखते हैं। लेकिन खेलों के अलावा अर्थ वित्त, राजनीति और विवाद जैसे मामलों में भी यह दुनिया के कई बड़े आयोजनों और संस्थानों की बराबरी करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओलंपिक की विशालता का अनुमान अग्रलिखित चार तथ्यों से लगाया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला तथ्य:- बीजिंग ओलंपिक में 203 देश भाग लेंगे। आज की तारीख में सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संगठन माने जाने वाले संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की कुल संख्या है 193 यानी ओलंपिक में भाग लेने वाले देशों की संख्या से दस कम। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा तथ्य: सिडनी में हुए ओलंपिक को कवर करने के लिए पूरी दुनिया से 16000 ब्रॉडकास्टर और पत्रकार गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरा तथ्य:- 2012 में लंदन में होने वाले ओलंपिक का बजट करीब 64000 करोड़ रुपये है जो इसमें भाग लेने वाले कई प्रतिभागी देशों की जीडीपी से ज्यादा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौथा तथ्य:-एथेंस में हुए पिछले ओलंपिक खेल को करीब चार अरब लोगों ने अपने-अपने टेलिविजन पर देखा। यह पूरी दुनिया की आबादी का करीब आधा हिस्सा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओलंपिक की विशालता से जुड़े और भी कई तथ्य हैं जिसकी चर्चा में बाद में करूंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2386800097144930578?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2386800097144930578/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2386800097144930578' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2386800097144930578'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2386800097144930578'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_09.html' title='संयुक्त राष्ट्र से भी बड़ा मंच है ओलंपिक!'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SE0pwvFeTJI/AAAAAAAAACY/HC4XS-DqJus/s72-c/olym1.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-9028889238662978296</id><published>2008-06-06T21:19:00.000+05:30</published><updated>2008-06-06T21:21:49.922+05:30</updated><title type='text'>खेलों में भारत के बाद किसका समर्थन करते हैं आप?</title><content type='html'>इंग्लैंड की टीम यूरो कप फुटबाल प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकी है इसलिए अब वहां के प्रशंसक स्पेन और हालैंड जैसी टीमों को अपना समर्थन दे रहे हैं। वहीं पारंपरिक प्रतिद्वंदिता के आधार पर वे यह भी चाहते हैं कि कोई देश इस खिताब को जीते लेकिन जर्मनी कभी न जीते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ इसी तरह की परिस्थितियां कभी-कभी भारत में भी उत्पन्न हो जाती है जब किसी ऐसे क्रिकेट टूर्नामेंट में जिसमें भारत न खेल रहा हो या शुरुआती चरण में हार कर बाहर हो गया हो तो हम भी विकल्प के तौर पर किसी दूसरे देश को अपना समर्थन देते हैं। पिछले विश्व कप ही उदाहरण ले लीजिए। भारत की टीम पहले ही राउंड में बांग्लादेश और श्रीलंका से हार कर बाहर हो गई। भारतीय टीम के कट्टर समर्थकों ने तो इसके बाद विश्व कप देखा ही नहीं लेकिन भारत में मौजूद अन्य क्रिकेट प्रेमियों ने अपनी-अपनी टीमें चुन ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दौड़ान कई लोगों से बातचीत के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि भारत के बाहर हो जाने पर ज्यादातर भारतीयों ने अपना समर्थन दक्षिण अफ्रीका को दिया। इसके बाद वेस्टइंडीज का नंबर था फिर इंग्लैंड और न्यूजीलैंड का। नापसंदीदा टीमों की सूची में सबसे पहला नाम आस्ट्रेलिया (नंबर वन होने के कारण) का था। पाकिस्तान भी भारत की तरह पहले राउंड में बार हो गया था। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो शायद परंपरागत प्रतिद्वंदी होने के कारण पाकिस्तानी टीम इस मामले में आस्ट्रेलिया को पीछे छोड़ देती। चूकीं श्रीलंका से हार कर भारत बाहर हुआ था इसलिए उनके प्रति हमारे यहां गुस्से का भाव रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भारत के बाहर की क्रिकेट टीमों को लेकर भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की पसंद समय के साथ-साथ बदली है। अब पाकिस्तानी टीम के प्रति हमारे यहां नफरत का वह भाव नहीं है जो 80 और 90 के दशक में था। उस समय पाकिस्तान के बाद जिस टीम को भारतीय कभी जीतते हुए नहीं देखना चाहते थे वह थी वेस्टइंडीज की टीम। इसके पीछे खास वजह यह थी कि वेस्टइंडीज उस समय की नंबर एक टीम थी और आम तौर पर भारतीय किसी एक टीम को लगातार जीतते हुए नहीं देखना चाहते। समय के साथ वेस्टइंडीज की जगह आस्ट्रेलिया ने ले ली। लेकिन भारत में नकारात्मक लोकप्रियता के मामले में आस्ट्रेलिया ने उस समय की वेस्टइंडीज की टीम को पीछे छोड़ दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कई सालों में मैंने यह जानने की काफी कोशिश की कि आखिर भारतीय किस आधार पर अपनी पसंदीदा नंबर दो टीम का चुनाव करते हैं। जहां तक मैं समझ पाया आमतौर हम यह चुनाव भावनात्मक आधार पर करते हैं। हमारे इस चुनाव के पीछे पसंद की जगह नापसंद वाला फैक्टर ज्यादा काम करता है। अमूमन हम उन टीमों को सपोर्ट करते हैं जो पाकिस्तान और विश्व की नंबर एक टीम को हराने का माद्दा रखती हो। हालांकि स्थिति तब रोचक हो जाती है जब पाकिस्तान और आस्ट्रेलिया के बीच मैच खेला जाता है। इस मैच में कट्टर पाकिस्तान विरोधी आस्ट्रेलिया को सपोर्ट करते हैं जबकि नंबर वन के विरोधी पाकिस्तान को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिकेट के अलावा और भी कुछ खेल हैं जहां नंबर वन का विरोध करने की हमारी प्रवृत्ति अपना असर दिखाती है। ओलंपिक में हम चाहते हैं कि रूस या चीन मेडल टैली में अमेरिका को पीछे छोड़ दें। फिर उसी चीन को हम एशियाई खेलों में जीतते हुए नहीं देखना चाहते हैं क्योंकि चीन वहां नंबर वन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि एक ऐसा खेल हैं यह नंबर वन विरोधी सिद्धांत समाप्त हो जाता है। वह खेल है फुटबाल। ब्राजील और अर्र्जेटीना विश्व फुटबाल में महाशक्तियां है लेकिन अधिकांश भारतीय विश्व कप फुटबाल में इन्हीं टीमों का समर्थन करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम भारतीय अंग्रेजों की गुलामी झेलने के कारण कभी उपनिवेशवाद को बढ़ावा देने वाले यूरोपीय राष्ट्रों को उतना पसंद नहीं करते और ब्राजील और अर्र्जेटीना की फुटबाल टीमें हमारे लिए उन योद्धाओं के समान है जो इन यूरोपीय ताकतों को पीटते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तो भारतीय खेल प्रेमियों के दूसरे पसंद पर मेरी राय थी? आप क्या कहते हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-9028889238662978296?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/9028889238662978296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=9028889238662978296' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/9028889238662978296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/9028889238662978296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html' title='खेलों में भारत के बाद किसका समर्थन करते हैं आप?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1758343911280211198</id><published>2008-06-04T22:48:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:20.982+05:30</updated><title type='text'>वन-डे को बनाना होगा ट्वंटी 20 का डबल डोज</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SCK02HgyAsI/AAAAAAAAABM/Qz6MY3YPpGY/s1600-h/ipl.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SCK02HgyAsI/AAAAAAAAABM/Qz6MY3YPpGY/s320/ipl.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5197915761761452738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आईपीएल के धूम धड़ाके खत्म हुए। भारतीय टीम बांग्लादेश रवाना हो रही है जहां उसे मेजबान टीम के अलावा पाकिस्तान की भागीदारी वाली वनडे त्रिकोणीय सीरीज में भाग लेना है। इसके बाद एशिया कप होना है जहां पाकिस्तान और श्रीलंका के साथ-साथ बांग्लादेश और हांगकांग जैसी टीमें भी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईपीएल में सचिन बनाम वार्न, जयसूर्या बनाम मैक्ग्रा, स्मिथ बनाम एंटिनी, यूसुफ पठान बनाम इरफान पठान जैसे बराबरी के मुकाबले देखने के बाद क्या दर्शकों को भारत बनाम हांगकांग जैसे बेमेल मुकाबले को देखने में मजा आएगा। वो भी 50-50 ओवरों तक। जरा याद कीजिए ट्वंटी 20 विश्व कप के बाद हुई भारत-आस्ट्रेलिया वनडे सीरीज। इस सीरीज में हरभजन-सायमंड्स-श्रीसंथ ड्रामे के अलावा और कोई रोमांच दर्शकों को नहीं मिला। ऐसा नहीं है कि इस सीरीज में क्वालिटी क्रिकेट नहीं खेली गई। यह सीरीज इसलिए फीकी साबित हुई क्योंकि यह ट्वंटी 20 विश्व कप के ठीक बाद खेला गया और इस सीरीज के सातों मुकाबले ट्वंटी 20 के रफ्तार और रोमांच के मुकाबले बौने साबित हुए। आस्ट्रेलिया में हुई त्रिकोणीय सीरीज इसलिए सफल रही क्योंकि वह टेस्ट सीरीज के बाद खेली गई। पूरी बात का मजमून यही है कि जैसे-जैसे ट्वंटी 20 मुकाबलों की संख्या बढे़गी वनडे अपना रोमांच खोता जाएगा। हालांकि टेस्ट क्रिकेट पर इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ने वाला क्योंकि उसे चाहने वाले दर्शकों का वर्ग एकदम भिन्न है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;70 के दशक में हुए विवादित कैरी पैकर सीरीज ने वनडे क्रिकेट को नया जीवन दिया था। इस सीरीज में खिलाड़ी सफेद कपड़ों में नजर आने वाले देवदूतों की जगह रंगीन कपड़ों में लिपटे ग्लैडिएटर नजर आए। लाल रंग की गेंद की जगह सफेद रंग की गेंद ने ली और डे-नाइट मैचों ने आफिस में काम करने वालों को भी मैच देखने के लिए उचित समय मुहैया कराया। लेकिन उस सीरीज के बाद से अब तक वनडे क्रिकेट में खास बदलाव नहीं आया है। पावर-प्ले और फ्री हिट को छोड़ दें तो वनडे क्रिकेट वहीं का वही है। वैसे भी जिस धारणा के आधार पर वनडे क्रिकेट की शुरुआत हुई थी उसी धारणा को अपना सबसे बड़ा अस्त्र बनाकर ट्वंटी 20 ने उस पर धावा बोला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वनडे क्रिकेट इसलिए शुरू किया गया था ताकि जो दर्शक वर्ग टेस्ट मैचों में लगने वाले समय और इसके धीमेपन को पसंद को नहीं पसंद करता है वह भी इसके बहाने मैदान पर मैच देखने आएं और टेलिविजन पर भी इस खेल के प्रशंसक बने। पिछले 30 साल से वनडे इन लक्ष्यों को हासिल भी कर रहा था लेकिन अब ट्वंटी 20 के प्रादुर्भाव से इसके अस्तित्व के ऊपर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या आने वाले सालों में वनडे क्रिकेट खत्म हो जाएगा। अगर इसे बचाने के प्रयास अभी से न किए गए तो जरूर खत्म हो जाएगा। इसके लिए जो सुझाव आजकल क्रिकेट पंडितों के बीच चर्चा में है वह है कि वनडे को ट्वंटी 20 का डबल डोज बना दिया जाए। यानी एक वनडे मैच को दो ट्वंटी 20 मैच में तब्दील कर दिया जाए मैच का नतीजा दोनों टीमों की दोनों पारियों के आधार पर किया जाए। इस तरह का प्रयोग 90 के दशक में किया गया था लेकिन तब वह सफल नहीं रहा था लेकिन अब लोग ट्वंटी का स्वाद चख चुके हैं तो इसके सफल होने की गुंजाइश बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तो तय है कि आने वाले दिनों में ट्वंटी 20 अपना पैर और पसारेगा। जो आईपीएल इस बार डेढ़ महीने चला आगे चलकर तीन या चार महीनों का हो जाएगा या फिर इसका आयोजन साल में दो बार होगा। आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और पाकिस्तान भी आईपीएल का अनुसरण करने की ताक में है। इस स्थिति को ध्यान में रखकर क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं के वनडे के भविष्य पर खासा ध्यान देना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1758343911280211198?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1758343911280211198/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1758343911280211198' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1758343911280211198'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1758343911280211198'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/20.html' title='वन-डे को बनाना होगा ट्वंटी 20 का डबल डोज'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SCK02HgyAsI/AAAAAAAAABM/Qz6MY3YPpGY/s72-c/ipl.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3882100244809997019</id><published>2008-06-03T21:07:00.001+05:30</published><updated>2008-06-03T21:10:28.133+05:30</updated><title type='text'>स्कूल के दिनों में तो खेलते थे लेकिन क्या स्कूल में भी खेलते थे?</title><content type='html'>अमूमन मैं किसी से पूछता हूं कि आपने फलां खेल आखिरी बार कब खेला तो जवाब मिलता है स्कूल के दिनों में। हमलोगों में ज्यादातर ने स्कूल के दिनों में खेल-कूद का खूब मजा उठाया है लेकिन स्कूल के बाहर। जब स्कूल में खेलने की बात आती है तो संख्या में भारी गिरावट आ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे लोग जो कहते हैं कि उन्होंने स्कूल में भी खेला है उनमें से ज्यादातर प्रार्थना (प्रेयर) से पहले होने वाले पीटी क्लास में थोड़ा बहुत हाथ पैर घुमाया है और हाफ टाइम (टिफीन) में लुका छुपी जैसे खेलों का लुत्फ उठाया है। हमारे स्कूल में एक छोटा सा मैदान हुआ करता था जहां हम 45 मिनट के टिफीन ब्रेक में पांच-पांच ओवर का क्रिकेट मैच खेलते थे। इसमें भी कुल जमा 22 छात्रों को ही मौका मिल पाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि बड़े-बड़े निजी विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय सरीखे स्कूलों से पढ़े हमारे मित्र इस बात से इत्तेफाक नहीं रखेंगे। इन स्कूलों में टेबल टेनिस, बालीवाल, फुटबाल, क्रिकेट और भी तमाम खेलों की टीमें होती हैं जो साल में एक दो बार ऑल इंडिया लेवल पर होने वाली प्रतियोगिताओं में भाग भी लेती है। लेकिन इन विद्यालयों में भी खेल का कैसा स्तर है या इनके कोच किस काबिल हैं ये बताने की जरूरत नहीं है। अगर इनकी व्यवस्था सफल होती तो आज विभिन्न खेलों में भारत को रिप्रजेंट करने वाले ज्यादातर खिलाड़ी इन्हीं स्कूलों के प्रोडक्ट होते लेकिन ऐसा नहीं है। चलिए मान भी लें कि ये स्कूल स्कूली स्तर पर खेल को प्रोत्साहन देते हैं तो सवाल यह है कि ऐसे स्कूलों की संख्या है ही कितनी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे भारत में हजारों ऐसे निजी और सरकारी विद्यालय हैं जहां खेल-कूद की कोई सुविधा नहीं है और इन्हीं हजारों विद्यालयों में भारत के 95 फीसदी छात्र पढ़ाई करते हैं। जब इन विद्यालयों में खेल-कूद से जुड़ी सुविधाओं की बात उठाई जाती है तो जवाब आता है कि पहले पढ़ाई ढंग से सुनिश्चित हो जाए खेल-कूद तो होता रहेगा। यही ढुलमुल रवैया भारत को कभी खेलों में आगे नहीं बढ़ने देगा। अगर ओलंपिक जैसी स्पर्धाओं में भारत पदकों के लिए तरसता रहता है तो इसके पीछे स्कूलों में खेल-कूद के लिए जरूरी साजोसमान व सुविधाएं न होना बड़ा कारण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोगों का कहना है कि भारत अभी एक विकासशील राष्ट्र है और यहां स्कूल स्तर पर खेलों का विकास अभी मुमकिन नहीं है। यह तर्क सरसरी नजर में वाजिब जान पड़ता है लेकिन हकीकत इससे मेल नहीं खाती है। आज जितने भी विकसित राष्ट्र हैं वहां खेलों का विकास उसी चरण में हुआ जब वहां की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्थाएं विकास कर रही थी। चीन आज भी एक विकासशील राष्ट्र है और वहां स्कूलों में खेल के स्तर पर कितना ध्यान दिया जाता है यह बताने की जरूरत नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सभी जानते हैं कि अमेरिका सुपर पावर है। लेकिन वह सिर्फ हथियारों, पैसे और राजनीतिक दबदबे के आधार पर ही सुपर पावर नहीं है बल्कि खेलों में भी एक-आध देश ही उसके स्तर के आसपास हैं। लेकिन आपको यह जानकर हैरत हो सकती है कि अमेरिका में जितना पैसा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों के स्तर पर खर्च किया जाता है उससे कहीं अधिक स्कूल और कॉलेज स्तर के खेलों पर किया जाता है। अमेरिका के नौ सबसे बड़े स्टेडियम किसी न किसी कॉलेज या स्कूल के स्टेडियम हैं। अगर कोई अमेरिकी अखबार नेशनल बास्केटबॉल लीग (एनबीए) को कवर करने के लिए चार रिपोर्टर रखता है तो स्कूल स्तर पर होने वाले बास्केटबाल लीग को कवर करने के लिए 16 रिर्पोटर रखता है। इतना ही नहीं स्कूली टूर्नामेंटों का लाइव टेलीकास्ट भी किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप भारत की तुलना अमेरिका जैसे संपन्न राष्ट्र से नहीं करना चाहते हैं तो जरा चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे देशों के स्पो‌र्ट्स कल्चर को जानने की कोशिश करें। इन देशों के स्कूलों में भी खेल पर खासा ध्यान दिया जाता है और ये कोशिश की जाती है इनके बच्चे जितने अच्छे गणित में हों उतने ही अच्छे खेल-कूद में भी हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी सरकार हमेशा यह बात कहती है कि स्कूल स्तर पर खेलों को बढ़ावा देना होगा लेकिन वह इसे अमल में लाने का इरादा नहीं रखती। स्कूली स्तर पर कुछ प्रतियोगिताएं जरूर आयोजित होती हैं लेकिन इसमें भाग लेने वाले ज्यादातर प्रतिभागी कोई ट्रेनिंग लेकर नहीं आते हैं। स्कूलों में खेल-कूद की सुविधाओं के विकास के लिए कुछ पैसे भी आवंटित किए जाते हैं लेकिन ये पैसे भी मैदान में पहुंचने के बजाय भोजन बनकर किसी के पेट में पहुंच जाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3882100244809997019?