Tuesday, May 27, 2008

हमारे तेज गेंदबाज औसत बनकर क्यों रह जाते हैं


जवागल श्रीनाथ, वेंकटेश प्रसाद, अमय कुरविला, जहीर खान, आशीष नेहरा, इरफान पठान, एल बालाजी, रुद्र प्रताप सिंह, ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने कपिल देव के संन्यास लेने के बाद कभी न कभी भारतीय तेज गेंदबाजी की कमान संभाली है।

इनमें से लगभग सभी ने अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर की अच्छी शुरुआत की और कुछ मैचों में अपने दम पर भारत को जीत भी दिलाई लेकिन सवाल यह है क्या हमारे ये तेज गेंदबाजों विश्व के अपने समकालीन महान तेज गेंदबाजों की श्रेणी में आते हैं। जब श्रीनाथ और प्रसाद का दौर था तब ग्लेन मैक्ग्रा, वसीम अकरम, एलन डोनाल्ड, शॉन पोलाक, वकार यूनुस और चामिंडा वास जैसे गेंदबाजों ने अपनी चमक बिखेरी। इनके आगे श्रीनाथ और वेंकटेश औसत ही नजर आए।

श्रीनाथ और वेंकटेश के बाद जहीर युग की शुरुआत हुई लेकिन वह भी ऊपर लिखे कुछ नामों की ख्याति के आगे दब से गए। फिर आशीष नेहरा, एल बालाजी, इरफान पठान और रुद्र प्रताप सिंह जैसे गेंदबाजों ने कमाल संभाली है लेकिन लगता है कि आस्ट्रेलिया के ब्रेट ली और स्टुअर्ट क्लार्क, दक्षिण अफ्रीका के डेल स्टेन और इंग्लैंड के रेयान साइडबाटम इनके युग के सर्वश्रेष्ठ तेज गेंदबाज कहलाएंगे।

ऐसी क्या वजह है कि भारतीय तेज गेंदबाज अच्छी शुरुआत को कायम नहीं रख पाते हैं। जहां विश्व के अन्य तेज गेंदबाज औसत शुरुआत के बाद अपनी क्षमता में लगातार इजाफा करते रहते हैं वहीं हमारा कोई तेज गेंदबाज समय के साथ स्विंग खो देता है तो कोई रफ्तार। कुछ ऐसे भी हैं जिनमें न तो स्विंग बचती है और न ही रफ्तार। उदाहरण के तौर पर ब्रेट ली और जहीर खान के कैरियर की प्रगति का अवलोकन करें तो स्थिति साफ हो जाती है। दोनों ही तेज गेंदबाजों ने वर्ष 2000 में अपने-अपने कैरियर की शुरुआत की थी। ली के पास सिर्फ तेजी थी जबकि जहीर के पास अच्छी तेजी के साथ-साथ, दोनों ओर स्विंग कराने की क्षमता और एक अच्छा यार्कर भी था। अब देखिए ब्रेट ली के पास क्या-क्या है और जहीर के पास क्या बचा है। तूफानी रफ्तार के साथ इन स्विंग, आउट स्विंग, स्लोवर, कटर और योर्कर जैसे हथियारों के साथ ली फिलहाल दुनिया के श्रेष्ठ गेंदबाज हैं तो जहीर एक औसत गेंदबाज से ज्यादा कुछ नहीं।

बालाजी और नेहरा तो अपना फिटनेस ही कायम नहीं रख सके तो इरफान पठान की स्विंग और रफ्तार कहां गायब हुई यह उन्हें भी नहीं मालूम। पठान आज भी विकेट ले रहे हैं लेकिन उस तेजी के साथ नहीं जिसके लिए वह जाने जाते थे। अपनी बनाना इन स्विंग के लिए मशहूर पठान आज वनडे और ट्वंटी 20 में जरूर सफल हो रहे हैं लेकिन टेस्ट टीम में जगह बनाने के लिए उन्हें अपनी बल्लेबाजी का सहारा लेना पड़ता है। एक अन्य तेज गेंदबाज रुद्र प्रताप सिंह ने हालांकि अब तक खुद में सुधार ही किया है लेकिन डेल स्टेन और रेयान साइडबाटम तेजी से उन्हें पीछे छोड़ रहे हैं।