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3882100244809997019/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3882100244809997019' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3882100244809997019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3882100244809997019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post_03.html' title='स्कूल के दिनों में तो खेलते थे लेकिन क्या स्कूल में भी खेलते थे?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-8348923597131348296</id><published>2008-06-02T18:03:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:21.187+05:30</updated><title type='text'>आईपीएल के बाद कुछ फुटबाल-शुटबाल हो जाए</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SEPo8_MaIJI/AAAAAAAAACQ/SgatQdSPhjQ/s1600-h/euro2008.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SEPo8_MaIJI/AAAAAAAAACQ/SgatQdSPhjQ/s200/euro2008.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5207261728623698066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नई दिल्ली। करीब डेढ़ महीने तक इंडियन प्रीमियर लीग के धूम धड़ाके का मजा लेने के बाद अगर आप खुद को खाली-खाली सा महसूस कर रहे हैं तो निराश होने की जरूरत नहीं है। 7 जून से 29 जून तक आस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड में यूरोप की शीर्ष 16 टीमें फुटबाल के अर्धकुंभ यूरो कप में जोर आजमाइश के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। यूं तो यहां आपको चौके, छक्के और विकेट का रोमांच नहीं मिलेगा लेकिन इस बात की गारंटी दी जा सकती है कि यहां भी खेल प्रेमियों के लिए मनोरंजन की कोई कमी नहीं होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो देशों की संयुक्त मेजबानी में होने वाले इस टूर्नामेंट में आठ स्टेडियमों में कुल 31 मैच खेले जाएंगे और 29 जून को आस्ट्रिया की राजधानी वियाना के अर्नस्ट हप्पेल स्टेडियम में खेले जाने वाले फाइनल मुकाबले के बाद यूरो 2008 का विजेता सामने आएगा। रोमांच और उलटफेर के हिसाब से आंके तो यूरो कप किसी भी मायने में फीफा विश्व कप से उन्नीस नहीं ठहरता। पुर्तगाल में हुए पिछला यूरो कप इस बात का साक्षी है जहां अंडर डॉग माना जाने वाला ग्रीस तमाम कयासों से विपरीत कई दिग्गज टीमों को धूल चटाते हुए यूरोप का सिरमौर बना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि इस बार यूरो कप में इंग्लैंड के न भाग लेने से कुछ सूनापन जरूर रहेगा। जर्मनी में हुए पिछले विश्व कप के बाद कई बदलावों से गुजर रही इंग्लैंड की टीम इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई नहीं कर सकी। किसी बड़े फुटबाल टूर्नामेंट में इंग्लैंड का न खेलना कुछ वैसा ही है जैसा किसी बड़े क्रिकेट टूर्नामेंट में भारत का न खेलना। खैर, इसके बावजूद मौजूदा विश्व चैंपियन इटली, उप विजेता फ्रांस, मौजूदा यूरो चौंपियन ग्रीस, पुर्तगाल, क्रोएशिया और चेक रिपब्लिक जैसी टीमें अपने शानदार खेल से लोगों का मनोरंजन करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूरो कप 2008 के लिए क्वालीफाई करने वाली टीमें में आस्ट्रिया, स्विटजरलैंड (मेजबान टीम होने के नाते), पोलैंड, पुर्तगाल, इटली, फ्रांस, ग्रीस, तुर्की, चेक रिपब्लिक, जर्मनी, क्रोएशिया, रूस, स्पेन, स्वीडन, रोमानिया और हालैंड हैं। इन टीमों को चार ग्रुप में बांटा गया है। ग्रुप ए में स्विट्जरलैंड, चेक रिपब्लिक, पुर्तगाल, और तुर्की है, ग्रुप बी में आस्ट्रिया, क्रोएशिया, जर्मनी व पोलैंड हैं, ग्रुप सी में हालैंड, इटली, फ्रांस और रोमानिया की टीमें हैं जबकि ग्रुप डी में ग्रीस, स्वीडन, स्पेन और रूस को रखा गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरुआती मुकाबले राउंड रोबिन लीग के तहत खेले जाएंगे और हर ग्रुप से शीर्ष दो टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंचेंगी। टीमों की क्षमता के हिसाब से ग्रुप सी को ग्रुप को डेथ कहा जा सकता है जहां पहले दो स्थानों के लिए फ्रांस, इटली और हालैंड में मुख्य मुकाबला होगा। क्वालीफाइंग मैचों में रोमानिया के प्रदर्शन के ध्यान में रखते हुए उसकी संभावनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं तो सभी 16 टीमें खिताब जीतने की क्षमता रखती है लेकिन हालिया फार्म के आधार पर इटली, फ्रांस, पुर्तगाल, क्रोएशिया, हालैंड और ग्रीस को मुख्य दावेदार माना जा रहा है। लेकिन क्रिकेट की ही तरह फुटबाल भी घोर अनिश्चितताओं का खेल है और कौन सी टीम बाजी मार जाए कहना मुश्किल है और अनिश्चितता का यही पुट इस खेल को इतना लोकप्रिय बनाता है। तो फिर आप भी तैयार हो जाइए यूरो 2008 का मजा लेने के लिए आखिर इसके मैच भी आईपीएल मैचों की तरह तीन घंटे के भीतर समाप्त हो जाएंगे फर्क सिर्फ इतना होगा कि चौके-छक्के की जगह गोल मिलेंगे और नो बॉल, वाइड बॉल की जगह रेड कार्ड, यलो कार्ड और फ्री किक के नजारे सामने आएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-8348923597131348296?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/8348923597131348296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=8348923597131348296' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8348923597131348296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8348923597131348296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='आईपीएल के बाद कुछ फुटबाल-शुटबाल हो जाए'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SEPo8_MaIJI/AAAAAAAAACQ/SgatQdSPhjQ/s72-c/euro2008.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6357866587571796767</id><published>2008-05-30T20:43:00.003+05:30</published><updated>2008-05-30T20:46:11.833+05:30</updated><title type='text'>क्रिकेट के फुटबालीकरण के लिए तैयार हैं आप</title><content type='html'>आप इसे अच्छी खबर माने या बुरी खबर लेकिन अब क्रिकेट को फुटबाल के अंतरराष्ट्रीय सांचे में ढालने की पुरजोर तैयारी हो रही है। इसकी शुरुआत आईपीएल से हुई है और अब ज्यादातर देशों के क्रिकेट बोर्ड अपने यहां अपनी तरह का आईपीएल लाने की जुगत में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं तो इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान में घरेलू ट्वंटी 20 टूर्नामेंट का आयोजन पहले से हो रहा है लेकिन ये देश आईपीएल की तर्ज पर ज्यादा लोकप्रिय और कमाऊ ट्वंटी 20 लीग शुरू करना चाहते हैं। मुमकिन है कि इन देशों के बोर्ड भी बीसीसीआई की तर्ज पर फ्रेंचाइजी सिस्टम को तरजीह दें और बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों की खरीद बिक्री करे। इन देशों के लिए आईपीएल की नकल करने के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला ये कि इन जगहों पर क्रिकेट का पारंपरिक स्वरूप (टेस्ट व वनडे क्रिकेट) तेजी से लोकप्रियता खोता जा रहा है और दूसरा कारण यह है कि भारत और पाकिस्तान को छोड़कर ज्यादातर देशों में फुटबाल की लोकप्रियता क्रिकेट को नुकसान पहुंचा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकप्रियता के हिसाब से इंग्लैंड में तो फुटबाल पहले ही नंबर वन खेल है। पिछले फुटबाल विश्व कप में आस्ट्रेलिया के क्वालीफाई करने की वजह से इस कंगारू देश में फुटबाल तेजी से पैर पसार रहा है। अगला फुटबाल विश्व कप दक्षिण अफ्रीका में होने जा रहा है और यह वहां भी अपने लिए नए प्रशंसक बना रहा है। वैसे रग्बी दक्षिण का सबसे लोकप्रिय खेल है और उसके बाद क्रिकेट का नंबर आता है लेकिन वहां फुटबाल की बढ़ती लोकप्रियता का यह आलम है इससे रग्बी को भी खतरा महसूस होने लगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीसीसीआई भी इन देशों को आईपीएल की तरह का टूर्नामेंट लाने में पूरी मदद करने को तैयार है। आईपीएल के गठन में मुख्य भूमिका निभाने वाले पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन (पीसीए) के अध्यक्ष आईएस बिंद्रा कहते हैं यह क्रिकेट का वृहद स्वरूप होगा। तब सभी देशों में इंग्लिश प्रीमियर लीग फुटबाल की तर्ज पर ट्ंवटी 20 क्रिकेट लीग होगा और हम यूएफा चैंपियंस लीग की तरह क्रिकेट का चैंपियंस लीग शुरू कर सकेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिंद्रा की ये बातें साफ इशारा करती हैं कि किस कदर क्रिकेट को फुटबाल के सांचे में ढालने की कोशिश की जा रही है। अगर ऐसा हुआ तो इसकी मार निश्चित रूप से सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट पर पड़ेगी। अगर हम ध्यान दें तो आज अंतरराष्ट्रीय फुटबाल खिलाड़ी अपना ज्यादातर वक्त अपने देश की टीम के बजाय अपने क्लब को देता है। इस साल यूरोपीयन फुटबाल में तहलका मचाने वाले क्रिस्टियानो रोनाल्डो का उदाहरण हमारे सामने है। ज्यादातर फुटबाल प्रशंसक उन्हें मैनचेस्टर यूनाईटेड के स्ट्राइकर के तौर जानता है न कि पुर्तगाल के मिडफील्डर के रूप में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर फुटबाल की अंतरराष्ट्रीय संस्था फीफा ने इस व्यवस्था जानबूझकर अपनाया है क्योंकि फुटबाल में भाग लेने वाले प्रतिस्पर्धी देशों की संख्या काफी अधिक है और ऐसे में हर देशों के बीच दो पक्षीय मुकाबले का नियमित आयोजन करवा पाना मुमकिन नहीं है। साथ ही फीफा फुटबाल विश्व कप का चार्म बचाए रखने के लिए दो देशों के बीच ज्यादा आपसी मुकाबले होने भी नहीं देना चाहता है। इसी प्रयास के तह फीफा ओलंपिक की फुटबाल में स्पर्धा भाग लेने के लिए खिलाडि़यों की उम्र सीमा 23 वर्ष निर्धारित कर रखी है ताकि यह विश्व कप फुटबाल की बराबरी न कर सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यह गौर करने वाली बात है कि जब क्रिकेट के पास फुटबाल जैसे हालात नहीं हैं तो क्यों क्रिकेट के कर्ताधर्ता फुटबाल का अंधा अनुसरण करने की कोशिश में लगे हैं। क्या इससे वाकई क्रिकेट को फायदा होगा। क्रिकेट को हो न हो सभी देशों के क्रिकेट बोर्ड को जरूर होगा। ट्वंटी 20 लीग बुरा नहीं है लेकिन इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाए कि इसका विकास टेस्ट व वनडे क्रिकेट की कीमत पर न हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-6357866587571796767?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6357866587571796767/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=6357866587571796767' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6357866587571796767'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6357866587571796767'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_30.html' title='क्रिकेट के फुटबालीकरण के लिए तैयार हैं आप'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-1104720178375522774</id><published>2008-05-27T19:11:00.002+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:21.309+05:30</updated><title type='text'>क्या भारतीय त्रिमूर्ति को आईपीएल से फायदा हुआ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDwQ-_MaIII/AAAAAAAAACI/lF86u5rbteI/s1600-h/saraga1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDwQ-_MaIII/AAAAAAAAACI/lF86u5rbteI/s200/saraga1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205053943634862210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का पहला सत्र अब समाप्त होने के कगार पर है। यह टूर्नामेंट क्रिकेट जगत में एक अभूतपूर्व क्रांति की तरह घटित हुआ। इसने साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय मैचों के इतर होने वाले मुकाबले को भी दर्शक मिल सकते हैं और अच्छे क्रिकेटर सिर्फ वही नहीं होते जिनको राष्ट्रीय टीम में खेलने का मौका मिलता है। विभिन्न देशों के कई युवा व बुजुर्ग खिलाडि़यों ने शानदार खेल दिखाया लेकिन क्या इससे भारतीय त्रिमूर्ति सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली को कोई फायदा पहुंचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन तीनों क्रिकेटरों ने पिछले वर्ष दक्षिण अफ्रीका में हुए ट्वंटी 20 विश्व कप में खेलने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि क्रिकेट का यह प्रारूप युवाओं के ज्यादा अनुकूल है। अब सवाल यह उठता कि जब ये तीनों 15 दिनों तक चलने वाले उस टूर्नामेंट में खेलने का साहस नहीं जुटा पाए थे तो क्या सोचकर उन्होंने 59 दिनों तक चलने वाले आईपीएल में खेलने का फैसला किया। आईपीएल में इनके प्रदर्शन से यह बात तो साबित हो ही गई ट्वंटी 20 विश्व कप में न खेलने का इनका फैसला एकदम सही था। जरा सोचिए कि अगर उस विश्व कप में गौतम गंभीर की जगह सौरव गांगुली, रोबिन उथप्पा की जगह राहुल द्रविड़ और रोहित शर्मा की जगह सचिन तेंदुलकर खेलते तो क्या भारत विजेता बनता। तब क्या भारत को महेंद्र सिंह धोनी जैसा कप्तान मिलता। शायद नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन तेंदुलकर चोट के कारण मुंबई इंडियंस के शुरुआती सात मैचों में नहीं खेल पाए थे। उन्होंने जो छह मैच खेले उसमें एक अर्धशतक के साथ कुल जमा 148 रन बना पाए। यही नहीं इन मैचों में खेलने की वजह से उनकी चोट फिर से उभर गई है और वह बांग्लादेश में होने वाली त्रिकोणीय सीरीज में नहीं खेलेंगे। अब बात राहुल द्रविड़ की करें तो टीम इंडिया की इस दीवार ने 13 मैचों में 30 की औसत से और 127.65 के स्ट्राइक रेट के साथ 360 रन बनाए हैं। वहीं प्रिंस ऑफ कोलकाता ने इतने ही मैचों में 29.08 की औसत और 113.68 के स्ट्राइक रेट के साथ 349 रन बटोरे। एक नजर में तो गांगुली और द्रविड़ का प्रदर्शन अच्छा प्रतीत होता है लेकिन इन दोनों बल्लेबाजों ने इसमें से करीब 100-125 रन तब बनाए जब उनकी टीमों का आईपीएल से पत्ता कट चुका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांगुली कहते हैं कि आईपीएल के प्रदर्शन पर चयनकर्ताओं को गौर करना चाहिए। चयनकर्ता जरूर इन प्रदर्शनों पर गौर करेंगे लेकिन इसमें भी उनके सामने गांगुली और द्रविड़ से पहले गौतम गंभीर (13 मैच, 523 रन, 43.58 औसत ), रोहित शर्मा (13 मैच 404 रन 36.72 औसत) और वीरेंद्र सहवाग (13 मैच 403 रन 36.63 औसत) के नाम आएंगे। महेंद्र सिंह धोनी, शिखर धवन, रोबिन उथप्पा, यूसुफ पठान, सुरेश रैना, स्वप्निल असनोदकर, अभिषेक नायर भी गांगुली और द्रविड़ से ज्यादा पीछे नहीं हैं और इन सभी बल्लेबाजों ने इन दोनों धुरंधरों की तुलना में बेहतर स्ट्राइक रेट के साथ रन बटोरे हैं। यह कहने की बिल्कुल जरूरत नहीं है कि क्षेत्ररक्षण के मामले में गांगुली-द्रविड़-सचिन बेहतर हैं या ये युवा क्रिकेटर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन भले ही टेस्ट मैचों में शेन वार्न को आगे निकलकर छक्के जड़ते थे लेकिन आईपीएल में उसी वार्न के आगे वह बंधे हुए नजर आए। गांगुली और द्रविड़ ने एक दो पारियां तेज जरूर खेली लेकिन उनकी यह तेजी ट्वंटी 20 के माफिक नहीं लगती। कुल मिलाकर सार यही निकलता है यह भारतीय त्रिमूर्ति भले ही टेस्ट और वनडे के शानदार खिलाड़ी रहे हों लेकिन ट्वंटी 20 उनके लायक नहीं है और टूर्नामेंट खत्म होने के बाद उन्हें यह जरूर सोचना चाहिए कि क्या आईपीएल में खेलकर उन्हें कोई फायदा हुआ (मैं आर्थिक लाभ की बात नहीं कर रहा हूं)।