हालांकि भारतीय तेज गेंदबाजी एक नाम जरूर ऐसा सामने आया है जिसमें अपने समकालीन गेंदबाजों को पीछे छोड़ने की क्षमता है। वह तेज गेंदबाज हैं दिल्ली के ईशांत शर्मा। यह 19 साल का गेंदबाज बांग्लादेश में अपने कैरियर की शुरुआत से लेकर अब तक लंबा सफर तय चुका है। आस्ट्रेलिया में अपनी धारदार गेंदबाजी से उन्होंने सभी को प्रभावित किया है लेकिन अगर उन्हें औसत की राह छोड़कर महानता का रास्ता अख्तियार करना है तो खुद को हमेशा अपडेट करते रहना होगा और भारत के पिछले कई तेज गेंदबाजों की तुलना में आत्ममुग्धता से बचना होगा।

Thursday, May 22, 2008

थप्पड़ ने दिया सडेन डेथ

ऐसा नहीं है कि खेल के मैदान में थप्पड़ सिर्फ आईपीएल में चले और थप्पड़ जड़ने वाला शख्स हमेशा हरभजन सिंह ही हो। बुधवार रात को एक थप्पड़ फुटबाल के मैदान में भी चला और वह भी किसी मामूली मैच में नहीं बल्कि मास्को में हुए यूएफा चैंपियंस लीग के फाइनल में चला।

मुकाबला इंग्लैंड के दो मशहूर क्लबों मैनचेस्टर यूनाईटेड और चेल्सी के बीच था। मैच निर्धारित समय में 1-1 की बराबरी पर रहा था और खेल 30 मिनट के अतिरिक्त समय में चल रहा था। जब यह तय लगने लगा था कि फैसले के लिए पेनाल्टी शूट आउट का सहारा लेना ही पड़ेगा तभी चेल्सी के स्टार मिडफील्डर और पेनाल्टी स्पेशलिस्ट डाइडिएर ड्रोगबा ने थ्रो इन मसले पर हुए मामूली विवाद पर यूनाइटेड के खिलाड़ी मार्क विदिच को थप्पड़ जड़ दिया। उन्हें रेड कार्ड दिखाया गया और वह मैच से बाहर हो गए।

पेनाल्टी शूट आउट में चेल्सी को ड्रोगबा को भारी कमी खली और वह सडेन डेथ तक खिंचे इस मैच में 5-6 से पराजित हो गया और कभी राजनीतिक कारणों से लाल रहने वाला मास्को बुधवार की इस रात को मैनचेस्टर यूनाईटेड के लाल रंग में सराबोर हो गया। यूनाईटेड के सभी खिलाड़ी जश्न में डूब गए तो चेल्सी के मुर्झाए चेहरे यही सोच रहे होंगे ड्रोगबा तूने क्या किया क्योंकि ड्रोगबा की अनुपस्थिति में चेल्सी के कप्तान जॉन टैरी को पेनाल्टी लेने के लिए आना पड़ा और वह अपना शॉट गोल पोस्ट के बाहर खेल बैठे। अगर वह यह गोल कर जाते तो यह मैच चेल्सी की झोली में चला जाता लेकिन वह चूक गए और यूनाईटेड को बराबरी मिल गई। इसके बाद यूनाईडेट के गोलकीपर वान डेर सार ने सडेन डेथ में एक और पेनाल्टी रोक कर अपनी टीम को ऐतिहासिक जीत दिला दी।

ड्रोगबा की गलती कुछ-कुछ जर्मनी में हुए पिछले विश्व कप फुटबाल फाइनल की याद दिला गई। तब फ्रांस और इटली के बीच हुए मुकाबले में फ्रांस के धुरंधर जिनेदिन जिदान के इटली के मार्को मेतराजी के सीने पर हेडर दे मारा जिससे उन्हें रेड कार्ड देखना पड़ा और वह मैच से बाहर हो गए। इसका खामियाजा फ्रांस को पेनाल्टी शूट आउट में भुगतना पड़ा और इटली विश्व चैंपियन बना गया।


यह आलेख मैंने अपने संस्थान की वेबसाइट जागरण. काम के लिए लिखा है जिसे अपने ब्लॉग पर भी चस्पा कर दिया है। इसे जागरण.काम पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