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-1104720178375522774?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/1104720178375522774/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=1104720178375522774' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1104720178375522774'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/1104720178375522774'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_5085.html' title='क्या भारतीय त्रिमूर्ति को आईपीएल से फायदा हुआ?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDwQ-_MaIII/AAAAAAAAACI/lF86u5rbteI/s72-c/saraga1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3822255945240424238</id><published>2008-05-27T17:02:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:21.448+05:30</updated><title type='text'>हमारे तेज गेंदबाज औसत बनकर क्यों रह जाते हैं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDvyjPMaIHI/AAAAAAAAACA/SRZhRk4oR7g/s1600-h/zaheer1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDvyjPMaIHI/AAAAAAAAACA/SRZhRk4oR7g/s200/zaheer1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5205020481544659058" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जवागल श्रीनाथ, वेंकटेश प्रसाद, अमय कुरविला, जहीर खान, आशीष नेहरा, इरफान पठान, एल बालाजी, रुद्र प्रताप सिंह, ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने कपिल देव के संन्यास लेने के बाद कभी न कभी भारतीय तेज गेंदबाजी की कमान संभाली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से लगभग सभी ने अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर की अच्छी शुरुआत की और कुछ मैचों में अपने दम पर भारत को जीत भी दिलाई लेकिन सवाल यह है क्या हमारे ये तेज गेंदबाजों विश्व के अपने समकालीन महान तेज गेंदबाजों की श्रेणी में आते हैं। जब श्रीनाथ और प्रसाद का दौर था तब ग्लेन मैक्ग्रा, वसीम अकरम, एलन डोनाल्ड, शॉन पोलाक, वकार यूनुस और चामिंडा वास जैसे गेंदबाजों ने अपनी चमक बिखेरी। इनके आगे श्रीनाथ और वेंकटेश औसत ही नजर आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीनाथ और वेंकटेश के बाद जहीर युग की शुरुआत हुई लेकिन वह भी ऊपर लिखे कुछ नामों की ख्याति के आगे दब से गए। फिर आशीष नेहरा, एल बालाजी, इरफान पठान और रुद्र प्रताप सिंह जैसे गेंदबाजों ने कमान संभाली है लेकिन लगता है कि आस्ट्रेलिया के ब्रेट ली और स्टुअर्ट क्लार्क, दक्षिण अफ्रीका के डेल स्टेन और इंग्लैंड के रेयान साइडबाटम इनके युग के सर्वश्रेष्ठ तेज गेंदबाज कहलाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी क्या वजह है कि भारतीय तेज गेंदबाज अच्छी शुरुआत को कायम नहीं रख पाते हैं। जहां विश्व के अन्य तेज गेंदबाज औसत शुरुआत के बाद अपनी क्षमता में लगातार इजाफा करते रहते हैं वहीं हमारा कोई तेज गेंदबाज समय के साथ स्विंग खो देता है तो कोई रफ्तार। कुछ ऐसे भी हैं जिनमें न तो स्विंग बचती है और न ही रफ्तार। उदाहरण के तौर पर ब्रेट ली और जहीर खान के कैरियर की प्रगति का अवलोकन करें तो स्थिति साफ हो जाती है। दोनों ही तेज गेंदबाजों ने वर्ष 2000 में अपने-अपने कैरियर की शुरुआत की थी। ली के पास सिर्फ तेजी थी जबकि जहीर के पास अच्छी तेजी के साथ-साथ, दोनों ओर स्विंग कराने की क्षमता और एक अच्छा यार्कर भी था। अब देखिए ब्रेट ली के पास क्या-क्या है और जहीर के पास क्या बचा है। तूफानी रफ्तार के साथ इन स्विंग, आउट स्विंग, स्लोवर, कटर और योर्कर जैसे हथियारों के साथ ली फिलहाल दुनिया के श्रेष्ठ गेंदबाज हैं तो जहीर एक औसत गेंदबाज से ज्यादा कुछ नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बालाजी और नेहरा तो अपना फिटनेस ही कायम नहीं रख सके तो इरफान पठान की स्विंग और रफ्तार कहां गायब हुई यह उन्हें भी नहीं मालूम। पठान आज भी विकेट ले रहे हैं लेकिन उस तेजी के साथ नहीं जिसके लिए वह जाने जाते थे। अपनी बनाना इन स्विंग के लिए मशहूर पठान आज वनडे और ट्वंटी 20 में जरूर सफल हो रहे हैं लेकिन टेस्ट टीम में जगह बनाने के लिए उन्हें अपनी बल्लेबाजी का सहारा लेना पड़ता है। एक अन्य तेज गेंदबाज रुद्र प्रताप सिंह ने हालांकि अब तक खुद में सुधार ही किया है लेकिन डेल स्टेन और रेयान साइडबाटम तेजी से उन्हें पीछे छोड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि भारतीय तेज गेंदबाजी एक नाम जरूर ऐसा सामने आया है जिसमें अपने समकालीन गेंदबाजों को पीछे छोड़ने की क्षमता है। वह तेज गेंदबाज हैं दिल्ली के ईशांत शर्मा। यह 19 साल का गेंदबाज बांग्लादेश में अपने कैरियर की शुरुआत से लेकर अब तक लंबा सफर तय चुका है। आस्ट्रेलिया में अपनी धारदार गेंदबाजी से उन्होंने सभी को प्रभावित किया है लेकिन अगर उन्हें औसत की राह छोड़कर महानता का रास्ता अख्तियार करना है तो खुद को हमेशा अपडेट करते रहना होगा और भारत के पिछले कई तेज गेंदबाजों की तुलना में आत्ममुग्धता से बचना होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3822255945240424238?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3822255945240424238/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3822255945240424238' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3822255945240424238'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3822255945240424238'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html' title='हमारे तेज गेंदबाज औसत बनकर क्यों रह जाते हैं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDvyjPMaIHI/AAAAAAAAACA/SRZhRk4oR7g/s72-c/zaheer1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3329824976014623834</id><published>2008-05-22T15:35:00.004+05:30</published><updated>2008-05-22T15:54:48.308+05:30</updated><title type='text'>थप्पड़ ने दिया सडेन डेथ</title><content type='html'>ऐसा नहीं है कि खेल के मैदान में थप्पड़ सिर्फ आईपीएल में चले और थप्पड़ जड़ने वाला शख्स हमेशा हरभजन सिंह ही हो। बुधवार रात को एक थप्पड़ फुटबाल के मैदान में भी चला और वह भी किसी मामूली मैच में नहीं बल्कि मास्को में हुए यूएफा चैंपियंस लीग के फाइनल में चला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुकाबला इंग्लैंड के दो मशहूर क्लबों मैनचेस्टर यूनाईटेड और चेल्सी के बीच था। मैच निर्धारित समय में 1-1 की बराबरी पर रहा था और खेल 30 मिनट के अतिरिक्त समय में चल रहा था। जब यह तय लगने लगा था कि फैसले के लिए पेनाल्टी शूट आउट का सहारा लेना ही पड़ेगा तभी चेल्सी के स्टार मिडफील्डर और पेनाल्टी स्पेशलिस्ट डाइडिएर ड्रोगबा ने थ्रो इन मसले पर हुए मामूली विवाद पर यूनाइटेड के खिलाड़ी मार्क विदिच को थप्पड़ जड़ दिया। उन्हें रेड कार्ड दिखाया गया और वह मैच से बाहर हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेनाल्टी शूट आउट में चेल्सी को ड्रोगबा को भारी कमी खली और वह सडेन डेथ तक खिंचे इस मैच में 5-6 से पराजित हो गया और कभी राजनीतिक कारणों से लाल रहने वाला मास्को बुधवार की इस रात को मैनचेस्टर यूनाईटेड के लाल रंग में सराबोर हो गया। यूनाईटेड के सभी खिलाड़ी जश्न में डूब गए तो चेल्सी के मुर्झाए चेहरे यही सोच रहे होंगे ड्रोगबा तूने क्या किया क्योंकि ड्रोगबा की अनुपस्थिति में चेल्सी के कप्तान जॉन टैरी को पेनाल्टी लेने के लिए आना पड़ा और वह अपना शॉट गोल पोस्ट के बाहर खेल बैठे। अगर वह यह गोल कर जाते तो यह मैच चेल्सी की झोली में चला जाता लेकिन वह चूक गए और यूनाईटेड को बराबरी मिल गई। इसके बाद यूनाईडेट के गोलकीपर वान डेर सार ने सडेन डेथ में एक और पेनाल्टी रोक कर अपनी टीम को ऐतिहासिक जीत दिला दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ड्रोगबा की गलती कुछ-कुछ जर्मनी में हुए पिछले विश्व कप फुटबाल फाइनल की याद दिला गई। तब फ्रांस और इटली के बीच हुए मुकाबले में फ्रांस के धुरंधर जिनेदिन जिदान के इटली के मार्को मेतराजी के सीने पर हेडर दे मारा जिससे उन्हें रेड कार्ड देखना पड़ा और वह मैच से बाहर हो गए। इसका खामियाजा फ्रांस को पेनाल्टी शूट आउट में भुगतना पड़ा और इटली विश्व चैंपियन बना गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/sports/football/7_34_4471628/"&gt;&lt;br /&gt;यह आलेख मैंने अपने संस्थान की वेबसाइट जागरण. काम के लिए लिखा है जिसे अपने ब्लॉग पर भी चस्पा कर दिया है। इसे जागरण.काम पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3329824976014623834?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3329824976014623834/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3329824976014623834' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3329824976014623834'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3329824976014623834'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_22.html' title='थप्पड़ ने दिया सडेन डेथ'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-7973461050522135437</id><published>2008-05-21T18:03:00.001+05:30</published><updated>2008-05-21T22:02:53.267+05:30</updated><title type='text'>शायद पेस से जलते हैं भूपति</title><content type='html'>बीजिंग ओलंपिक शुरू होने में महज तीन महीने ही बचे हैं और टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति ने यह कह कर सभी को चौंका दिया है कि वह लिएंडर पेस के साथ जोड़ी बनाकर इसमें भाग नहीं लेना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओलंपिक में भारत को पदकों के लिए किस कदर तरसना पड़ता है यह बताने की जरूरत नहीं है। 1980 के बाद हमने ओलंपिक स्वर्ण का स्वाद नहीं चखा है। 1984, 1988 और 1992 में तो हमें एक भी पदक नहीं मिला। 1996 के अटलांटा ओलंपिक में लिएंडर ने टेनिस में पुरुष एकल का कांस्य पदक जीतकर 16 साल का सूखा समाप्त किया। इसके बाद सिडनी में कर्नम मल्लेश्वरी ने कांस्य जीता तो 2004 में एथेंस में डबल ट्रैप शूटर राजवर्धन राठौड़ ने चांदी का तमगा जीतकर देश वासियों को खुश होने का मौका दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार भले ही पदकों के लिए कई दावे किए जा रहे हों लेकिन सच्चाई यही है कि बीजिंग में भी हम पदक के लिए कुछ ही नामों पर निर्भर होंगे। इन्हीं चंद नामों में लिएंडर पेस और महेश भूपति भी हैं। एथेंस में इन दोनों की जोड़ी ने सेमीफाइनल तक का सफर तय किया और यह भारत व इनका दुर्भाग्य रहा है कि वे बहुत करीबी अंतर से सेमीफाइनल व कांस्य पदक के लिए हुआ मुकाबला हार गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार भूपति यह तर्क दे रहे हैं कि लंबे समय से संवाद न हो पाने और साझा तैयारियों के अभाव के कारण वह पेस के साथ जोड़ी नहीं बनाना चाहते हैं। क्या भूपति बताएंगे कि सिडनी और एथेंस ओलंपिक से पहले क्या उन्होंने पेस के साथ पूरी तैयारी की थी। निश्चित तौर पर उनका जवाब ना होगा। तो भूपति भाई पिछली बार आप बिना किसी खास तैयारी के साथ पेस के साथ मिलकर सेमीफाइनल में पहुंच गए तो इस बार उससे अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बात समझ में नहीं आती कि क्यों भूपति राष्ट्रीय हित के खातिर ही सही कुछ महीनों के लिए पेस के साथ अपने मतभेदों को क्यों नहीं भूल जाते हैं। यह वही लिएंडर पेस हैं जिन्होंने भूपति को भूपित बनने में मदद की है। भूपति को डेविस कप में अच्छे प्रदर्शन के बाद एटीपी सर्किट में अपना युगल जोड़ीदार बनने की पेशकश लिएंडर ने ही की थी। सभी जानते हैं कि लिएंडर सिंगल्स के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी थे लेकिन उन्होंने इसकी परवाह न करते हुए भूपति के साथ जोड़ी बनाई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है समय के साथ भूपति को पेस से जलन होने लगी। उनके मन में यह बात घर करने लगी कि सारी कामयाबियों का सेहरा पेस के सिर ही बंध जाता है। यह सही है कि पेस-भूपति की साझा कामयाबियों में ज्यादा श्रेय लिएंडर को मिला लेकिन भूपति ने शायद इसके पीछे मौजूद कारण को जानने की कोशिश नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिएंडर उन खिलाडि़यों में हैं जिन्होंने हमेशा तिरंगे की शान के लिए खेला है। एटीपी सर्किट में वह भले ही किसी औने-पौने खिलाड़ी से हार जाते हैं लेकिन डेविस कप, एशियन गेम्स और ओलंपिक जैसी स्पर्धाओं में वह खुद से कई गुना अच्छे खिलाडि़यों को धूल चटा देते हैं। पेस की इसी खूबी ने उन्हें देशवासियों का लाडला बना दिया। भूपति को शायद पेस की यही लोकप्रियता अखर रही है। वह सोचते होंगे कि अगर वह पेस के साथ ओलंपिक पदक जीत जाते हैं तो दुनिया कहेगी कि पेस ने अपने कैरियर में दो बार ओलंपिक पदक जीता है जबकि भूपति ने सिर्फ एक बार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूपति युवा खिलाड़ी रोहन बोपन्ना के साथ जोड़ी बनाना चाहते हैं। बोपन्ना ने भले पिछले एक-दो सालों में पाकिस्तान के ऐसाम उल हक कुरैशी के साथ मिलकर दो-चार एटीपी चैलेंजर्स में अच्छा प्रदर्शन किया हो लेकिन अभी वह इतने मंझे हुए खिलाड़ी नहीं बने हैं कि ओलंपिक पदक जीत लें। शायद भूपति इस बात के जुगाड़ में हैं कि किसी भी तरह से पेस को ओलंपिक में दूसरी कामयाबी से रोका जाए लेकिन भला हो भारतीय टेनिस संघ का कि उसने भूपति की मांग को सिरे से ठुकरा दिया है और उन्हें यह निर्देश दिया है उनकी जोड़ी सिर्फ और सिर्फ पेस के साथ ही बनेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-7973461050522135437?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/7973461050522135437/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=7973461050522135437' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7973461050522135437'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7973461050522135437'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_21.html' title='शायद पेस से जलते हैं भूपति'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-412043494987585496</id><published>2008-05-19T17:37:00.004+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:21.698+05:30</updated><title type='text'>क्रिकेट में रबर, आपने आखिरी बार कब सुना?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDFuo0dHGyI/AAAAAAAAABk/j3cTgOx3AHM/s1600-h/ashes1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDFuo0dHGyI/AAAAAAAAABk/j3cTgOx3AHM/s200/ashes1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5202060692144200482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनों पहले की बात है, मैं अपने एक बेहद नजदीकी मित्र से क्रिकेट के ऊपर परिचर्चा कर रहा था। इसी दौरान मैंने कहा कि भारत ने तमाम देशों में टेस्ट रबर तो जीत लिए हैं लेकिन आस्ट्रेलिया में उसे यह कामयाबी नहीं मिली है। मेरा मित्र क्रिकेट में रबर शब्द सुनकर चौंक गया। हालांकि मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरे उस मित्र के पास क्रिकेट से जुड़ी जानकारियों का कतई अभाव नहीं है लेकिन उसने इससे पहले क्रिकेट में रबर शब्द नहीं सुना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कुछ और क्रिकेट प्रेमी मित्रों से इस बारे में ताकीद की लेकिन ज्यादातर इस शब्द से अनभिज्ञ थे। इससे पहले कि इस शब्द के बारे में लोगों की अनभिज्ञता की बात करूं पहले यह बताता चलूं कि क्रिकेट में रबर क्या है (हो सकता है आपको इसका अर्थ पता हो लेकिन मैं यहां इसका अर्थ उनलोगों के लिए लिख रहा हूं जो अभी भी इससे नावाकिफ हैं)। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रबर का आशय किसी द्विपक्षीय टेस्ट सीरीज के नतीजे से है। अगर भारत-इंग्लैंड के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज हुई और इसे भारत ने जीता तो कहा जाएगा कि यह टेस्ट रबर भारत का हुआ। अगली बार जब भारत और इंग्लैंड किसी टेस्ट सीरीज में खेलने उतरेगी तो इंग्लैंड को रबर अपने कब्जे में लेने के लिए सीरीज को जीतना ही होगा। यह इसे भारत ने जीता या यह सीरीज ड्रा रही तो रबर भारत के पास ही रहेगा। यही बात आस्ट्रेलिया-इंग्लैंड के बीच होने वाली एशेज सीरीज, आस्ट्रेलिया-वेस्टइंडीज के बीच होने वाले फ्रैंक वारेल सीरीज और भारत-आस्ट्रेलिया के बीच होने वाले बार्डर-गावस्कर सीरीज में भी लागू होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिशाल के तौर पर अपने पिछले आस्ट्रेलिया दौरे पर भारत ने 1-2 से टेस्ट सीरीज गंवाई थी। अगर यह सीरीज 2-2 से बराबर रहती तो भी बार्डर-गावस्कर ट्रॉफी आस्ट्रेलिया के पास ही रहती क्योंकि उसने 2004-05 में भारत में हुई सीरीज में 2-1 से जीत दर्ज की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रबर से ही जुड़ा एक और शब्द है जो टेस्ट सीरीज से ताल्लुक रखता है। वह शब्द है डेड रबर। डेड रबर का आशय उस मैच से होता है जिसके नतीजे का टेस्ट सीरीज के नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मसलन आस्ट्रेलिया के खिलाफ किसी तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में भारत पहले दो टेस्ट जीत लेता है तो तीसरा टेस्ट डेड रबर कहलाएगा। मतलब यह कि इस मैच के नतीजे का टेस्ट सीरीज के नतीजे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इस बात की ओर लौटें कि क्यों रबर जैसे शब्द आज के आधुनिक दौर की क्रिकेट में अपना महत्व खोते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा दोष आजकल होने वाली क्रिकेट पत्रकारिता खासकर हिंदी पत्रकारिता को जाता है। अंग्रेजी अखबारों में तो आप यदा-कदा इन शब्दों को पढ़ भी लें लेकिन हिंदी में ये खोजने से भी नहीं मिलेंगे (मुमकिन है कि प्रभास जोशी जी के कॉलम में मिल जाए)। इन शब्दों के विलुप्त होने का दूसरा बड़ा कारण वनडे व ट्वंटी 20 क्रिकेट की बहुतायत है जिस कारण टेस्ट क्रिकेट की खूबियों और उससे जुड़े शब्द लोगों के कानों से नहीं गुजरते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-412043494987585496?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/412043494987585496/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=412043494987585496' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/412043494987585496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/412043494987585496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_19.html' title='क्रिकेट में रबर, आपने आखिरी बार कब सुना?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDFuo0dHGyI/AAAAAAAAABk/j3cTgOx3AHM/s72-c/ashes1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-7243474975245691615</id><published>2008-05-18T16:28:00.005+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:21.847+05:30</updated><title type='text'>एक कुत्ते की बदौलत बचा मैनचेस्टर यूनाईटेड</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDANFkdHGxI/AAAAAAAAABc/LhZ3etLZLO4/s1600-h/united1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDANFkdHGxI/AAAAAAAAABc/LhZ3etLZLO4/s200/united1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5201671958949206802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यह शीर्षक अपने आप में कुछ अजीब जरूर लग रहा होगा लेकिन यह सौ फीसदी सच है। आज की तारीख में मैनचेस्टर यूनाईटेड दुनिया का सबसे धनी खेल क्लब (करीब 80 अरब रुपये की कंपनी) है और इसके प्रशंसकों की तादाद करीब 33 करोड़ है जो ब्रिटेन की कुल आबादी का करीब सात गुना है। ऐसे में यह तथ्य तो चौंकाने वाला होगा ही कि इस क्लब को खड़ा करने में एक कुत्ते ने अहम भूमिका निभाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो इस क्लब की स्थापना 1878 में न्यूटन हीथ एल एंड वाईआर फुलबाल क्लब के नाम पर हुई। 1883 में इसका नाम सिर्फ न्यूटन हीथ फुटबाल क्लब कर दिया गया। लेकिन वर्ष 1902 के आसपास यह क्लब दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया। उस समय इसके ऊपर 2500 पाउंड का कर्ज था। इससे उबरने के लिए क्लब को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था और सभी मान रहे थे कि इस क्लब के अब गिने चुने दिन ही बचे हैं। क्लब के तत्कालीन कप्तान हैरी स्टेफोर्ड ने सेंट बर्नाड नस्ल के अपने प्यारे कुत्ते को नीलाम करने की कोशिश की ताकि क्लब के लिए कुछ पैसे जुटाए जाए। वहां के एक शराब व्यवसायी जॉन हेनरी डेविस ने कुत्ते को खरीदने की इच्छा जताई लेकिन स्टेफोर्ड ने इसके बदले उनसे क्लब में पैसे निवेश करने की शर्त रखी जिसे डेविस ने मान ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डेविस को क्लब का चेयरमैन बनाया गया। उन्होंने अपनी पहली बोर्ड मीटिंग में यह प्रस्ताव रखा कि क्लब को नया रूप देने के लिए इसका नाम बदला जाए। पहले मैनचेस्टर सेंट्रल और मैनचेस्टर सेल्टिक जैसे नामों पर विचार किया गया। तभी इतालवी मूल के एक युवा लूईस रोक्का ने प्रस्ताव रखा कि क्यों न इसका नाम मैनचेस्टर यूनाईटेड रखा जाए। यह प्रस्ताव सभी को भाया और तब से यह क्लब मैनचेस्टर यूनाईटेड हो गया। डेविस ने फिर क्लब की जर्सी का रंग बदला। पहले इसकी जर्स का रंग हरा और सुनहरा था जिसे बदलकर लाल और सफेद कर दिया गया जो आज भी कायम है।&lt;br /&gt;उसके बाद मैनचेस्टर यूनाईटेड ने सफलता की जो इबारत लिखी वह आज सबके सामने है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने इस बार भी इंग्लिश प्रीमियर लीग का खिताब जीता है। अपने इतिहास में यूनाईटेड यह कारनामा 17 बार कर चुका है (लीवरपूल ने 18 बार यह खिताब अपने नाम किया है)। 1968 में मैनचेस्टर यूनाईटेड यूरोपियन कप जीतने वाला इंग्लैंड का पहला क्लब बना। क्लब स्तर की दुनिया की सबसे पुरानी फुटबाल प्रतियोगिता एफ ए कप के विजेता के तौर पर यूनाईटेड ने रिकार्ड 11 बार अपना नाम दर्ज कराया है। 1990 के दशक में यह दुनिया का सबसे धनी फुटबाल क्लब बना और आज की तारीख में वह किसी भी खेल में दुनिया का सबसे धनी क्लब है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1992 में इंग्लिश प्रीमियर लीग शुरू होने के बाद से यूनाईटेड का प्रदर्शन और भी प्रभावशाली रहा। इसके मैनेजर सर एलेक्स फगुर्सन दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और कामयाब मैनेजर में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में इस क्लब को 10 बार इंग्लिश प्रीमियर लीग का चैंपियन बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि इस क्लब को कामयाबी के साथ-साथ एक बेहद दुखद हादसे से भी रूबरू होना पड़ा। 6 फरवरी 1958 को यूरोपियन कप के एक मैच में भाग लेने के लिए खिलाडि़यों को ले जा रहा हवाई जहाज म्यूनिख में दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें यूनाईटेड के आठ खिलाडि़यों ज्योफ बेंट, रोजर बायर्ने, एडी कोलमैन, डंकन एडव‌र्ड्स, मार्क जोंस, डेविड पेग, टॉमी टेलर और लियाम बिली व्हेलान को अपनी जान गंवानी पड़ी। इंधन लेने के बाद विमान के टेक ऑफ में परेशानी आने लगी थी। पायलटों ने दो बार टेक ऑफ का असफल प्रयास किया और जब उन्होंने तीसरा प्रयास किया तब यह दर्दनाक दुर्घटना घटी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दुर्घटना ने यूनाईटेड को झकझोरा जरूर लेकिन उसके जज्बे को तोड़ नहीं सका। उसी सत्र में यूनाईटेड की टीम एफ ए कप के फाइनल में पहुंची। बुरे दौर में हौसला न हारने का यही जज्बा शायद वह सबसे बड़ा कारण है जिसने यूनाईटेड को अब तक इतनी अपार कामयाबियां दिलाई है और यही वजह है कि इसके पूरे विश्व में मौजूद 33 करोड़ प्रशंसकों में एक मैं भी हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट: आलेख में दिए गए तथ्य विकीपीडिया डॉट ओआरजी और मैनचेस्टर यूनाईटेड की आधिकारिक वेबसाइट से लिए गए हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-7243474975245691615?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/7243474975245691615/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=7243474975245691615' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7243474975245691615'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7243474975245691615'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_18.html' title='एक कुत्ते की बदौलत बचा मैनचेस्टर यूनाईटेड'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDANFkdHGxI/AAAAAAAAABc/LhZ3etLZLO4/s72-c/united1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2691725342989678948</id><published>2008-05-08T13:36:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:21.865+05:30</updated><title type='text'>आईपीएल प्रीमियर तो है लेकिन लीग नहीं</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SCK02HgyAsI/AAAAAAAAABM/Qz6MY3YPpGY/s1600-h/ipl.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SCK02HgyAsI/AAAAAAAAABM/Qz6MY3YPpGY/s320/ipl.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5197915761761452738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई शक नहीं है कि इंडियन प्रीमियर लीग क्रिकेट जगत में एक अभूतपूर्व क्रांति की तरह है। इसने दुनिया भर के उम्दा क्रिकेटरों को ज्यादा कमाई का मौका उपलब्ध कराया। इसने इस खेल के प्रशंसकों को भी किसी टीम को अपना समर्थन देने के लिए ऐसा आधार मुहैया कराया जिसमें देश की प्रतिष्ठा दांव पर न लगी हो। इससे जीत पर मजा तो आता है लेकिन हार का वैसा गम नहीं होता जैसा कि किसी अंतरराष्ट्रीय मैच में अपने देश की हार पर होता है। इस टूर्नामेंट ने अभी अपना आधा सफर ही पूरा किया है लेकिन इतने कम समय में ही इसने भारतीय चयनकर्ताओं को भविष्य के लिए आधा दर्जन से ज्यादा उम्दा विकल्प उपलब्ध करवा दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऊपर लिखी तमाम खूबियों के अलावा आईपीएल की कुछ खामियां भी हैं जिसे दूर कर पाना बेहद मुश्किल हो सकता है। ये खामियां ऐसी हैं जो इसके स्पो‌र्ट्स लीग होने पर ही सवाल उठाती है। इन्हीं में से एक खामी है रेलीगेशन सिस्टम का का न होना। रेलीगेशन सिस्टम किसी भी स्पो‌र्ट्स लीग की जान होती है। इसके तहत मुख्य लीग में फिसड्डी साबित हुई टीमों को अगले सत्र में दूसरे डिविजन में रेलीगेट कर दिया जाता है और दूसरे डिविजन में शीर्ष पर रही टीम मुख्य टूर्नामेंट में उसका स्थान ले लेती है। यह सिस्टम यूरोप की तमाम फुटबाल लीग, अमेरिकन फुटबाल, बास्केटबाल लीग [एनबीए] यहां तक हमारे देश में खेली जाने वाली रणजी ट्राफी क्रिकेट में भी लागू है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका फायदा यह होता है कि कोई टीम अच्छा प्रदर्शन सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहती है कि वह टूर्नामेंट जीते बल्कि उसे इस बात का भी डर होता है कि कहीं वह दूसरे डिविजन में न खिसक जाए। लेकिन आईपीएल में ऐसा नहीं होगा। मान लीजिए कि अब तक अच्छा प्रदर्शन न कर पाने वाली बेंगलूर रॉयल चैलेंजर्स या हैदराबाद डक्कन चार्जर्स अगले दो-तीन मैच और हारकर सेमीफाइनल में पहुंचने की होड़ से बाहर हो जाती है तो अंतिम के चार-पांच मैचों में कौन सी बात उन्हें अच्छा प्रदर्शन करने पर मजबूर करेगी। अगर रेलीगेशन सिस्टम होता तो इसकी नौबत आने की कोई आशंका नहीं होती और कोई भी टीम सेमीफाइनल की होड़ से बाहर होने के बावजूद अगले साल मुख्य टूर्नामेंट में बचे रहने के लिए अच्छा खेल दिखाती या दिखाने की कोशिश करती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आईपीएल में सकेंड डिविजन है ही नहीं तो रेलीगेशन सिस्टम का सवाल ही नहीं उठता है। अगर कुछ नई टीमों को जोड़कर सकेंड डिविजन बनाने की कोशिश भी की जाए तो मौजूदा फ्रेंचाइजी इसे सफल नहीं होने देंगे क्योंकि उन्होंने भारी कीमत चुकाकर 10-10 सालों के लिए टीम खरीदी है। वह किसी भी सूरत में ऐसी स्थिति नहीं चाहेंगे जिससे उनकी टीम पर मुख्य टूर्नामेंट से बाहर होने का खतरा मंडराए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेलीगेशन की तरह ही आईपीएल में एक और बड़ी खामी है। वह है इसके प्रारूप में सेमीफाइनल और फाइनल मैच का प्रावधान। यह ऐसा प्रावधान है जो टीमों को शीर्ष स्थान के लिए नहीं बल्कि किसी तरह अंतिम चार में जगह बनाने के लिए प्रेरित करेगी। दुनियां की किसी भी नामी स्पो‌र्ट्स लीग का अवलोकन करें तो आप पाएंगे कि वहां सेमीफाइनल और फाइनल का प्रावधान नहीं है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि टीमें लीग मैचों को ही पूरी गंभीरता से ले और हर लीग मैच इस भाव के साथ खेला जाए मानो यही सेमीफाइनल और फाइनल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां टीमों को यह पता होता है कि अगर टूर्नामेंट जीतना है तो हर हाल में शीर्ष पर आना होगा अंतिम चार में आने से कोई फायदा नहीं। हर तीन या चार साल पर होने वाले मैचों में सेमीफाइनल और फाइनल होना तर्कसंगत है लेकिन हर साल होने वाले आयोजन में इसका प्रावधान लीग मैचों की अहमियत को कम कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह आईपीएल में एक ही शहर की दो टीमों के बीच होने वाली भिड़ंत का मजा भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर व्यस्त होने की वजह से आईपीएल में टीमों की संख्या सिर्फ आठ रखी गई है ताकि कम समय में टूर्नामेंट निबटाया जाए। इससे भारत के ही कई अहम शहरों को इसमें भाग लेने का मौका नहीं मिल पाया तो एक ही शहर की दो टीमों की बात करना ही बेमानी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर शुरुआत में तो हर आयोजन अधूरा सा दिखता है और समय के साथ इसमें सुधार होता है। हम यही उम्मीद कर हैं कि आईपीएल भी धीरे-धीरे खुद को सुधारेगा और स्पो‌र्ट्स लीग की जो अंतरराष्ट्रीय मान्यता है उस पर खरा उतरेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2691725342989678948?