Wednesday, May 21, 2008

शायद पेस से जलते हैं भूपति

बीजिंग ओलंपिक शुरू होने में महज तीन महीने ही बचे हैं और टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति ने यह कह कर सभी को चौंका दिया है कि वह लिएंडर पेस के साथ जोड़ी बनाकर इसमें भाग नहीं लेना चाहते हैं।

ओलंपिक में भारत को पदकों के लिए किस कदर तरसना पड़ता है यह बताने की जरूरत नहीं है। 1980 के बाद हमने ओलंपिक स्वर्ण का स्वाद नहीं चखा है। 1984, 1988 और 1992 में तो हमें एक भी पदक नहीं मिला। 1996 के अटलांटा ओलंपिक में लिएंडर ने टेनिस में पुरुष एकल का कांस्य पदक जीतकर 16 साल का सूखा समाप्त किया। इसके बाद सिडनी में कर्नम मल्लेश्वरी ने कांस्य जीता तो 2004 में एथेंस में डबल ट्रैप शूटर राजवर्धन राठौड़ ने चांदी का तमगा जीतकर देश वासियों को खुश होने का मौका दिया।

इस बार भले ही पदकों के लिए कई दावे किए जा रहे हों लेकिन सच्चाई यही है कि बीजिंग में भी हम पदक के लिए कुछ ही नामों पर निर्भर होंगे। इन्हीं चंद नामों में लिएंडर पेस और महेश भूपति भी हैं। एथेंस में इन दोनों की जोड़ी ने सेमीफाइनल तक का सफर तय किया और यह भारत व इनका दुर्भाग्य रहा है कि वे बहुत करीबी अंतर से सेमीफाइनल व कांस्य पदक के लिए हुआ मुकाबला हार गए।

इस बार भूपति यह तर्क दे रहे हैं कि लंबे समय से संवाद न हो पाने और साझा तैयारियों के अभाव के कारण वह पेस के साथ जोड़ी नहीं बनाना चाहते हैं। क्या भूपति बताएंगे कि सिडनी और एथेंस ओलंपिक से पहले क्या उन्होंने पेस के साथ पूरी तैयारी की थी। निश्चित तौर पर उनका जवाब ना होगा। तो भूपति भाई पिछली बार आप बिना किसी खास तैयारी के साथ पेस के साथ मिलकर सेमीफाइनल में पहुंच गए तो इस बार उससे अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते।

यह बात समझ में नहीं आती कि क्यों भूपति राष्ट्रीय हित के खातिर ही सही कुछ महीनों के लिए पेस के साथ अपने मतभेदों को क्यों नहीं भूल जाते हैं। यह वही लिएंडर पेस हैं जिन्होंने भूपति को भूपित बनने में मदद की है। भूपति को डेविस कप में अच्छे प्रदर्शन के बाद एटीपी सर्किट में अपना युगल जोड़ीदार बनने की पेशकश लिएंडर ने ही की थी। सभी जानते हैं कि लिएंडर सिंगल्स के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी थे लेकिन उन्होंने इसकी परवाह न करते हुए भूपति के साथ जोड़ी बनाई थी।

लगता है समय के साथ भूपति को पेस से जलन होने लगी। उनके मन में यह बात घर करने लगी कि सारी कामयाबियों का सेहरा पेस के सिर ही बंध जाता है। यह सही है कि पेस-भूपति की साझा कामयाबियों में ज्यादा श्रेय लिएंडर को मिला लेकिन भूपति ने शायद इसके पीछे मौजूद कारण को जानने की कोशिश नहीं की।

लिएंडर उन खिलाडि़यों में हैं जिन्होंने हमेशा तिरंगे की शान के लिए खेला है। एटीपी सर्किट में वह भले ही किसी औने-पौने खिलाड़ी से हार जाते हैं लेकिन डेविस कप, एशियन गेम्स और ओलंपिक जैसी स्पर्धाओं में वह खुद से कई गुना अच्छे खिलाडि़यों को धूल चटा देते हैं। पेस की इसी खूबी ने उन्हें देशवासियों का लाडला बना दिया। भूपति को शायद पेस की यही लोकप्रियता अखर रही है। वह सोचते होंगे कि अगर वह पेस के साथ ओलंपिक पदक जीत जाते हैं तो दुनिया कहेगी कि पेस ने अपने कैरियर में दो बार ओलंपिक पदक जीता है जबकि भूपति ने सिर्फ एक बार।