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2691725342989678948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2691725342989678948' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2691725342989678948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2691725342989678948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_08.html' title='आईपीएल प्रीमियर तो है लेकिन लीग नहीं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SCK02HgyAsI/AAAAAAAAABM/Qz6MY3YPpGY/s72-c/ipl.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-8881298806638731279</id><published>2008-05-02T13:11:00.001+05:30</published><updated>2008-05-02T13:16:34.953+05:30</updated><title type='text'>आईपीएल की देन</title><content type='html'>इंडियन प्रीमियर लीग शुरू होने के साथ ही सुर्खियाँ बटोरने लगा है. कभी चीयर गर्ल्स तो कभी हरभजन-श्रीसंथ विवाद चर्चा का विषय बना. इस बीच इस टूर्नामेंट ने कुछ सकारात्मक संकेत भी दिए जिनमे कई नए युवा खिलाड़ियों का गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकल कर छा जाना भी शामिल है. आइये जानते हैं कौन हैं ये युवा और क्या है इनकी खासियत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिषेक नायर: मुम्बई इंडियंस के इस हरफनमौला खिलाड़ी ने आखिरी के ओवरों में जिस तरह की बल्लेबाजी की है उससे दक्षिण अफ्रीका के लांस क्लूजनर की याद ताजा हो गई. बैक फ़ुट हो या फ्रंट फ़ुट नायर दोनों ही जगहों से गेंद को सीमा रेखा के पार पहुचाने की कुव्वत रखते हैं. अगली बार जब चयनकर्ता भारत की वन डे या ट्वेन्टी २० टीम चुनने बैठेंगे तो उनके लिए नायर को नजरंदाज कर पाना मुश्किल हो जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनप्रीत गोनी: यह पंजाबी पुत्तर अपनी धारदार गेंदबाजी से चेन्नई सुपर किंग्स के आक्रमण का मुख्य हथियार बन गया है. लाइन लेंथ अच्छी होने के साथ साथ गोनी की रफ्तार भी बल्लेबाजों को चौकाने की क्षमता रखती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अशोक दिंदा: जिस गेंदबाज की तारीफ रिक्की पोंटिंग करे तो उसमें कुछ को खास बात होगी. शोएब अख्तर की गैरमौजूदगी दिंदा ने कोलकाता की टीम को आक्रमण में तेजी की कमी नही होने दी. अपनी गेंदों में गजब की उछाल पैदा करने वाले दिंदा अच्छे अच्छे बल्लेबाजों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रविंदर जडेजा: यूं तो इनकी उम्र अभी सिर्फ़ १९ साल है लेकिन अपनी दमदार बल्लेबाजी की बदौलत जडेजा मज़बूत दावेदारी पेश करते नजर आ रहे हैं. मलेशिया में हुए अंडर १९ विश्व कप में भी जडेजा ने अपने खेल से सबका मन मोहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनके अलावा और भी कुछ ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने आईपीएल में अच्छा प्रदर्शन किया है और युवाओ को तरजीह देने वाली राष्ट्रीय चयन समिति के सामने कई और विकल्प उपलब्ध कराये हैं. इनमे यूसुफ पठान, सोलुन्खे, शिखर धवन, पी अमरनाथ जैसे नाम शामिल हैं. अभी तो आईपीएल शुरू ही हुआ है. उम्मीद है कि आने वाले मैचों में कई नए सितारे उभरेंगे और टीम इंडिया के अंदर आने के लिए जोरदार दस्तक देंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-8881298806638731279?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/8881298806638731279/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=8881298806638731279' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8881298806638731279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/8881298806638731279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post_02.html' title='आईपीएल की देन'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-7656650439258230540</id><published>2008-05-01T15:19:00.003+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:21.994+05:30</updated><title type='text'>खेल किसी एक व्यक्ति का मोहताज नही होता</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SBmSnXDusjI/AAAAAAAAABE/k6FuUyf4Lr8/s1600-h/1spo1may08.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SBmSnXDusjI/AAAAAAAAABE/k6FuUyf4Lr8/s320/1spo1may08.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5195344850050789938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;करीब आठ महीने पहले जब रूसी अरबपति रोमन अब्रामोविच ने अपने फुटबाल क्लब चेल्सी के मैनेजर जोस मौरिन्हो को बर्खास्त करने का फैसला लिया था तब पूरी दुनिया के फुटबाल प्रेमियों और विशेषज्ञों ने यही अनुमान लगाया था कि इंग्लैंड के इस क्लब के अच्छे दिन गुजर गए. किसी को नए मैनेजर अव्रम ग्रांट पर भरोसा नही था.  मौरिन्हो के जाने के बाद जिस तरह चेल्सी के खेल में गिरावट आई उससे इस बात को और भी बल मिला.&lt;br /&gt;इंग्लिश प्रीमियर लीग के इस सत्र में पहले आर्सेनल और बाद में मेनचेस्टर यूनाईटेड ने अपनी पकड़ मजबूत की. लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में चेल्सी ने चुपके-चुपके अपनी साख हासिल कर ली. इंग्लिश प्रीमियर लीग में अब सिर्फ़ दो दौड़ के मैच बचे हैं और चेल्सी ने मेनचेस्टर यूनाईटेड के बराबर ८१ अंक हासिल कर लिए हैं. हालांकि गोल औसत पर वह अभी भी मेनचेस्टर यूनाईटेड से पीछे है लेकिन इसके बावजूद उसके पास इस प्रतियोगिता के जीतने के काफ़ी अच्छे अवसर हैं.&lt;br /&gt;खैर इंग्लिश प्रीमियर लीग जीत लेने मात्र से अव्रम ग्रांट कोई तीर नही मार लेंगे क्योंकि मौरिन्हो ने अपने कार्यकाल में इस क्लब को लगातार दो बार यह खिताब जितवाया था वह भी करीब ५० साल का सूखा समाप्त करते हुए. लेकिन अव्रम ग्रांट अपनी टीम को यूएफा चैंपियंस लीग के फाइनल में पंहुचा कर जो कारनामा किया वह मौरिन्हो भी नही कर पाए थे. २१ मई को मास्को में चैंपियंस लीग के फाइनल में चेल्सी का मुकाबला मेनचेस्टर से ही होगा और उसकी पूरी कोशिश होगी कि वह इंग्लिश प्रीमियर लीग के साथ-साथ चैंपियंस लीग भी जीत कर दुनिया को यह बता दे कोई संस्था किसी एक व्यक्ति (मौरिन्हो) कि मोहताज नही होती खास कर खेल में तो बिल्कुल नही.&lt;br /&gt;मेरी ओर से अव्रम ग्रांट और चेल्सी को ढेर बधाईयाँ, हालांकि कि मैं मेनचेस्टर यूनाईटेड का प्रशंसक हूँ और इन्ही लाल दानवों को जीतते हुए देखना चाहता हूँ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-7656650439258230540?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/7656650439258230540/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=7656650439258230540' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7656650439258230540'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/7656650439258230540'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='खेल किसी एक व्यक्ति का मोहताज नही होता'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SBmSnXDusjI/AAAAAAAAABE/k6FuUyf4Lr8/s72-c/1spo1may08.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2284799996892578169</id><published>2008-04-24T16:24:00.001+05:30</published><updated>2008-04-24T16:27:39.813+05:30</updated><title type='text'>कप्तानी सबके बस की बात नहीं</title><content type='html'>इंडियन प्रीमियर लीग ने अपनी शुरुआत के बाद महज छह दिनों में ही कई महत्वपूर्ण संकेत दे दिए। पहला तो यह कि क्रिकेट का यह सबसे छोटा और मनोरंजक संस्करण टेस्ट व वनडे की ही तरह अपने लिए लंबी उम्र लेकर आया है। दूसरा और महत्वपूर्ण संकेत यह है अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट न होने के बावजूद यहां दो टीमों के खिलाड़ियों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा और दर्शकों के रोमांच में कोई कमी नहीं आई है। इस प्रतियोगिता में खेलने वाला हर खिलाड़ी अपनी टीम की जीत के लिए पूरा प्रयास करता हुआ नजर आ रहा है। माइक हसी और मैथ्यू हेडन जैसे बल्लेबाज ब्रेट ली और जेम्स होप्स ( जो राष्ट्रीय टीम में उनके साथी हैं) की गेंदों को सीमारेखा के पार पहुंचाने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं तो हरभजन सिंह राहुल द्रविड़ को आउट कर कुछ उतने ही खुश दिख रहे हैं जितना कि वह एंड्रयू सायमंड्स और रिकी पोंटिंग को आउट कर खुश होते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस टूर्नामेंट ने जो तीसरा संकेत दिया उस और ध्यान देना सबसे जरूरी और रोचक है। इसने इतना तो साबित कर ही दिया कि क्रके्ट किसी भी रूप में क्यों न खेला जाए कुछ बातें कभी नहीं बदलती। सहवाग टेस्ट खेलें, वनडे खेलें या ट्वंटी २० उनका आक्रामक रवैया हमेशा बरकरार रहता है। श्रीसंथ को आप दुनिया के किसी भी मैदान में पटक दें उनकी हरकतें कैमरे को अपनी ओर खींचनें में कामयाब हो ही जाती है। यही बात आईपीएल की आठ टीमों के कप्तानों पर भी लागू होती हैं। यूं तो आईपीएल के इस सत्र में कई मैच खेले जाने बाकी हैं लेकिन अब तक हुए आठ मैचों के आधार पर ही आप यह सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन अच्छा कप्तान है, कौन औसत और कौन फिसड्डी। कहने के लिए तो डेक्कन चार्जर्स की टीम में सबसे ज्यादा विध्वंसक खिलाड़ी शामिल हैं लेकिन घटिया रणनीति ने दोनों मैचों में उनकी लुटिया डुबो दी। वेणुगोपाल राव जो ऊंचे शॉट लगाने की बजाय अपनी पारी को धीरे-धीरे मजबूती प्रदान करते हैं उन्हें वीवीएस लक्ष्मण ने सलामी बल्लेबाज के तौर पर भेजा और जब गिलक्रस्ट आउट हो गए तो खुद वेणुगोपाल के साथ मिलकर टुक-टुक करने क्रीज पर आ गए। कुल जमा १२० गेंदों की पारी में दो बल्लेबाज मिलकर २०-२५ गेंद जाया कर दें तो आप वैसे ही मुकाबले से बाहर हो जाते हैं। लक्ष्मण ने यह गलती तब की जब उनके पास शाहिद अफरीदी जैसा आक्रामक बल्लेबाज मौजूद था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्ष्मण की तरह ही किंग्स इलेवन पंजाब के कप्तान युवराज सिंह भी रणनीति बनाने में जूझते नजर आ रहे हैं। जब विपक्षी बल्लेबाज उनके गेंदबाजों की धज्जियां उड़ाने लगता है तो पंजाब के इस पुत्तर के होश फाख्ता हो जाते हैं। उन्हें यह नहीं सूझता कि किस फील्डर को कहां रखें और किस गेंदबाज को आक्रमण पर लाएं। मुंबई इंडियंस के कार्यवाहक कप्तान हरभजन सिंह भी इस जिम्मेदारी के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं शुरुआती मैचों में सफल कप्तानों की ओर नजर डालें तो सौरव गांगुली और महेंद्र सिंह धोनी ने दिखा दिया क्यों उनकी गिनती भारत के सबसे बेहतरीन कप्तानों में होती है। इन दोनों के अलावा वीरेंद्र सहवाग ने भी अपनी नेतृत्व क्षमता से सबको कायल किया है। इसकी झलक उन्होंने खिलाड़ियों की नीलामी में ही दिखा दी थी। हालांकि उस वक्त वे आस्ट्रेलिया में थे लेकिन उन्होंने वहां से ही अपने फ्रेंचाइजी जीएमआर को अपनी पसंद बता दी थी। नीलामी में जहां सभी टीमों ने एक से एक धाकड़ बल्लेबाजों को अपना हिस्सा बनाने के लिए पैसे खर्चे तो दिल्ली डेयरडेविल्स ने कसी हुई लाइन लेंथ से गेंदबाजी करने वाले दिग्गजों को अपनी टीम में शामिल किया। सहवाग की सफलता इस बात की ओर भी इशारा करती है कि धोनी को भारतीय टीम की कप्तानी के मामले में जिस व्यक्ति से सबसे बड़ा खतरा है वह युवराज नहीं बल्कि नजफगढ़ का सुल्तान सहवाग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आलेख में दो अन्य कप्तानों का जिक्र करना भी बेहद जरूरी है। ये नाम हैं राहुल द्रविड़ औऱ शेन वार्न। बेंगलोर रॉयल चैलेंजर्स के कप्तान के तौर पर भी द्रविड़ वैसे ही नजर आ रहे हैं जैसा वे भारतीय टीम की कमान संभालते वक्त नजर आते थे, यानी एक औसत कप्तान। जहां तक शेन वार्न का सवाल है तो दो मैचों में एक में जीत और एक में हार के स्कोर लाइन के साथ उन्होंने यह जरूर साबित किया कि भले ही वह बतौर कप्तान सहवाग से कमतर हों लेकिन युवराज से कहीं अच्छे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2284799996892578169?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2284799996892578169/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2284799996892578169' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2284799996892578169'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2284799996892578169'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/04/blog-post_24.html' title='कप्तानी सबके बस की बात नहीं'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2265922838999519597</id><published>2008-04-22T14:17:00.006+05:30</published><updated>2008-04-30T16:06:32.946+05:30</updated><title type='text'>क्या प्रियंका के गांधीवाद से पिघलेगा लिट्टे?</title><content type='html'>&lt;b&gt;गिरीश निकम की कलम से&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ सप्ताह पहले राहुल गांधी कर्नाटक में थे जहां कुछ पत्रकारों के साथ उनकी एक अनौपचारिक बैठक हुई। इनमें से एक पत्रकार ने प्रियंका गांधी के राजनीति में प्रवेश पर उनकी राय जाननी चाही। उनका यह सवाल निश्चत रूप में गांधी परिवार के बारे में हो रही मीडिया रिर्पोटिंग से प्रभावित था साथ ही यह सवाल परोक्ष रूप से राहुल और प्रियंका के बीच मौजूद कथित प्रतिद्वंदिता के बारे में भी था। राहुल (जिन्होंने ऑफ द रिकार्ड हुए इस बैठक में खुल कर बात की और कई दिल भी जीते)  ने उन्हें बताया कि कैसे ज्यादातर लोगों ने इस मामले में बिल्कुल गलत समझ विकसित कर ली है। उन्होंने कहा, 'आपलोगों को इस बात का बिल्कुल आभास नहीं है कि हमलोग (प्रियंका, वो और उनकी मां) अपनी जिंदगी में किन हालातों से गुजरे हैं।' वह निश्चत तौर पर अपनी दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी की नृशंस हत्या की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा, 'हमलोग एक दूसरे के बहुत करीब रहे हैं औऱ ऐसे में प्रतिद्वंदिता का तो सवाल ही नहीं उठता।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने पिता की हत्या के बाद वे किस सदमें से गुजरे, किस तरह उनकी मां ने स्थिति को संभाला औऱ कैसे इसके बाद वह, उनकी बहन और उनकी मां एक-दूसरे के काफी करीब आ गए, राहुल इसी बारे में कहना चाह रहे थे। मीडिया ने गांधी परिवार के इस पहलू को कमोबेश किनारे रखते हुए उनकी राजनीति औऱ सत्ता की खोज पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया है। इसलिए अगर राहुल द्वारा अपने परिवार की मनःस्थित के बारे में कही गई बातों को ध्यान में रखते हुए कोई प्रियंका गांधी की पिछले महीने की गई वेल्लोर जेल यात्रा को देखेगा तो वह आसानी से अंदाजा लगा पाएगा कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। वास्तव में जब राहुल पत्रकारों से बात कर रहे थे तब प्रियंका अपने पिता के हत्यारों के समूह की सदस्य नलिनी से मिलकर आ चुकी थीं। इसलिए जब वह पत्रकारों के सामने बोल रहे थे तब यह बात उनके दिमाग में कहीं न कहीं जरूर रही होगी क्योंकि तब तक प्रियंका नलिनी से मुलाकात के अपने अमुभव उनके साथ बांट चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात का श्रेय गांधी परिवार को जाता है कि उसने इस मुलाकात के जरिए कोई प्रचार हासिल करने की कोशिश नहीं की। यह बात लोगों के सामने तब आई जब नलिनी के वकील ने अदालत से दया की उम्मीद में इसका खुलासा किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यह गौर करने की बात है कि वह क्या वजह थी जिसने प्रियंका को 38 साल की नलिनी से मुलाकात के लिए प्रेरित किया। इस मुलाकात के बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। खुद प्रियंका ने भी बयान जारी कर कहा कि वह पिता की हत्या के बाद मानिसक शांति पाने के प्रयास में निलिनी से मिली। राहुल ने अपनी बहन के इस अभूतपूर्व कदम का विरोध नहीं किया लेकिन यह साफ किया कि इस मामले में उनकी सोच अलग है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह इस तरह की मुलाकात की कोई योजना नहीं बना रहे हैं। हालांकि राहुल और प्रियंका दोनों ने कहा कि वे घृणा, क्रोध और हिंसा को अपनी जिंदगी पर हावी नहीं होने देना चाहते हैं। प्रियंका ने इसमें यह भी जोड़ा कि यह पूरी तरह व्यक्तिगत मुलाकात थी जिसकी पहल उन्होंने खुद की थी। उन्होंने कहा कि पिता की हत्या के बाद शांति प्राप्त करने का उनका तरीका है और इसे सही अर्थों में समझा जाए। सोनिया ने इस मसले पर अब तक चुप्पी साध रखी है हालांकि उन्होंने अपने दुःस्वप्न को अपनी बेटी प्रियंका की तुलना में बहुत पहले ही तब दफना दिया था जब उन्होंने नलिनी की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करवाया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में जबकि इस विपदाग्रस्त परिवार के तीनों सदस्यों ने इस मसले पर असाधारण मानवता का परिचय दिया है यह दुखद है कि मीडिया का एक तबका इसकी सराहना करने के बजाय इस खबर के मामले में टाइम्स ऑफ इंडिया से पिछड़ने के कारण खार खा कर इस मुलाकात की वैधता में कोर-कसर निकालने की कोशिश कर रहा है। दुर्भाग्य से गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी की इस धरती पर घृणा और हिंसा ने गहरी पैठ जमा ली है। ऐसे समय में जब कोई व्यक्तिगत विपदा से उबरने के लिए और अपनी नफरत की भावनाओं को खत्म करने के लिए हत्यारे से मिलकर पूरा जतन करने की कोशिश करता है तो उसके इस प्रयास को नकारात्मक और संशय की दृष्टि से देखा जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मुलाकात पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं तो काफी निराशाजनक थी जिसमें भारतीय जनता पार्टी की ओर से आई प्रतिक्रिया सबसे चौंकानेवाली थी। भाजपा के पार्टी प्रवक्ता ने बयान दिया कि 'प्रियंका नलिनी से क्यों मिली यह समझ से बाहर है' । निश्चित रूप से ऐसी पार्टी जो अपनी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ द्वारा प्रचारित नफरत के खाद-बीज पर पली-बढ़ी हो वह ऐसे किसी प्रयास को नहीं समझ सकती जो नफरत, घृणा और हिंसा को समाप्त करने के लिए किए जाते हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझना जरूरी है कि नलिनी से मिलने का फैसला कर प्रियंका कोई राजनीतिक लाभ कमाने की कोशिश नहीं कर रही थी। यह एक बेटी द्वारा पिता की हत्या के बाद शांति प्राप्त करने का तरीका था। हालांकि उन्होंने अनजाने में ही सही एक शसक्त राजनीतिक बयान दे दिया कि उनका परिवार और वह खुद किसी को अपने पिता की हत्या पर राजनीतिक रोटिंया नहीं सेंकने देंगी। हालांकि यह अजीब बात है कि कभी निष्कपट रहीं सोनिया गांधी ने अर्जुन सिंह और उनके सहयोगियों को इंद्र कुमार गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकार को केवल इस तर्क के आधार पर गिराने दिया कि डीएमके के नेता राजीव गांधी हत्याकांड में संदिग्ध थे। बहरहाल बाद में विवेकपूर्ण सोनिया ने अपनी भूल सुधारी और डीएमके के साथ गठबंधन किया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि सोनिया ने डीएमके प्रमुख और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के साथ अच्छा तालमेल स्थापित कर लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नलिनी मामले में तो सोनिया और उनकी दोनों संतानों ने विशाल हृदय का परिचय जरूर दिया लेकिन राजीव हत्याकांड के बाद उनसे एक बड़ी भूल भी हुई। राजीव के साथ 1991 के मई की रात जान गंवाने वाले 15 लोगों के परिवार वालों की मदद के लिए गांधी परिवार हाथ बढ़ाने में विफल रहा। हालिया प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार गांधी परिवार के किसी भी सदस्य ने न तो उनकी मदद करने की और न ही उन तक पहुंचने की कोशिश की। उनमें से कुछ तो कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ता थे जिनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार की हालत बेहद खराब हो गई लेकिन इसके बावजूद किसी ने उनकी सुध नहीं ली। यह आश्चर्य की बात है सोनिया और उनकी दोनों संतानों ने इस पहलु को अनदेखा कर दिया। उम्मीद है कि अब वे अपनी गलती को सुधारने की कोशिश करेंगे। हालांकि राजीव की हत्या के बाद गांधी परिवार का खुद शोकाकुल होना इस अनदेखी के पीछे बड़ा कारण हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भूल के बावजूद अब प्रियंका ने और पहले सोनिया ने दुनिया को दिखा दिया कि नफरत और अस्वस्थ मानसिकता को खुद के अंदर पनपाना घृणित कार्यों को रोकने के लिए उचित समाधान नहीं हो सकता, चाहे मसला व्यकितगत हो या राजनैतिक। उम्मीद है कि राजीव हत्याकांड की साजिश रचने और इसे कार्यान्वित करने वाला लिट्टे प्रियंका के कदम से पिघलेगा और इसमें अपनी भूमिका को स्वीकारते हुए माफी मांगेगा। यह इस दुखदाई मुद्दे का उचित समापन होगा और हम एक राष्ट्र के तौर पर गांधीगण एक परिवार के तौर पर अपने जख्मों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ पाएंगे। &lt;a href="http://indiasreport.com/node/21" target="_blank"&gt;इस आलेख की मूल अंग्रेजी प्रति पढने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2265922838999519597?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2265922838999519597/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2265922838999519597' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2265922838999519597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2265922838999519597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/04/blog-post_22.html' title='क्या प्रियंका के गांधीवाद से पिघलेगा लिट्टे?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2930212042574501960</id><published>2008-04-14T16:28:00.004+05:30</published><updated>2008-04-30T16:09:20.208+05:30</updated><title type='text'>आरक्षण के अध्याय का आखिरी शब्द स्वीकार करें</title><content type='html'>&lt;em&gt;पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी आरक्षण पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस आलेख के जरिए लंबे समय से विवादास्पद रहे इस मुद्दे पर शीर्षस्थ अदालत के फैसले की पृष्ठभूमि में अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं गिरीश निकम। हालांकि उनका यह आलेख मूलतः अंग्रेजी में लिखा लिखा हुआ है जिसका हिंदी अनुवाद उनकी अनुमित के साथ यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://indiasreport.com/node/20" target="_blank"&gt;इस आलेख की मूल अंग्रेजी प्रति पढने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गिरीश निकम की कलम से&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर पुस्तक का एक आखिरी शब्द होता है, हर नाटक का एक आखिरी दृश्य होता है। मतलब जो शुरू हुआ वह कहीं न कहीं समाप्त भी होता है। इसलिए अब उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद केंद्र सरकार और इससे जुड़े उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण पर चल रह वाद-प्रतिवाद का दौर भी अब समाप्त हो जाएगा। यह अलग बात है कि आरक्षण मसले कानूनी दांवपेंच की बाते होती रहेंगी लेकिन शीर्षस्थ न्यायालय की मुहर लगने से इससे जुड़ी बहस खत्म हो जानी चाहिए। लंबे समय से आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में चल रहे तर्क और कुतर्क ने देश को हिलाकर रख दिया है जिसकी कंपन हिंदीभाषी क्षेत्रों में ज्यादा महसूस की गई। इसने सबसे ज्यादा विद्यार्थी समुदाय को प्रभावित किया है और अब उचित समय आ गया है सब शांत हो जाएं और कोर्ट के फैसले को स्वीकार करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले हफ्ते जिस दिन पांच न्यायाधीशों के बेंच ने इस मसले पर अपना फैसला सुनाया उस दिन इस खबर को लेने वाले तमाम वेबसाइटों को आरक्षण का विरोध करने वाले ब्लागरों ने अपनी प्रतिक्रिया से पाट दिया। मार्च 2007 में संप्रग सरकार द्वारा प्रस्तावित आरक्षण विधेयक पर  न्यायालय  के दो सदस्यीय बेंच द्वारा स्टे लगाने के बाद इन लोगों ने जो धारणा अपने मन में पाल रखी थी वह गलत साबित हो गई। निश्चित तौर पर उन्होंने अपनी जीत की खुशी समय से पहले मना ली थी। तब टीवी कैमरों के सामने उन्होंने जिस तरह अपनी खुशी जाहिर की थी उससे लगता है कि उन्हें विश्वास हो चला था कि सुप्रीम कोर्ट आरक्षण को मंजूरी प्रदान नहीं करेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसलिए यह समझा जा सकता है कि अब वह इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों जाहिर कर रहे हैं। इन प्रतिक्रियाओं में यह तथ्य देखाना रोचक था कि इनमें से बड़ा वर्ग कोर्ट के फैसले का स्वागत करने के लिए भाजपा को लताड़ रहा था क्योंकि वे इस पार्टी को अबतक अपना रक्षक समझते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोर्ट के अंतिम फैसले ने न सिर्फ आरक्षण को जायज ठहराया बल्कि इसने आरक्षण के लिए जाति को आधार बनाने की बात को भी सही माना। फैसले के इस पहलू के कारण भी इसके खिलाफ बड़ी तादाद में आवाज उठाई जा रही है। शीर्षस्थ अदालत ने इस दलील को भी मजबूती से खारिज कर दिया कि जातीय आधार पर आरक्षण देने से समाज बंटता है। जो लोग अग्रलिखित अवधारणा के आधार पर तर्क देते हैं वे अक्सर इस देश में हजारों वर्षों से अपनी गहरी जड़ें जमा चुकी जातीय व्यवस्था की अनदेखी करते हैं और इन्हीं में से कई ऐसे लोग है जो जातीय व्यवस्था के असली अनुपालक रहे हैं। यह कोई नहीं कह सकता है कि छोटी जातियों ने जाती व्यवस्था को बनाया है या अमल में लाने की कोशिश की है। जब तक जाति व्यवस्था अगड़ों के हित में रही तबतक उन्होंने इसका स्वागत किया और जब यह उन्हें पीड़ा देने लगी है तब वे इसकी नुख्ताचीनी करने में लग गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक इस तर्क की बात है कि आरक्षण से मेरिट को नुकसान पहुंचता है और इससे अयोग्य व्यक्तियों को फायदा मिलता है तो यह याद दिलाता चलूं कि पिछले वर्ष वीरप्पा मोईली की अध्यक्षता में गठित समिति ने काफी रिसर्च और छान-बीन के बाद इसे आधार हीन करार दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब फिर से सु्प्रीम कोर्ट के फैसले की ओर लौटते हैं। जिस आधार पर दो न्यायाधीशों के बेंच ने आरक्षण विधेयक पर रोक लगाई थी उसे ताजा फैसले में कोई जगह नहीं मिली। न्यायाधीश अरिजित पसायत और न्यायाधीश एल एस पंटा यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए कि मंडल कमीशन रिपोर्ट में ओबीसी आरक्षण के लिए पेश किए गए 1931 के जनगणना आंकड़े पर्याप्त होंगे। तब कई लोगों ने (जिसमें मैं भी शामिल हूं) यह तर्क रखा था कि जनगणना आंकड़ों के अपडेशन मात्र से जमीनी हकीकत नहीं बदल जाएगी। इस देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति से बना है और उनके लिए 27 फीसदी आरक्षण उनकी वास्तविक संख्या से काफी कम है। इस बार पांच न्यायधीशों की समिति ने इस मसले पर ज्यादा जोर नहीं दिया। जनजणना आंकड़ों के अपडेशन से तथ्यों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला है और साथ ही आरक्षण का विरोध करने वाला तबका जातीय आधार पर जनगणना का भी विरोध करता है तो फिर किसी जाति की वास्तविक संख्या क्या है इस बात का पता कैसे चलेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या सु्प्रीम कोर्ट के इस फैसले को उचित माना जाए। बिल्कुल माना जाए। हालांकि आरक्षण के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वालों के लिए यह कभी भी उचित फैसला नहीं हो सकता है लेकिन शीर्षस्थ अदालत इससे ज्यादा क्या कर सकता है। वह भला उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण से कैसे इनकार कर सकता है जबिक इसने नौकरियों के मामले में इसे स्वीकार किया है। यह जरूर याद रखा जाए कि 1993 में इंदर साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद (जिसने केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए आरक्षण का दरवाजा खोला था) नौकरियों में आरक्षण लागू करने के बाद इसे शिक्षण संस्थाओं में लागू करना महज उप परिणाम मात्र था जिसे आज न कल होना ही था। संप्रग सरकार द्वारा इसे लागू करने का जिम्मा उठाने से पहले कई सरकारों ने इस मसले पर टालमटोल का रुख अपनाया। इस बारे में भी बहुत बढ़ा-चढ़ा कर लिखा गया और प्रस्तुत किया गया कि कोर्ट द्वारा ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर को बाहर रखने का निर्देश देने से सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ी। अब यह भी कोई ऐसा मसला नहीं है जिस पर कोई हायतौबा मचाए क्योंकि इंदर साहनी मामले के फैसले में ही शीर्षस्थ न्यायालय ने क्रीमी लेयर पर स्पष्ट रूपरेखा तैयार कर दी थी। नौकरियों में आरक्षण देते वक्त भी क्रीमी लेयर को कोटा दायरे से बाहर रखा गया था। उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए विधेयक में क्रीमी लेयर को शामिल करने को लेकर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के ऊपर संप्रग के कुछ घटक दलों का दबाव था। हालांकि सरकार को यह भान था कि कानूनी तौर पर ऐसा करना संभव नहीं हो पाएगा। अब सोनिया और डा. सिंह यह कहकर खुद को दोषमुक्त कर सकते हैं कि उन्होंने इसके लिए कोशिश की लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्या यह फैसला किसी एक पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद होगा? निश्चित रूप से कांग्रेस और संप्रग के इसके सहयोगी घटक इस पर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की कोशिश करेंगे। वाम दल भी ज्यादा पीछे नहीं रहने वाले हैं और उन्हें इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। वह इस मामले में वाकई ऐतिहासिक योगदान का दावा कर सकते हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है तो वह ऐसे मसले में खुद को न इधर की और न उधर की वाली स्थिति में पाती है। हालांकि उसने भी न्यायालय के फैसले का स्वागत करने में वक्त जाया नहीं किया।&lt;br /&gt;अब यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब इस साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। सबसे पहले कर्नाटक में चुनाव होंगे और यह देखने वाली बात होगी कि वहां संप्रग को कितना लाभ मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल बात यह है कि जो शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी आरक्षण के खिलाफ थे उन्हें अब इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। जैसा कि मशहूर अधिवक्ता और आरक्षण के खिलाफ रहने वाले सोली सोराबजी ने कहा कि अब सबों के लिए उचित होगा कि फैसले को स्वीकार किया जाए और लंबे समय से विवादास्पद रहे इस मसले का पटाक्षेप किया जाए। सबों को खुश करना मुमकिन नहीं है लेकिन हर अध्याय का एक समापन होता है। यह हो सकता है कि पांच वर्षों बाद हम इस बात का अध्ययन करें कि आरक्षण अपने उद्देश्य में असफल रहा या इसने वाकई विश्वास से भरे पुरुषों और महिलाओं को समान अवसर प्रदान किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2930212042574501960?