भूपति युवा खिलाड़ी रोहन बोपन्ना के साथ जोड़ी बनाना चाहते हैं। बोपन्ना ने भले पिछले एक-दो सालों में पाकिस्तान के ऐसाम उल हक कुरैशी के साथ मिलकर दो-चार एटीपी चैलेंजर्स में अच्छा प्रदर्शन किया हो लेकिन अभी वह इतने मंझे हुए खिलाड़ी नहीं बने हैं कि ओलंपिक पदक जीत लें। शायद भूपति इस बात के जुगाड़ में हैं कि किसी भी तरह से पेस को ओलंपिक में दूसरी कामयाबी से रोका जाए लेकिन भला हो भारतीय टेनिस संघ का कि उसने भूपति की मांग को सिरे से ठुकरा दिया है और उन्हें यह निर्देश दिया है उनकी जोड़ी सिर्फ और सिर्फ पेस के साथ ही बनेगी।

Monday, May 19, 2008

क्रिकेट में रबर, आपने आखिरी बार कब सुना?


कुछ दिनों पहले की बात है, मैं अपने एक बेहद नजदीकी मित्र से क्रिकेट के ऊपर परिचर्चा कर रहा था। इसी दौरान मैंने कहा कि भारत ने तमाम देशों में टेस्ट रबर तो जीत लिए हैं लेकिन आस्ट्रेलिया में उसे यह कामयाबी नहीं मिली है। मेरा मित्र क्रिकेट में रबर शब्द सुनकर चौंक गया। हालांकि मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरे उस मित्र के पास क्रिकेट से जुड़ी जानकारियों का कतई अभाव नहीं है लेकिन उसने इससे पहले क्रिकेट में रबर शब्द नहीं सुना था।

मैंने कुछ और क्रिकेट प्रेमी मित्रों से इस बारे में ताकीद की लेकिन ज्यादातर इस शब्द से अनभिज्ञ थे। इससे पहले कि इस शब्द के बारे में लोगों की अनभिज्ञता की बात करूं पहले यह बताता चलूं कि क्रिकेट में रबर क्या है (हो सकता है आपको इसका अर्थ पता हो लेकिन मैं यहां इसका अर्थ उनलोगों के लिए लिख रहा हूं जो अभी भी इससे नावाकिफ हैं)।

रबर का आशय किसी द्विपक्षीय टेस्ट सीरीज के नतीजे से है। अगर भारत-इंग्लैंड के बीच तीन टेस्ट मैचों की सीरीज हुई और इसे भारत ने जीता तो कहा जाएगा कि यह टेस्ट रबर भारत का हुआ। अगली बार जब भारत और इंग्लैंड किसी टेस्ट सीरीज में खेलने उतरेगी तो इंग्लैंड को रबर अपने कब्जे में लेने के लिए सीरीज को जीतना ही होगा। यह इसे भारत ने जीता या यह सीरीज ड्रा रही तो रबर भारत के पास ही रहेगा। यही बात आस्ट्रेलिया-इंग्लैंड के बीच होने वाली एशेज सीरीज, आस्ट्रेलिया-वेस्टइंडीज के बीच होने वाले फ्रैंक वारेल सीरीज और भारत-आस्ट्रेलिया के बीच होने वाले बार्डर-गावस्कर सीरीज में भी लागू होती है।

मिशाल के तौर पर अपने पिछले आस्ट्रेलिया दौरे पर भारत ने 1-2 से टेस्ट सीरीज गंवाई थी। अगर यह सीरीज 2-2 से बराबर रहती तो भी बार्डर-गावस्कर ट्रॉफी आस्ट्रेलिया के पास ही रहती क्योंकि उसने 2004-05 में भारत में हुई सीरीज में 2-1 से जीत दर्ज की थी।

रबर से ही जुड़ा एक और शब्द है जो टेस्ट सीरीज से ताल्लुक रखता है। वह शब्द है डेड रबर। डेड रबर का आशय उस मैच से होता है जिसके नतीजे का टेस्ट सीरीज के नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मसलन आस्ट्रेलिया के खिलाफ किसी तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में भारत पहले दो टेस्ट जीत लेता है तो तीसरा टेस्ट डेड रबर कहलाएगा। मतलब यह कि इस मैच के नतीजे का टेस्ट सीरीज के नतीजे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला।