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2930212042574501960/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2930212042574501960' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2930212042574501960'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2930212042574501960'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/04/blog-post_14.html' title='आरक्षण के अध्याय का आखिरी शब्द स्वीकार करें'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-4535685206357134518</id><published>2008-04-09T14:58:00.003+05:30</published><updated>2008-04-09T15:05:20.396+05:30</updated><title type='text'>एनडीटीवी इमेजिन पर मूक रामायण</title><content type='html'>सोमवार, 8 अप्रैल को रात 9.30 बजे मैं मनोरंजन चैनल एनडीटीवी इमेजिन पर रामायण देख रहा था। इसमें आजकल भगवान राम के वन जाने का प्रसंग दिखाया जा रहा है। सीरीयल में पहले ब्रेक तक तो सब कुछ ठीक रहा लेकिन इसके बाद जो हुआ वह मुझे समझ में नहीं आया। राम के वन जाने की कथा के दौरान टेलिविजन पर दृश्य तो उभर रहे थे लेकिन आवाज के नाम पर सिर्फ रवींद्र जैन का संगीत बज रहा था। कलाकार होंठ तो हिला रहे थे लेकिन उनकी आवाज नहीं आ रही थी। मैंने सोंचा कि कहीं मेरा खटारा टीवी आज फिर तो नहीं खराब हो गया तभी किसी मित्र ने फोन कर बताया कि उसके यहां भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। मैं यह जानना चाहता हूं कि ऐसा तकनीकी खराबी की वजह से हुआ या सीरीयल के निर्माता और चैनल के कर्ताधर्ता जानबूझ कर राम सहित रामायण के तमाम पात्रों को गूंगा बनाने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि इसके बाद जो अगला सीरीयल शुरू हुआ उसमें आवाज की ऐसी कोई समस्या नहीं थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-4535685206357134518?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/4535685206357134518/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=4535685206357134518' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4535685206357134518'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/4535685206357134518'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/04/blog-post_09.html' title='एनडीटीवी इमेजिन पर मूक रामायण'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-6247068910442140273</id><published>2008-04-08T15:05:00.010+05:30</published><updated>2008-04-30T16:09:48.612+05:30</updated><title type='text'>क्या भगवा ब्रिगेड को अलग-थलग कर पाएंगे मार्क्सवादी?</title><content type='html'>&lt;em&gt;29 मार्च से 3 अप्रैल तक कोयंबटूर में सीपीआई (एम) का 19वां अधिवेशन संपन्न हुआ। पहली बार ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत की अनुपिस्थिति में हुए इस अधिवेशन में पार्टी की भविष्य की योजनाओं की रूप-रेखा तैयार की गई। इस आलेख में इन्हीं योजनाओं और इसके संभावित परिणामों का जायजा ले रहे हैं गिरीश निकम। हालांकि यह आलेख मूलतः अंग्रेजी में है जिसका हिंदी अनुवाद लेखक की अनुमित के साथ यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://indiasreport.com/node/19" target="_blank"&gt;इस आलेख की मूल अंग्रेजी प्रति पढने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गिरीश निकम की कलम से&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सीपीआई(एम) अपना एक और मैराथन अधिवेशन कर चुकी है। यह इकलौती ऐसी पार्टी है जो हर तीन साल में एक बार छह दिनों तक संगठनात्मक मुद्दों के साथ-साथ क्षेत्रिय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर एक जगह जमा होकर विचार-मंथन करती है। इसलिए कुछ मायनों कोई भी अन्य पार्टी इन मसलों को उतनी गंभीरता के साथ नहीं लेती है जितना कि मार्क्सवादी लेती हैं। तो क्या यह कहा जा सकता है कि यह दल अंदरूनी लोकतंत्र को कायम रखे हुए है। दूसरी पार्टयों के साथ तुलना करें तो यह बात बिल्कुल सही है। पार्टी की ज्यादातर बैठकें गुप्त होती है और इसमें निचले स्तर के सदस्य को भी अपनी बात सामने रखने की और बड़े से बड़े धुरंघरों की आलोचना करने की आजादी होती है। इन सब के बावजूद कई बुर्जुआ पार्टियों की पंरपराओं के उलट यहां आप अधिवेशन में हुई बातों को मीडिया में लीक होता हुआ नहीं पाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूकि पार्टी में जानकारी लीक करने को बहुत ही गंभीरता से लिया जाता है और ऐसा करने वाले को अक्सर अपनी पार्टी सदस्यता से हाथ भी धोना पड़ता है इसलिए किसी मार्क्सवादी नेता से जानकारी निकलवा पाना पत्रकारों के लिए हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त बातों के हिसाब से कोयंबतूर में हुआ सीपीआईएम का 19वां अधिवेशन भी अलग नहीं रहा। हालांकि कुछ अन्य तथ्यों के लिहाज से यह कुछ हद तक पहले से भिन्न जरूर रहा है। खराब स्वास्थ्य के कारण पहली बार पार्टी पोलित ब्यूरो के संस्थापक और वरिष्ठ नेता ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत अधिवेशन में हिस्सा नहीं ले सके। अपने जीवन के 90 बसंत देख चुके इन नेताओं की अनुपस्थिति में यह अधिवेशन सही मायनों में भावी पीढ़ी के नेताओं का अधिवेशन रहा। नेतृत्व की मशाल आगे की ओर बढ़ा दी गई है और यह प्रकाश करात और सीताराम येचुरी की अगुवाई में युवा पीढ़ी के नेताओं की जिम्मेदारी है कि वे आने वाले दिनों में नेतृत्व व रणनीतियों को दशा व दिशा दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बसु और सुरजीत ने पार्टी को बहुत ही मजबूत नींव प्रदान की है। विशेषकर वी पी सिंह, संयुक्त मोर्चा और संप्रग सरकारों को बाहर से समर्थन देकर उन्होंने पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति के नक्शे पर मजबूती से उभारा। यह उनकी दूरदर्शिता और राजनीतिक सामंजस्यता का ही नतीजा है कि आज पार्टी अधिवेशन को अभूतपूर्व मीडिया कवरेज मिल रहा है। सीपीएम ने 2004 लोकसभा चुवाओं के बाद तमाम विरोधाभासों के बावजूद जिस तरह कांग्रेस के साथ अपने नाजुक संबंधों का निर्वहन किया है उससे यह पार्टी हमेशा सुखिर्यों में रही। कोयंबतूर अधिवेशन ने जिस तरह मीडिया में उत्सुकता पैदा की है उससे खुद कई कामरेड आश्चर्यचकित हैं। यह सीपीआईएम के 44 सालों के इतिहास में संभवतः सबसे बृहद मीडिया कवरेज रहा है। निश्चत तौर पर कुछ कवरेज सकारात्मक और सही नहीं है। हकीकत यही है कि मीडिया का बड़ा हिस्सा आज भी इस पार्टी को, इसकी कार्यशैली को समझने की ही कोशिश कर रहा है और मीडिया के प्रति सीपीआईएम का जो रुख है उससे इसमें खास मदद नहीं मिलती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक इस अधिवेशन के निष्कर्ष का सवाल है तो यह न सिर्फ मीडिया बल्कि आम आदमी को भी भ्रम में डालने वाला है। हालांकि किसी अहम मुद्दे पर पार्टी को सोच में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है लेकिन भविष्य की योजनाओं के बारे में इसकी जो अभिव्यक्ति है उससे कई तरह की उलझनें पैदा होती हैं। यह उलझने तब तक रहेंगी जब तक पार्टी इसे साफ-साफ नहीं कहती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोयंबतूर अधिवेशन के दौरान पार्टी ने जिन चुनौतियों को अपने सामने रखा है उसमें सबसे बड़ी चुनौती है तीसरे विकल्प का निर्माण करना। मीडिया भी यह समझता हुआ प्रतीत होता है इस बार ऐसे तीसरे विकल्प की तैयारी की जा रही है महज चुनावी न हो और जिसका मकसद हर हाल में सत्ता हासिल करना भी न हो। लेकिन क्या इसके लिए मार्क्सवादियों के पास ऐसा समर्थन आधार और ऐसे सहयोगी हैं जिसके बल पर वे तीसरे विक्लप के बारे में सोच रहे हैं। मार्क्सवादियों के हिसाब से यह विकल्प ऐसा हो जो विचारधारा के आधार पर दक्षिणपंथी-सांप्रदायिक भारतीय जनता पार्टी और नव उदारवाद की ओर बढ़ती मध्यमार्गी कांग्रेस पार्टी से अलग हो। अब मार्क्सवादी यह विश्वास कर रहे हैं या कम से कम उम्मीद कर रहे हैं कि भारतीय राजनीति के इन दोनों घ्रुवों के अलावा तीसरा विक्लप खड़ा किया जा सकता है। लेकिन ऐसे विकल्प के लिए उनका जमीनी आधार क्या होगा? वही तेलगु देशम पार्टी, वही समाजवादी पार्टी, वही जनता दल से टूटकर अलग हुई पार्टियां, वही डीएमके आदि-आदि. यह वास्तव में बहुत बड़ी चुनौती है। मार्क्सवादियों को इन पार्टियों को जो सत्ता में होने पर भाजपा या कांग्रेस जैसी नीतियों पर चलते हैं तीसरे विकल्प के लिए तैयार कर पाना बहुत मुश्किल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि सीपीआई (एम) की दूसरी चुनौती जो तीसरे विकल्प के गठन से ही जुड़ी है सबसे रोचक है। यह चुनौती है भाजपा को अलग-थलग करने की। कुछ उसी तरह जिस तरह 1996 में 13 दिनों के लिए बनी वाजपेयी सरकार को अलग-थलग किया गया था। संप्रग सरकार के गठन के लिए कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के लिए जिस तथ्य ने मार्क्सवादियों को प्रेरित किया था वह बिना शक सांप्रदायिक भाजपा को सत्ता से दूर रखना था। अब मार्क्सवादी इस बात के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं कि भाजपा अपने साझीदारों की संख्यां न बढ़ा सके बल्कि जो भी साझीदार उनके साथ हैं उन्हें भी उनसे अलग किया जाए। अब ऐसे देश में जहां मौकापरस्ती सभी राजनीतिक दलों का मूल मंत्र है और जहां विचारधारा से जुड़ी प्रतिबद्धता चोला बदलने में बाधक सिद्ध होती हो वहां मार्क्सवादियों को छोटे दलों को ऐसी पार्टी को अलग-थलग करने के लिए तैयार करने खासी मशक्कत करनी पड़ेगी जो उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी का लालच देकर अपनी ओर रिझाती है। भाजपा अब फुसलाने की कला में माहिर हो चुकी है। कुछ समय पहले उसने जिस तरह कर्नाटक में जनता दल सेक्यूलर को फुसलाया था उससे यह बात अपने आप प्रमाणित हो जाती है। भाजपा अब भी इन हथकंडों को अपनाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी। मार्क्सवादियों के लिए अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक औऱ बड़ी बाधा से पार पाना होगा। भारतीय में कई ऐसी क्षेत्रीय पार्टियां है जो स्वभाविक रूप से कांग्रेस से अलगाव का भाव रखती है क्योंकि इन पार्टियों के लिए कांग्रेस ही सबसे बड़ी साजनीतिक प्रतिद्वंदी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे भारतीय मार्क्सवादी एक साथ दो नावों की सवारी करते हुए प्रतीत हो रहे । यह एक ऐसी स्थिति है जो सीपीआई (एम) की राजनीतिक क्षमताओं की असली परीक्षा लेगी। इसमें खतरा भी है। क्योंकि भारतीय मार्क्सवादी अभी कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ सकते हैं और ऐसे में क्या वे इन छोटे-छोटे राजनीतिक दलों को भाजपा से दूर रख पाएंगे। हो सकता है ऐसा न हो पाए। ध्यान देने वाली बात है कि करात ने यह भी कहा है कि कांग्रेस के साथ संबंधों को वह इस लोकसभा से आगे भी ले जाना चाहते हैं। अपने इस रुख के कारण वे कांग्रेस से प्रतिद्वंदिता रखने वाले छोटे दलों को कैसे भाजपा के करीब जाने से रोक पाएंगे।&lt;br /&gt;इसलिए मार्क्सवादियों को आम आदमी को अपनी योजनाओं को समझा पाने और उन्हें विश्वास में लेने में खासी मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि आम आदमी उनके इस मारो और भागो वाले रवैये से भ्रमित हो सकते हैं। अगर भ्रम की यह स्थिति जल्द दूर नहीं होती है जिसे दूर करना आसान भी नहीं है तो मार्क्सवादी अनजाने में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के साथ ही उन्हीं सांप्रदायिक ताकतों को मजबूती प्रदान करेंगे जिन्हें वह अलग-थलग करना चाहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;90 के दशक में और फिर 2004 में सुरजीत और ज्योति बसु ने केंद्र में कांग्रेस के साथ तालमेल कर राज्य स्तरीय मतभेदों से ऊपर उठते हुए इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन राजनीति की मजबूत नींव रखी। अब उनके उत्तराधिकारियों ने अपने लिए बेहद कठिन चुनौतियों का चुनाव किया तो ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि वह इसमें सफल होते हैं या नहीं लेकिन एक बात तय है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और मार्क्सवादियों के बीच या यूं कहें कि दक्षिणपंथियों और वामपंथियों के बीच का टकराव अब पहले से ज्यादा राजनीतिक और हिंसक शक्ल अख्तियार करेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-6247068910442140273?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/6247068910442140273/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=6247068910442140273' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6247068910442140273'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/6247068910442140273'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/04/blog-post_08.html' title='क्या भगवा ब्रिगेड को अलग-थलग कर पाएंगे मार्क्सवादी?'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-2318305847378859244</id><published>2008-04-06T14:44:00.005+05:30</published><updated>2008-12-09T03:33:22.420+05:30</updated><title type='text'>इतना भी बोरिंग नहीं है गोल्फ देखना</title><content type='html'>मैं जब भी अपना टेलिविजन ऑन करता हूं तो पहले आवाज सुनाई देती है और इसके करीब 10-15 सकेंड के बाद तस्वीर उभरती है। पिछले महीने की बात है जब मैंने इसे ऑन किया तो पहली आवाज जो सुनी वह थी व्हाट ए शॉट। क्रिकेट प्रेमी होने के कारण मेरे कान खड़े हो गए और मन में लगा कि हो न हो यह सचिन तेंदुलकर के किसी बेहतरीन शॉट पर किसी कमेंटेटर की प्रतिक्रिया रही होगी लेकिन जब तस्वीर उभरी तो देखा कि यह टिप्पणी किसी महिला गोल्फर के शॉट के ऊपर की गई थी। खेल पत्रकार होने के बावजूद मेरी गोल्फ में कोई रुची नहीं है लेकिन वह महिला गोल्फर काफी खूबसूरत थी इसलिए कुछ देर उस चैनल पर अटक गया। इसके बाद दूसरी गोल्फर ने शॉट लगाया। उसका यह शॉट मुझे इतना बेहतरीन लगा कि इसके आगे पहले वाली गोल्फर की खूबसूरती भी फींकी लगने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस एक शॉट ने मेरे अंदर गोल्फ को जानने की जिज्ञासा को काफी तीव्र कर दिया। बस क्या था मैंने अगले दो घंटों तक महला गोल्फरों के बीच  इस जंग को देखा। काफी कुछ समझ में न आ पाने के कारण मैं इसका उतना मजा नहीं ले पाया जितना ले सकता था। अगले दिन जब मैं कार्यालय आया तो इंटनेट पर गोल्फ के बारे में कुछ जानकारी जुटाई। अपने एक-दो कलीग से इस बारे में बातचीत की। थोड़ा गोल्फ ज्ञान बढ़ा। रात में फिर एक स्पोर्ट्स चैनल पर गोल्फ देखा। उसके बाद से जब भी टेलिविजन पर गोल्फ देखने का मौका मिलता है मैं नहीं चूकता हूं और जैसे-जैसे मेरी जानकारी बढ़ती जा रही इसे देखने का मजा भी बढ़ता जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अब तक गोल्फ के बारे में जितना जान पाया आप लोगों के साथ भी शेयर करना चाहता हूं। मुमकिन है कि आप में से बहुत से लोग इस बारे में विस्तार से जानकारी रखते हों लेकिन मेरे वो मित्र जो गोल्फ के मूलभूत तथ्यों से अनभिज्ञ होने के कारण इसका मजा नहीं ले पाते हैं उनके लिए मैं इस खेल से जुड़ी कुछ बातें लिखने का प्रयास कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;1- किसी भी आउटडोर गेम की तरह गोल्फ का भी अपना मैदान होता है जिसे गोल्फ कोर्स कहते हैं। लेकिन हाकी, फुटबाल या रग्बी की तरह इसके मैदान का आकार-प्रकार हमेशा एक जैसा ही हो यह अनिवार्य नहीं है। आज की तारीख में दुनिया में कुल 32000 गोल्फ कोर्स हैं जिसमें आधे से ज्यादा अमेरिका में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/R_iXETYbZwI/AAAAAAAAAAs/2BWqRufBakA/s1600-h/golf3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/R_iXETYbZwI/AAAAAAAAAAs/2BWqRufBakA/s320/golf3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5186061071095129858" /&gt;&lt;/a&gt;2- वैसे तो एक मानक गोल्फ कोर्स में 18 होल (जिसमें गोल्फर गेंद डालने का प्रयास करता है) होते हैं लेकिन 9 होल वाले गोल्फ कोर्स भी प्रचलन में। यहां गोल्फर 1 से लेकर 9वां होल खेलने के बाद 9वें से पहले होल तक आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3-हर गोल्फर हर होल में कम से कम शॉट में गेंद डालने की कोशिश करता है। सभी १८ होल मिलाकर जो गोल्फर सबसे कम शॉट लेता है वह विजेता होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4- हर होल के लिए शॉटों की संख्या पहले से निर्धारित होती है। यह अमूमन तीन से लेकर पांच तक होती है। किसी-किसी गोल्फ कोर्स में छह शॉट वाले होल भी होते हैं। किसी होल के शॉटों की संख्या टी (पहले शॉट का स्थान) से होल तक की दूरी के हिसाब से तय किया जाता है। 91-224 मीटर के लिए तीन शॉट, 225-434 मीटर के लिए चार शॉट और 435-630 मीटर के लिए पांच शॉट तय किए जाते हैं। इससे ज्यादा दूरी के लिए छह शॉट तय होते हैं। हालांकि शॉटों की संख्यां टी और होल के बीच मौजूद व्यवधानो (बंकर या पानी वाला इलाका) के आधार पर भी तय किया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5-मान लें कि किसी होल के लिए तय शॉटों की संख्या 4 है। अगर कोई गोल्फर 4 प्रयास में यानी चार शॉट में गेंद को होल में डालने में सफल रहता है तो उसके प्रदर्शन को पार (par) कहते हैं। अगर उसने तीन शॉट में गेंद को होल में पहुंचा दिया तो उसका प्रदर्शन वन बिलो पार (one below par) (-1) कहलाएगा। one below par प्रदर्शन को बर्डी भा कहा जाता है। इसी तरह उसने अगर दो शॉट में ही ऐसा कर दिया तो यह प्रदर्शन टू बिलो पार (-2) या ईगल कहलाएगा। इसी तरह इसके ठीक उलट यानी चार शॉट वाले होल के लिए अगर कोई पांच शॉट लेता है तो इसे वन अबव पार (one above par) (+1) कहलाएगा। one above par को बोगी भी कहा जाता है। अगर कोई इसके लिए छह शॉट लेता है तो इसे टू अबव पार या डबल बोगी कहते हैं। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि गोल्फर कम से कम शॉट में गेंद को होल में डालने का प्रयास करता है इसलिए बर्डी और ईगल अच्छा प्रदर्शन कहा जाता है वहीं बोगी या डबल बोगी खराब खेल माना जाता है। जो गोल्फर ज्यादा बर्डी या ईगल जमाएगा उसके जीतने की संभावना ज्यादा रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6-इसी तरह सभी 18 होल का खेल हो जाने के बाद जिस गोल्फर ने सबसे कम शॉट लिए उसे विजेता माना जाएगा। अक्सर 18 होल के लिए कुल 70 से 72 शॉट निर्धारित होते हैं। मान लें किसी गोल्फ कोसर् में 72 शॉट निर्धारित हैं और कोई गोल्फर 65 शॉट में सभी 18 होल में गेंद डालने में सफल रहता है तो उसका स्कोर 7 अंडर- 65 कहलाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/R_iXbDYbZxI/AAAAAAAAAA0/8mF4OQqBPqw/s1600-h/golf1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/R_iXbDYbZxI/AAAAAAAAAA0/8mF4OQqBPqw/s320/golf1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5186061461937153810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;7-किसी होल में गेंद डालने के लिए गोल्फर जहां से पहला शॉट खेलेगा उसे टी (Tee) कहते हैं। उसके बाद गेंद जहां गिरेगी वहां से वह होल की तरफ दूसरा फिर तीसरा (जतनी जरूरत पड़े) शॉट खेलता है। जिस स्थान पर होल होता है उसे ग्रीन एरिया कहते हैं। ग्रीन एरिया बारीक कटी घांस वाला मैदानी भाग होता है। एक बार ग्रीन एरिया में गेंद पहुंच जाने के बाद गोल्फर हवा में शॉट नहीं खेलता है बलिक मैदानी शॉट (All along the ground) खेलकर उसे होल में डालने का प्रयास करता है। इसी मैदानी शॉट को पुटिंग कहते हैं। मशहूर गोल्फर टाइगर वुड्स अपनी शानदार पुटिंग के विश्व विख्यात हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/R_iXuDYbZyI/AAAAAAAAAA8/yJBMZh2JEo0/s1600-h/golf2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/R_iXuDYbZyI/AAAAAAAAAA8/yJBMZh2JEo0/s320/golf2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5186061788354668322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;8-अगर किसी होल के लिए 4 शॉट निर्धारित होता है तो गोल्फर प्रयास करता है कि ज्यादा से ज्यादा दो प्रयास में गेंद को ग्रीन एरिया में पहुंचा दिया जाए ताकि बर्डी या ईगल जमाने की संभावना बढ़ सके। आप सोचेंगे कि इसके लिए गोल्फर दो प्रयास या शॉट लेने की कोशिश क्यों करता है क्यों न एक ही ऐसा शॉट खेलने की कोशिश करे जिससे गेंद टी से ग्रीन एरिया में पहुंच जाए। गोल्फर ऐसा इसलिए नहीं करते हैं ताकि गेंद किसी बंकर या पानी वाले हिस्से में न चली जाए। किसी गोल्फ कोर्स में बंकर या पानी वाला हिस्सा व्यवधआन के लिए जानबूझ कर डाला जाता है ताकि गोल्फर की गुणवत्ता की असल परीक्षा हो सके। बंकर या पानी में वाले हिस्से में गेंद जाने से कभी-कभी ऐसी स्थिति बन जाती है कि वहां से गेंद को निकालना नामुमकिन हो जाता है। इससे गोल्फर या तो डिसक्वालीफाई हो सकता है या तो उसे पेनाल्टी शॉट खेलना पड़ सकता है। अब जबिक हर गोल्फर चाहता है कि कम से कम प्रयास में गेंद को होल तक पहुंचाया जाए ऐसे में कौन पेनाल्टी शॉट लेना चाहेगा।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोल्फ को अच्छी तरह से जानने के लिए ऊपर लिखी सामग्री काफी कम है लेकिन इतनी जानकारी के साथ गोल्फ देखने की शुरुआत की जा सकती है और बाकी बातें धीरे-धीरे अपने आप समझ में आने लगेगी। चलते-चलते मैं आपको गोल्फ के 19वें होल के बारे में बता दूं। वैसे तो हकीकत में कोई 19वां होल नहीं होता है लेकिन गोल्फर इस इस शब्द का इस्तेमाल गोल्फ कोर्स के पास मौजूद बीयर-बार के लिए करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-2318305847378859244?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/2318305847378859244/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=2318305847378859244' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2318305847378859244'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/2318305847378859244'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html' title='इतना भी बोरिंग नहीं है गोल्फ देखना'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/R_iXETYbZwI/AAAAAAAAAAs/2BWqRufBakA/s72-c/golf3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-3904584066842953086</id><published>2008-04-03T12:29:00.003+05:30</published><updated>2008-04-03T13:02:54.496+05:30</updated><title type='text'>पहले भी सस्ते में ढेर हुई है टीम इंडिया</title><content type='html'>दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आज अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में भारतीय पारी सिर्फ 76 रन के स्कोर पर ढेर हो गई लेकिन पिछले आंकड़ों पर गौर करे तो यह दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ या किसी अन्य टीम के खिलाफ भारत का अब तक सबसे खराब बल्लेबाजी प्रदर्शन नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेस्ट क्रिकेट में भारत ने अपना न्यूनतम स्कोर इंग्लैंड के खिलाफ 1974 में ला‌र्ड्स मैदान पर बनाया था। तब अजीत वाडेकर की कप्तानी में खेली टीम इंडिया अपनी दूसरी पारी में सिर्फ 42 रन पर लुढ़क गई थी। गौरतलब है कि उस भारतीय टीम में सुनील गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ जैसे बल्लेबाज थे। इंग्लैंड यह मैच एक पारी और 285 रनों से जीतने में सफल रहा था। जहां तक दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ भारत के सबसे कम योग का सवाल है तो वर्ष 1996 में सचिन तेंदुलकर की कप्तानी में भारतीय टीम अपनी दूसरी पारी में सिर्फ 66 रन पर आउट हो गई थी। भारत ने यह मैच 328 रनों से गंवाया। भारत में भारत का न्यूनतम स्कोर 75 रन है जो उसने वेस्टइंडीज के खिलाफ 1987 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान पर बनाया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;टेस्ट क्रिकेट में भारत का न्यूनतम स्कोर&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;स्कोर ओवर पारी विरुद्ध मैदान वर्ष &lt;br /&gt;42 17 तीसरी इंग्लैंड लॉ‌र्ड्स 1974 &lt;br /&gt;58 21.3 दूसरी आस्ट्रेलिया ब्रिसबेन 1947 &lt;br /&gt;58 21.4 दूसरी इंग्लैंड मैनचेस्टर 1952 &lt;br /&gt;66 34.1 चौथी दक्षिण अफ्रीका डरबन 1996 &lt;br /&gt;67 24.2 तीसरी आस्ट्रेलिया मेलबर्न 1948 &lt;br /&gt;75 30.5 पहली वेस्टइंडीज दिल्ली 1987 &lt;br /&gt;76 20 पहली दक्षिण अफ्रीका अहमदाबाद 2008 &lt;br /&gt;यह आलेख मैंने अपने संस्थान की वेबसाइट जागरण.कॉम के लिए लिखा था सोचा इसे अपने ब्लॉग पर भी डाल दूँ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5689238198011800479-3904584066842953086?l=sunlojara.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sunlojara.blogspot.com/feeds/3904584066842953086/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5689238198011800479&amp;postID=3904584066842953086' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3904584066842953086'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5689238198011800479/posts/default/3904584066842953086'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sunlojara.blogspot.com/2008/04/blog-post_03.html' title='पहले भी सस्ते में ढेर हुई है टीम इंडिया'/><author><name>बिक्रम प्रताप सिंह</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04887757195597338956</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_0enkAPbMobU/SDlGGfMaIFI/AAAAAAAAABw/lZtQ-F3Qvmg/S220/bikku2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5689238198011800479.post-921450234191540725</id><published>2008-04-02T13:17:00.010+05:30</published><updated>2008-04-30T16:10:21.251+05:30</updated><title type='text'>अपनी ही डाल को काट रहे हैं आडवाणी</title><content type='html'>&lt;em&gt;भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा माई कंट्री माई लाइफ इन दिनों मीडिया में खूब सुर्खियां बटोर रही है। आडवाणी खुद ही अलग-अलग समाचार चैनलों को साक्षात्कार देकर इसे प्रचारित व प्रसारित करने में जुटे हैं। इन साक्षात्कारों में आडवाणी ने किताब व खुद के बारे में जो बातें कही हैं वह उनके लिए कितना फायदेमंद या नुकसानदायक है उसी का विश्लेषण कर रहे हैं गिरीश निकम। उनका यह आलेख मूलतः अंग्रेजी में है जिसका हिंदी अनुवाद उनकी अनुमति के साथ यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://indiasreport.com/node/18" target="_blank"&gt;इस आलेख की मूल अंग्रेजी प्रति पढने के लिए यहाँ क्लिक करें&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गिरीश निकम की कलम से&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो सप्ताह पहले मैंने अपने आलेख में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की इस बात पर तारीफ की थी कि उन्होंने अपने कैरियर के इस पड़ाव पर भी आत्मकथा लिखकर बाकी नेताओं के लिए प्रेरणादायी काम किया है। अब जबकि उस किताब के ज्यादा से ज्यादा तथ्य सामने आ रहे हैं और जिस तरह संघ परिवार का यह वयोवृद्ध नेता उसके प्रचार के लिए मीडिया में लगातार साक्षात्कार दे रहा है उससे उनकी ही पार्टी के सहयोगी उनसे कन्नी काटने लगे हैं। इनमें से ही एक नेता आश्चर्य कर रहा था कि प्रधानमंत्री के पद के उम्मीदवार माने जाने वाले को ऐसी हरकतों से क्या लाभ मिलेगा, वहीं कांग्रस का एक वरिष्ठ नेता इस बात से बहुत खुश था कि इससे उन्हें आडवाणी को किनारे करने में मदद मिलेगी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आडवाणी इन साक्षात्कारों के दौरान जैसा मूड दिखा रहे हैं वैसा तो उन्होंने अपनी किताब में भी नहीं दिखाया है और यह उनकी छवि के लिए किताब में लिखे तथ्यों से भी ज्यादा नुकसानदायक है। करण थापड़ के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कांग्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ अपने खराब राजनैतिक संबंधों का जिक्र किया और यह भी कहा कि इस खाई को पाटना बेदह मुश्किल है। लेकिन इस साक्षात्कार के कुछ ही देर बाद वह अपनी पत्नी के साथ सोनिया के घर 10 जनपथ पर उन्हें किताब की एक प्रति भेंट करने चले गए। इससे न तो कांग्रेस अध्यक्ष के साथ उनके संबंधों पर जमी बर्फ को पिघलाने में मदद मिली और न ही किसी ने ऐसा कदम उठाने पर उनकी वाहवाही की। इससे उन्हें अपनी ही पार्टी के सदस्यों से शर्मिंदगी झेलनी पड़ी और साथ ही कांग्रेसियों की आलोचना भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं शेखर गुप्ता के साथ वाक द टॉक में उन्होंने यह दावा किया कि उन्हें इस बात का भान नहीं था कि 1999 में जसवंत सिंह विमान अपहर्ताओं की मांग पर आतंकवादियों को छोड़ने कांधार जा रहे हैं। उनके इस दावे को राजग सरकार के दौरान मंत्रीमंडल में उनके सहयोगी और तत्कालीन रक्षा मत्री जार्ज फर्नांडीस ने ही खारिज कर दिया। उन्होंने कहा वरिष्ठ मंत्रियों की जिस बैठक में जसवंत सिंह को आतंकवादियों के साथ कंघार भेजे जाने का फैसला किया गया उसमें आडवाणी भी मौजूद थे। फर्नांडीस और आडवाणी दोनों ही अपने जीवन के अस्सी बसंत देख चुके हैं और इस उम्र में याद्दास्त धोखा देती रहती है लेकिन इस मामले में किसकी याद्दास्त दगा दे रही है यह बहस का मुद्दा बन चुका है। जसवंत सिंह इस मुद्दे पर अभी भी चुप्पी साधे हुए हैं। इससे भी खराब स्थिति आडवाणी के उस बात पर बनती है जिसमें उन्होंने कहा है कि जसवंत सिंह ने इस मसले पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जरूर मंत्रणा की होगी। आडवाणी का यह वक्तव्य वाजपेयी को भी कटघरे में खड़ा देता है। इससे ऐसा जान पड़ता है कि आडवाणी इस मसले के उत्तरदायित्व से खुद को दूर रखना चाहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस साक्षात्कार के दूसरे हिस्से में आडवाणी ने एक और विवादास्पद बयान दिया है। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से इस्तीफा लेना चाहते थे लेकिन उन्होंने इसका विरोध किया। अब आडवाणी कह रहे हैं कि इन दंगों के बाद वह खुद मोदी के इस्तीफे के पक्ष में थे लेकिन गोवा में हुए राष्ट्रीय अधिवेषण के दौरान इस मसले पर विवाद उत्पन्न हो जाने के कारण उन्होंने इस पर जोर नहीं दिया। इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि इसके बावजूद उन्होंने गुजराज दंगों को लेकर मोदी को क्लीन चिट दे दिया। रोचक बात यह है कि यह क्लीन चिट उसी दिन आया जिस दिन समाचार पत्रों में इंदौर में प्रतिबंधित संगठन सिमी के नोताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के दौरान उनकी योजनाओं के खुलासे से जुड़ी खबरें छपीं थीं। पूछताछ के दौरान यह बात सामने आई कि ये लोग मोदी और आडवाणी की हत्या की साजिश रच रहे थे क्योंकि ये बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात दंगों के पीछे इन्हीं नेताओं का हाथ मानते हैं। अब मोदी को क्लीन चिट देने से आडवाणी के खिलाफ इन युवाओं के मत को और बल मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिमी के इन सदस्यों ने पूछताछ के दौरान बताया कि धीमी न्याय प्रक्रिया और और आजाद भारत के इतिहास की दो सबसे कलंकित घटनाओं बाबरी मस्जिद विध्वंस व गुजरात मामले में गठित समितियों के कार्य की प्रगति के अभाव ने उन्हें इन दोनों नेताओं की हत्या करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि इससे सिमी नेताओं की योज