अब इस बात की ओर लौटें कि क्यों रबर जैसे शब्द आज के आधुनिक दौर की क्रिकेट में अपना महत्व खोते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा दोष आजकल होने वाली क्रिकेट पत्रकारिता खासकर हिंदी पत्रकारिता को जाता है। अंग्रेजी अखबारों में तो आप यदा-कदा इन शब्दों को पढ़ भी लें लेकिन हिंदी में ये खोजने से भी नहीं मिलेंगे (मुमकिन है कि प्रभास जोशी जी के कॉलम में मिल जाए)। इन शब्दों के विलुप्त होने का दूसरा बड़ा कारण वनडे व ट्वंटी 20 क्रिकेट की बहुतायत है जिस कारण टेस्ट क्रिकेट की खूबियों और उससे जुड़े शब्द लोगों के कानों से नहीं गुजरते।

Sunday, May 18, 2008

एक कुत्ते की बदौलत बचा मैनचेस्टर यूनाईटेड


यह शीर्षक अपने आप में कुछ अजीब जरूर लग रहा होगा लेकिन यह सौ फीसदी सच है। आज की तारीख में मैनचेस्टर यूनाईटेड दुनिया का सबसे धनी खेल क्लब (करीब 80 अरब रुपये की कंपनी) है और इसके प्रशंसकों की तादाद करीब 33 करोड़ है जो ब्रिटेन की कुल आबादी का करीब सात गुना है। ऐसे में यह तथ्य तो चौंकाने वाला होगा ही कि इस क्लब को खड़ा करने में एक कुत्ते ने अहम भूमिका निभाई।

वैसे तो इस क्लब की स्थापना 1878 में न्यूटन हीथ एल एंड वाईआर फुलबाल क्लब के नाम पर हुई। 1883 में इसका नाम सिर्फ न्यूटन हीथ फुटबाल क्लब कर दिया गया। लेकिन वर्ष 1902 के आसपास यह क्लब दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया। उस समय इसके ऊपर 2500 पाउंड का कर्ज था। इससे उबरने के लिए क्लब को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था और सभी मान रहे थे कि इस क्लब के अब गिने चुने दिन ही बचे हैं। क्लब के तत्कालीन कप्तान हैरी स्टेफोर्ड ने सेंट बर्नाड नस्ल के अपने प्यारे कुत्ते को नीलाम करने की कोशिश की ताकि क्लब के लिए कुछ पैसे जुटाए जाए। वहां के एक शराब व्यवसायी जॉन हेनरी डेविस ने कुत्ते को खरीदने की इच्छा जताई लेकिन स्टेफोर्ड ने इसके बदले उनसे क्लब में पैसे निवेश करने की शर्त रखी जिसे डेविस ने मान ली।

डेविस को क्लब का चेयरमैन बनाया गया। उन्होंने अपनी पहली बोर्ड मीटिंग में यह प्रस्ताव रखा कि क्लब को नया रूप देने के लिए इसका नाम बदला जाए। पहले मैनचेस्टर सेंट्रल और मैनचेस्टर सेल्टिक जैसे नामों पर विचार किया गया। तभी इतालवी मूल के एक युवा लूईस रोक्का ने प्रस्ताव रखा कि क्यों न इसका नाम मैनचेस्टर यूनाईटेड रखा जाए। यह प्रस्ताव सभी को भाया और तब से यह क्लब मैनचेस्टर यूनाईटेड हो गया। डेविस ने फिर क्लब की जर्सी का रंग बदला। पहले इसकी जर्स का रंग हरा और सुनहरा था जिसे बदलकर लाल और सफेद कर दिया गया जो आज भी कायम है।
उसके बाद मैनचेस्टर यूनाईटेड ने सफलता की जो इबारत लिखी वह आज सबके सामने है।

उन्होंने इस बार भी इंग्लिश प्रीमियर लीग का खिताब जीता है। अपने इतिहास में यूनाईटेड यह कारनामा 17 बार कर चुका है (लीवरपूल ने 18 बार यह खिताब अपने नाम किया है)। 1968 में मैनचेस्टर यूनाईटेड यूरोपियन कप जीतने वाला इंग्लैंड का पहला क्लब बना। क्लब स्तर की दुनिया की सबसे पुरानी फुटबाल प्रतियोगिता एफ ए कप के विजेता के तौर पर यूनाईटेड ने रिकार्ड 11 बार अपना नाम दर्ज कराया है। 1990 के दशक में यह दुनिया का सबसे धनी फुटबाल क्लब बना और आज की तारीख में वह किसी भी खेल में दुनिया का सबसे धनी क्लब है।

1992 में इंग्लिश प्रीमियर लीग शुरू होने के बाद से यूनाईटेड का प्रदर्शन और भी प्रभावशाली रहा। इसके मैनेजर सर एलेक्स फगुर्सन दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और कामयाब मैनेजर में गिने जाते हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में इस क्लब को 10 बार इंग्लिश प्रीमियर लीग का चैंपियन बनाया।

हालांकि इस क्लब को कामयाबी के साथ-साथ एक बेहद दुखद हादसे से भी रूबरू होना पड़ा। 6 फरवरी 1958 को यूरोपियन कप के एक मैच में भाग लेने के लिए खिलाडि़यों को ले जा रहा हवाई जहाज म्यूनिख में दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें यूनाईटेड के आठ खिलाडि़यों ज्योफ बेंट, रोजर बायर्ने, एडी कोलमैन, डंकन एडव‌र्ड्स, मार्क जोंस, डेविड पेग, टॉमी टेलर और लियाम बिली व्हेलान को अपनी जान गंवानी पड़ी। इंधन लेने के बाद विमान के टेक ऑफ में परेशानी आने लगी थी। पायलटों ने दो बार टेक ऑफ का असफल प्रयास किया और जब उन्होंने तीसरा प्रयास किया तब यह दर्दनाक दुर्घटना घटी।

इस दुर्घटना ने यूनाईटेड को झकझोरा जरूर लेकिन उसके जज्बे को तोड़ नहीं सका। उसी सत्र में यूनाईटेड की टीम एफ ए कप के फाइनल में पहुंची। बुरे दौर में हौसला न हारने का यही जज्बा शायद वह सबसे बड़ा कारण है जिसने यूनाईटेड को अब तक इतनी अपार कामयाबियां दिलाई है और यही वजह है कि इसके पूरे विश्व में मौजूद 33 करोड़ प्रशंसकों में एक मैं भी हूं।

नोट: आलेख में दिए गए तथ्य विकीपीडिया डॉट ओआरजी और मैनचेस्टर यूनाईटेड की आधिकारिक वेबसाइट से लिए गए हैं।

Thursday, May 8, 2008

आईपीएल प्रीमियर तो है लेकिन लीग नहीं


इसमें कोई शक नहीं है कि इंडियन प्रीमियर लीग क्रिकेट जगत में एक अभूतपूर्व क्रांति की तरह है। इसने दुनिया भर के उम्दा क्रिकेटरों को ज्यादा कमाई का मौका उपलब्ध कराया। इसने इस खेल के प्रशंसकों को भी किसी टीम को अपना समर्थन देने के लिए ऐसा आधार मुहैया कराया जिसमें देश की प्रतिष्ठा दांव पर न लगी हो। इससे जीत पर मजा तो आता है लेकिन हार का वैसा गम नहीं होता जैसा कि किसी अंतरराष्ट्रीय मैच में अपने देश की हार पर होता है। इस टूर्नामेंट ने अभी अपना आधा सफर ही पूरा किया है लेकिन इतने कम समय में ही इसने भारतीय चयनकर्ताओं को भविष्य के लिए आधा दर्जन से ज्यादा उम्दा विकल्प उपलब्ध करवा दिए।

लेकिन ऊपर लिखी तमाम खूबियों के अलावा आईपीएल की कुछ खामियां भी हैं जिसे दूर कर पाना बेहद मुश्किल हो सकता है। ये खामियां ऐसी हैं जो इसके स्पो‌र्ट्स लीग होने पर ही सवाल उठाती है। इन्हीं में से एक खामी है रेलीगेशन सिस्टम का का न होना। रेलीगेशन सिस्टम किसी भी स्पो‌र्ट्स लीग की जान होती है। इसके तहत मुख्य लीग में फिसड्डी साबित हुई टीमों को अगले सत्र में दूसरे डिविजन में रेलीगेट कर दिया जाता है और दूसरे डिविजन में शीर्ष पर रही टीम मुख्य टूर्नामेंट में उसका स्थान ले लेती है। यह सिस्टम यूरोप की तमाम फुटबाल लीग, अमेरिकन फुटबाल, बास्केटबाल लीग [एनबीए] यहां तक हमारे देश में खेली जाने वाली रणजी ट्राफी क्रिकेट में भी लागू है।

इसका फायदा यह होता है कि कोई टीम अच्छा प्रदर्शन सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहती है कि वह टूर्नामेंट जीते बल्कि उसे इस बात का भी डर होता है कि कहीं वह दूसरे डिविजन में न खिसक जाए। लेकिन आईपीएल में ऐसा नहीं होगा। मान लीजिए कि अब तक अच्छा प्रदर्शन न कर पाने वाली बेंगलूर रॉयल चैलेंजर्स या हैदराबाद डक्कन चार्जर्स अगले दो-तीन मैच और हारकर सेमीफाइनल में पहुंचने की होड़ से बाहर हो जाती है तो अंतिम के चार-पांच मैचों में कौन सी बात उन्हें अच्छा प्रदर्शन करने पर मजबूर करेगी। अगर रेलीगेशन सिस्टम होता तो इसकी नौबत आने की कोई आशंका नहीं होती और कोई भी टीम सेमीफाइनल की होड़ से बाहर होने के बावजूद अगले साल मुख्य टूर्नामेंट में बचे रहने के लिए अच्छा खेल दिखाती या दिखाने की कोशिश करती।

अब आईपीएल में सकेंड डिविजन है ही नहीं तो रेलीगेशन सिस्टम का सवाल ही नहीं उठता है। अगर कुछ नई टीमों को जोड़कर सकेंड डिविजन बनाने की कोशिश भी की जाए तो मौजूदा फ्रेंचाइजी इसे सफल नहीं होने देंगे क्योंकि उन्होंने भारी कीमत चुकाकर 10-10 सालों के लिए टीम खरीदी है। वह किसी भी सूरत में ऐसी स्थिति नहीं चाहेंगे जिससे उनकी टीम पर मुख्य टूर्नामेंट से बाहर होने का खतरा मंडराए।

रेलीगेशन की तरह ही आईपीएल में एक और बड़ी खामी है। वह है इसके प्रारूप में सेमीफाइनल और फाइनल मैच का प्रावधान। यह ऐसा प्रावधान है जो टीमों को शीर्ष स्थान के लिए नहीं बल्कि किसी तरह अंतिम चार में जगह बनाने के लिए प्रेरित करेगी। दुनियां की किसी भी नामी स्पो‌र्ट्स लीग का अवलोकन करें तो आप पाएंगे कि वहां सेमीफाइनल और फाइनल का प्रावधान नहीं है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि टीमें लीग मैचों को ही पूरी गंभीरता से ले और हर लीग मैच इस भाव के साथ खेला जाए मानो यही सेमीफाइनल और फाइनल है।

वहां टीमों को यह पता होता है कि अगर टूर्नामेंट जीतना है तो हर हाल में शीर्ष पर आना होगा अंतिम चार में आने से कोई फायदा नहीं। हर तीन या चार साल पर होने वाले मैचों में सेमीफाइनल और फाइनल होना तर्कसंगत है लेकिन हर साल होने वाले आयोजन में इसका प्रावधान लीग मैचों की अहमियत को कम कर सकता है।

इसी तरह आईपीएल में एक ही शहर की दो टीमों के बीच होने वाली भिड़ंत का मजा भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर व्यस्त होने की वजह से आईपीएल में टीमों की संख्या सिर्फ आठ रखी गई है ताकि कम समय में टूर्नामेंट निबटाया जाए। इससे भारत के ही कई अहम शहरों को इसमें भाग लेने का मौका नहीं मिल पाया तो एक ही शहर की दो टीमों की बात करना ही बेमानी है।

खैर शुरुआत में तो हर आयोजन अधूरा सा दिखता है और समय के साथ इसमें सुधार होता है। हम यही उम्मीद कर हैं कि आईपीएल भी धीरे-धीरे खुद को सुधारेगा और स्पो‌र्ट्स लीग की जो अंतरराष्ट्रीय मान्यता है उस पर खरा उतरेगा।